मोदीजी को इसरो में नहीं जाना चाहिए था!

श्रीगंगानगर। परीक्षा दे रहे स्टूडेंट के पास परीक्षक खड़ा हो जाए तो स्टूडेंट तनाव मेँ आ जाता है। स्टूडेंट स्वाभाविक ढंग से प्रश्न पत्र हल करने मेँ परेशान का अनुभव करने लगता है। आखिर उसे परीक्षक से हट जाने का आग्रह करना पड़ता है। शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा इसरो मेँ, जहां खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी मौजूद थे। वो मोदी जी, जिनके कद का कोई नेता आज इस देश मेँ नहीं है। वे मोदी जी, जिनके रूस और अमेरिका के राष्ट्रपतियों से याराना संबंध हैं। पाकिस्तान मोदी जी के मजबूत इरादों की वजह से तिलमिला रहा है। ऐसे महान व्यक्तित्व की उपस्थिति मेँ अमित शाह को छोड़ कर कोई भी सामान्य नहीं रह सकता।

ऐसे में इसरो के वैज्ञानिकों पर अदृश्य प्रेशर होना कोई बड़ी बात नहीं थी। परिणाम जानने को जब खुद प्रधानमंत्री मौजूद हों तो काम करने वालों के अंदर तनाव होना अस्वाभाविक नहीं। तनाव भी उस संस्थान के होनहारों पर जहां एक-एक सैकैन्ड के हजारवें हिस्से तक की गणना के अनुसार काम को अंजाम दिया जाता है। एक तो मोदी जी का व्यक्तित्व, ऊपर से मीडिया, अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसे ऐसे अलंकारों का इस्तेमाल कर रहा था, जिसका कोई लेना देना इस अभियान से नहीं था। कभी पाकिस्तान तो कभी पाक का झण्डा। वैज्ञानिकों को क्या तो पाक से मतलब था और क्या उनके झंडे और डंडे से! वे तो अपना काम कर रहे थे।

संभव है वे इतने अधिक प्रेशर में आ गए होंगे कि कहीं ना कहीं चूक हो गई। आखिर यह सब है तो मशीनरी के साथ गणना को परिणाम तक पहुंचाने का काम। मेरी दृष्टि मेँ मोदी जी को इस स्थान पर अपने आप को अपनी मार्केटिंग से बचाना चाहिए था। वे तो जहां भी होते, सबसे पहले सूचना उन तक ही पहुंचनी थी। कर लेते उसी वक्त अपनी मार्केटिंग। बढ़ा लेते वोट बैंक। दे लेते अपने आप को शाबाशी। वैज्ञानिकों ने पहले भी बहुत बड़े बड़े काम देश के लिए किए हैं।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के समय थार में परमाणु विस्फोट किया गया। विस्फोट होने से पहले तक किसी को कानों कान खबर तक नहीं हुई। ना कोई स्टेटमेंट, ना मौके पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी। परीक्षण के बाद पूरे देश मेँ बल्ले बल्ले और पूरा विश्व हैरान। ऐसा ही एक बार फिर हुआ, जब अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे। सब कुछ इतना छिप छिपा के हुआ कि नासा तक को भनक नहीं लगी। अन्तरिक्ष से धरती के चप्पे चप्पे पर नजर रखने वाले नासा के सैटेलाइट्स भी भारत के वैज्ञानिकों की इस चतुराई से भरी दिलेरी, होशियारी को पकड़ नहीं सके।

भारत के वैज्ञानिकों ने रेगिस्तान मेँ एक के बाद एक कई परमाणु परीक्षण कर एक बार फिर से विश्व के जाने माने देशों को हैरत मेँ डाल दिया था। तब भी तत्कालीन पीएम वाजपेई जी मौके पर नहीं थे। वैज्ञानिक अपना काम कर रहे थे और पीएम वाजपेई जी अपना। कोई मार्केटिंग नहीं। कोई बड़ी बड़ी बात नहीं। बस, संसद मेँ गौरव के साथ परमाणु विस्फोट की घोषणा की और देशवासियों को बधाई देकर वैज्ञानिकों के प्रति मान जताया।

इन्दिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेई चाहते तो मौके पर रह सकते थे। कौन रोकता उनको! किन्तु उन्होने ऐसा करने की जरूरत महसूस नहीं की। क्योंकि उनका मौके पर रहना जरूरी था ही नहीं। ऐसे नाजुक मौकों पर देश के पीएम की मौजूदगी का अर्थ होता है, काम कर रही टीम पर परोक्ष रूप से अतिरिक्त दवाब। जो नाजुक क्षणों मेँ काबिल से काबिल व्यक्ति से भी चूक करवा सकता है।

चंद्रयान जैसे अभियान के समय तो ऐसा प्रेशर, ऐसी चूक पूरे परिणाम को बदल देती है। हालांकि वैज्ञानिक फिर से टूटे संपर्क को जोड़ने मेँ जुटे हैं। संभव है वे इसमें कामयाब भी हो जाएं। ना भी हों तो एक असफलता विज्ञान की दूसरी सफलताओं मेँ बाधा नहीं बन सकती। विज्ञान न केवल यह सिखाता है बल्कि समझाता भी है। देश के वैज्ञानिकों ने हर क्षण इस देश का झण्डा ऊंचा रखा है। ऐसा होता भी रहा है और होता भी रहेगा। इसरो शान था, है और रहेगा। बस, राजनीति इस से दूर रहे।

लेखक गोविंद गोयल राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Posted by Bhadas4media on Friday, August 23, 2019
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Comments on “मोदीजी को इसरो में नहीं जाना चाहिए था!

  • हेमनिधि says:

    जयजयकार कराने का लोभी इतने बड़े अवसर को हाथ से कैसे जाने दे सकता था ?
    क्या इस देश की जनता ने इसे विदेशों में भी “जयजयकार प्रायोजित करा के ” जयजयकार कराते नहीं देखा है ?
    फिर ये तो भारत है , जहाँ की जनता से इसे वोट लेना है , इस शानदार अवसर को भुनाने का लोभ कैसे संवरण कर सकता था ?

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  • कुमार हर्षवर्द्धन says:

    परमाणु परीक्षण के समय अटल जी, जॉर्ज फर्नांडीज और डॉ कलाम पोखरण में मौजूद थे।

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  • Aajkal ki media k kisi bhi baat par apna drishtikon aur ekta kapoor k SaaS bahu serial me kono farak rah hi nahi na gaya hai. Jara bata de yahan ki sikke ke do pahloo hote hain. Aisa bhi toh ho sakta hai na k santvana dene hi gaye ho. Kyunki apni jai jaikar karane ki hi bhook hoti toh uri ki surgical strike bhi nahi hoti aur yemen k yudh k dauran koi bhartiya nagriko k saath saath alag desho k naagriko ko chup chap escort bhi nhi kar paate

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