ये पत्रकार माइक लेकर सबकी “जांच” में जुटे हैं!

समरेंद्र सिंह-

“पत्रकारों” ने गदर मचा रखा है। माइक लेकर सबकी “जांच” में जुटे हैं। बस अपना अगाड़ा पिछाड़ा नहीं देख रहे। बाकी सभी की पड़ताल हो रही है। अभी ऐसी एक पोस्ट पर नजर पड़ी। बचा की जगह बच्चा है। बच्चा की जगह बचा है। नहीं की जगह नही है। का और की का अंतर तो रहने ही दीजिए। लिंग में गड़बड़ी तो मौलिक अधिकार है। ऊपर से मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक सबको टैग कर दिया है। इन क्रांतिकारियों से पब्लिक की जान सांसत में है। कोई कुछ बोलेगा और कुछ करेगा तो अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला होगा।

बेशर्म “पत्रकारों” के कहर से कराहता लोकतंत्र! हमारा देश बहुत क्रांतिकारी देश है। यहां चप्पे-चप्पे पर क्रांतिकारी मिलेंगे। कुछ दिन पहले मैं स्वीमिंग करने जा रहा था। पूल के बाहर कुर्सी पर एक गार्ड बैठा हुआ था। उसने दस रुपये वाला मास्क मुंह पर लगा रखा था। नाक खुली थी। उसने मुझे देखा तो आंखें चमक उठी। उसे मुर्गा मिल गया था। उसने कुर्सी से उठते हुए कहा कि मास्क कहां है? मैंने कहा कि स्वीमिंग में मास्क की क्या जरुरत है? भाई ने समझाया कि नियम तो नियम होता है, मास्क नहीं तो एंट्री नहीं? मैं वापस लौटा। पास ही की कैमिस्ट शॉप से दस टकिया मास्क खरीदा और स्वीमिंग करने चला गया। ऐसे लोगों से बहस नहीं करनी चाहिए।

ऐसे अनगिनत लोगों के हाथ में अब माइक है। इनका जन्म सवाल पूछने के लिए हुआ है। ये माइक लेकर लोगों का पीछा कर रहे हैं। स्कूल में घुस कर टीचर से सवाल कर रहे हैं। अस्पताल के आईसीयू में घुस कर डॉक्टर को खदेड़ रहे हैं। थाने में घुस कर सिपाही से पूछ रहे हैं। डीएम-एसपी सबको दौड़ा रहे हैं। विधान सभा और लोक सभा भी इनकी गिरफ्त में हैं। कभी कभी सांसदों और विधायकों की परीक्षा लेने लगते हैं। ऐसे कई वीडियो मिल जाएंगे। फिर टीवी पर दिखा कर कहेंगे देखिए माननीय को ये भी नहीं पता। है न कमाल की बात!

अभी इन जांबाजों की पहुंच से अदालत थोड़ी दूर है। शायद वकीलों और माननीय जजों से इन्हें डर लगता है। ये घबराते हैं कि सवाल पूछने पर कहीं वकील लात घूंसों से धो न दें। संख्या बल में वो बहुत ज्यादा हैं। लिचड़ई और नंगई में भी उनका कोई मुकाबला नहीं। कोर्ट कचहरी में पुलिस भी दुम दबा कर चलती है।

वकीलों की तुलना में माननीय जज लोगों की संख्या बहुत ही कम है, मगर पॉवर बहुत ज्यादा है। चूं-चपड़ करने पर तुरंत जेल की हवा खिला देंगे। कुछ साल पहले एक चैनल ने कोर्ट का स्टिंग किया था जिससे बाद कोर्ट ने ऐसा डंडा किया कि उसके साथ साथ बाकी सभी की हवा निकल गई। वरना अपने पत्रकार साथी इतने बेशर्म हैं कि वो जज लोगों की चूड़ी भी कस देते। लहराते हुए पूछते कि बताओ 307 में क्या होता और 302 काहे के लिए है या द रूल ऑफ लॉ का मतलब क्या है? ये कहीं भी, किसी से भी, कुछ भी पूछ सकते हैं। पूछने की लाइलाज बीमारी है।

हाल के दिनों में बात एक कदम आगे बढ़ गई है। मामला पूछने तक सीमित नहीं रहा है। कुछ बकचोदों को दुरुस्त करने की बीमारी भी लग गई है। उत्तर प्रदेश चुनाव में ऐसे कई लुक्खे माइक लेकर मैदान में उतर गए थे। पब्लिक से पूछते कि तुम्हें कौन पसंद है? गरीब जनता जब पसंद बताती तो उसे दुरुस्त करने लगते। जैसे गरीब जनता ने इनकी भैंस खोल ली हो। एक दो जगह पर पब्लिक ने इन्हें दौड़ा लिया। मुझे डर है कि भविष्य में कहीं पब्लिक इनकी धुलाई न करने लग जाए। “लच्छन” ऐसे ही हैं इनके। फिर चिल्लाएंगे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हो गया। लोकतंत्र पर हमला हो गया। लोकतंत्र का इन्होंने तमाशा बना दिया है।

(तस्वीर में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का वर्तमान है। लोकतंत्र का ये प्रहरी शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने निकला है। बचों (बच्चों) का भविष्य बच्चा ने (बचाने) निकला है। कमाल का प्रहरी है। चारों तरफ क्रांति हो रही है।)



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Comments on “ये पत्रकार माइक लेकर सबकी “जांच” में जुटे हैं!

  • Abdul salam Quadri says:

    जशवंत जी बहुत बढ़िया पेलाई किये है। वैसे वेबसाइट और यूट्यूब पर सरकार की नजर टेढ़ी हो रही है। जल्द ही वेबसाइट और यूट्यूब चैंनल पर पाबंदी लगेगी। सिर्फ आरएनआई वाले और सेटेलाइट वाले ही बचेंगे।

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  • दयाल चंद यादव says:

    बार कौंसिल और मेडिकल कौंसिल की तरह पत्रकारों का भी पंजीयन बोर्ड होना चाहिए।

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