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सोशल मीडिया आखिर छोड़ क्यों रहे मोदी जी?

Yashwant Singh : मोदी जी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। संडे को थपोरी पीट कर बताएंगे कि उनने देश हित में सोशल मीडिया के विदेशी प्लेटफॉर्म्स को क्यों छोड़ा!

अगर केंद्र सरकार की तरफ से देसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म लांच किया जाता है तो उसका डेटा राइट विंग पॉलिटिक्स के लिए काफी कीमती सामान होगा जिससे बाकी दल वंचित रहेंगे!

Vivek Singh : जहां से सोशल मीडिया छोड़ने की बात की गई है वो राजनेता नरेंद्र मोदी का एकाउंट है प्रधानमंत्री का नहीं। जिन्हें टैग करना है वो टेंशन न लें, प्रधानमंत्री का एकाउंट चलता रहेगा। अब नेता का एकाउंट क्या करें मोदी जी जब उनकी खुद की उम्र मार्गदर्शक मंडल में जाने की हुई जा रही। मुझे लग रहा है (भविष्यवाणी नहीं) मोदी जी 2024 में प्रधानमंत्री की दावेदारी नहीं करेंगे। ये सोशल मीडिया से दूरी उसी दिशा में शुरुआत है। नये नेता की खोज चल पड़ी है।

Santosh Singh : मुझे यह घोषणा भारत के अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लॉन्च की आहट लग रही है. चीन के बाद अब भारत.. फेसबुक ट्विट्टर और इंस्टाग्राम अभी सदमें में होंगे..फैन-फॉलोइंग हो या हेट-फॉलोइंग, मोदी जी जबरदस्त टीआरपी जेनेरेट करते हैं जो भविष्य में देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को मिलता दिख रहा हैं!

Sanjay Kumar Singh : नालायकी के लिए सोशल मीडिया छोड़ना वैसे ही है जैसे कालाधन खत्म करने लिए नोटबंदी करना था। इस्तीफा दीजिए, नहीं तो रहने दीजिए।

Pawan Lalchand : मोदीजी का सोशल मीडिया से हुआ मोहभंग! रविवार को करेगे एफबी, ट्विटर, यूट्यूब और इंस्टाग्राम आदि सोशल प्लेटफ़ॉर्म छोड़ने पर फैसला. या फिर इस माध्यम में सियासी विरोधियों की सक्रियता ने पलायन का रास्ता सुझाया? वैसे चौदह और उन्नीस में इस माध्यम के योगदान से मिल चुकी अपार सफलता के बाद अब चौबीस के लिये नया औजार खोजा भी जाना चाहिये! है कि नहीं!

Sanjay Jha : घबराइए मत। साहब अगर सच्चे फेसबुकिया होंगे तो आएंगे। लौट कर जरूर आएंगे।

Apurva bhardwaj : मोदी जी केवल सोशल मीडिया छोड़ रहे है “छोड़ना” नही छोड़ रहे है. घोरकलजुग.

Girish Malviya : शीशी भरी गुलाब की, फत्थर से फोड़ दूं। अच्छे दिन तो ला नहीं पाया, सोचा सोशल मीडिया ही छोड़ दूं। जिस स्तर के आदमी है उसी स्तर का शेर है!

Satyendra PS : आप सोशल मीडिया छोड़ दें, कोई बात नहीं। इस मंदी में ट्रोलिंग नहीं बन्द होनी चाहिए। लाखों बेरोजगार हो जाएंगे जो बेचारे बहुत मामूली पैसे में काम करते हैं। पहले से ही बाजार में बहुत बेरोजगारी है।

Kashyap Kishor Mishra : झोला ढूंढ रहे थे वो… अंबानी के घर है या अडानी के, यह याद नहीं आ रहा था… तो मीन टाईम के लिए सोशल मीडिया ही छोड़ दिये।

Cheshta Saxena : प्रधानमंत्री अब सोशल मीडिया छोड़ रहे हैं.. क्यों कि आपलोग देख लेते हैं कि वो किस- किस को फॉलो करते हैं.और फिर उनसे सवाल करते हैं.

Samiratmaj mishra : मोदी जी सोशल मीडिया रविवार से छोड़ने की सोच रहे हैं। हो सकता है इरादा बदल भी दें। लेकिन तब तक न्यूज़ चैनल वाले दर्शकों का क्या हाल कर चुके होंगे? सोचिए ज़रा।

Narayan Lal : पत्नी को छोड़ दिया, घर छोड़ दिया, चाय बेचने का धंधा छोड़ दिया,काले धन की चर्चा छोड़ दिया, नोटबन्दी का नाम छोड़ दिया, चौराहे पर आने का अहद तोड़ दिया, चौकीदारी छोड़ दिया। अब प्रधान सेवकत्व भी छोड़ देना चाहिए और पकौड़े तलना शुरू कर देना चाहिए।

Anoop Verma : अच्छी बात है, आप सोशल मीडिया छोड़ दीजिए। सभी भक्त लोग भी अनुसरण करें।

SP Singh : जब मोदी ने सोशल मीडिया पर ख़ुद को चौकीदार कहा तो भक्त बोले- मैं भी चौकीदार।
अब मोदी सोशल मीडिया छोड़ रहे हैं।
भक्तों शुरू हो जाओ😜😃

केंद्रीय मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए सोशल मीडिया छोड़ने का शिगूफा छेड़ा नरेंद्र मोदी ने!

Dayanand Pandey : लेकिन मैं न तो फेसबुक छोड़ने जा रहा हूं , न वाट्सअप। बोलने-बतियाने का बहुत बढ़िया और पावरफुल माध्यम है, सोशल मीडिया। यह भी छोड़ दूंगा तो कहां जाऊंगा भला। पेट्रोल बहुत महंगा हो चुका है , स्थानीय स्तर पर भी कहीं आना-जाना महंगा है। दूसरे शहर या दूसरे देश जाना तो बहुतै महंगा। यही एक सस्ता और सुलभ माध्यम है सब से संपर्क का। कम्यूनिकेशन का सोशल मीडिया सब से बड़ा माध्यम है। हां , यह ज़रूर है कि कुछ फर्जी , कुछ नफरती , कुछ एजेंडाधारी लोगों से मन दुखी होता है और माहौल भी ख़राब होता है पर यह सब तो असली ज़िंदगी में कहीं ज़्यादा है। फिर दिल्ली दंगा , महंगाई , बेरोजगारी , आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती विफलता , पाकिस्तान से जीते पर मिनी पाकिस्तान से क्यों हारे , केंद्र में जीते पर प्रदेशों में निरंतर हार आदि पर मुझ से तो कोई सवाल पूछा नहीं जाना है। न जवाब देना है। फिर मैं क्यों छोडूं भला सोशल मीडिया।

यह ज़रूर है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर समय बहुत ख़राब होता है। और कई बार आई टी सेल के कारिंदे तर्क और तथ्य की जगह दीवार बन कर , एजेंडा बन कर , नफरत बन कर उपस्थित होते हैं तो मन बहुत खराब होता है। लगता है उन से संवाद कर दीवार में सिर मार रहा हूं। हो सकता है नरेंद्र मोदी को लोग चीन की दीवार बन कर , नफरत का सागर बन कर मिल रहे हों तो वह ज़्यादा आहत हुए हों। जैसे राहुल गांधी जैसा लतीफा प्रतिक्रिया देते हुए कह रहा है कि सोशल मीडिया नहीं , नफ़रत छोड़िए। अजब है। इस लिए भी कि इन दिनों सोनिया , राहुल समेत समूची कांग्रेस भाई चारा के नाम पर जितनी नफ़रत समाज में घोल रही है , उस का कोई हिसाब नहीं है। कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने नफरत की खेती को अफीम की खेती में तब्दील कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी और सामान्य जनजीवन में भी।

फिर भी नरेंद्र मोदी को सोशल मीडिया से पलायन करने से भरसक बचना चाहिए। लेकिन आखिरी सच यही है कि सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर नफरत के एजेंडा का पलड़ा बहुत भारी है। वैसे यह जानना भी ख़ासा दिलचस्प है कि एक समय पाकिस्तान के लोगों ने मुशर्रफ को फेसबुक पर हज़ारों की संख्या में इस तरह वेलकम कर दिया कि बिना ज़मीनी सचाई जाने वह लंदन इस्लामाबाद लैंड कर गए और गिरफ्तार हो गए। फेसबुक पर मुशर्रफ का वेलकम करने वाले लोगों में से कोई एक भी उन के पक्ष में ज़मीन पर खड़ा नहीं दिखा। ऐसा भी निरंतर देख रहा हूं कि किसी के निधन पर सोशल मीडिया पर तो शोक संदेश का समंदर उमड़ पड़ता है लेकिन श्मशान घाट पर दस लोग भी नहीं पहुंचते। ऐसी ही तमाम नंगे सच हैं और बहुत बड़ा फासला है सोशल मीडिया , न्यूज चैनल और असल जीवन में। तो ज़रूरत इस फासले को पाटने की है। पलायन की नहीं।

बाकी वह लतीफा भले पुराना हो पर प्रासंगिक तो आज भी है। वह यह कि एक आदमी ने अगले से अपनी हनक जमाते हुआ बोला , मेरे पास फेसबुक है , इंस्टाग्राम है , ट्वीटर है , वाट्सअप है , तुम्हारे पास क्या है ? अगला बोला , मेरे पास काम-धाम है।

ऐसे और भी तमाम किस्से हैं। नान सोशल मीडिया के भी। जैसे कि एक बार किसी जहाज में दिलीप कुमार जा रहे थे। उन्हों ने देखा कि टाटा भी उसी जहाज में थे। पर उन के बहुत कोशिश के बावजूद टाटा ने उन की नोटिस नहीं ली। तो उन्हों ने अपने सहायक को टाटा के सहायक के पास भेजा और सूचना परोसी कि दिलीप कुमार भी हैं इस जहाज में। लेकिन टाटा ने फिर भी उन की कोई नोटिस नहीं ली। अंतत: दिलीप कुमार खुद टाटा से मिलने के लिए उन के पास पहुंच गए। उन के पी ए ने उन का परिचय करवाते हुए कहा कि फ़िल्मी दुनिया के बहुत बड़े स्टार हैं दिलीप कुमार। टाटा ने हाथ जोड़ कर कहा कि , ‘ लेकिन मैं तो फिल्म ही नहीं देखता कभी। समय ही नहीं मिलता किसी और काम के लिए।

ऐसे ही दिल्ली में एक कार्यक्रम में एक बार जार्ज फर्नांडीज पहुंचे। तब वह मंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में। राजेश खन्ना और राज बब्बर भी उस कार्यक्रम में उपस्थित थे। लेकिन जार्ज ने दोनों की कोई नोटिस नहीं ली। राजेश खन्ना परेशान हो गए। अंतत: आयोजक से उन्हों ने जार्ज से अपना परिचय करवाने के लिए कहा। आयोजक ने परिचय कराया कि यह राजेश खन्ना , हिंदी फिल्मों के सुपर स्टार। तो जार्ज मुस्कुराए और बोले , बंबई में रहा तो बहुत हूं पर कभी कोई पिक्चर देखने का समय ही नहीं मिला।

राजकुमार तो फ़िल्मी दुनिया के ही मशहूर अभिनेता थे। पर एक बार किसी कार्यक्रम में वह राजकुमार के बगल में बैठे पर राजकुमार ने उन की बिलकुल नोटिस नहीं ली। तो आफना कर राजेश खन्ना ने अपना परिचय खुद ही देते हुए कहा , ‘ बाई द वे मुझे राजेश खन्ना कहते हैं। ‘ और यह बात जब राजेश खन्ना ने राजकुमार से तीन-चार बार दुहराई तो राजकुमार उन से मुखातिब होते हुए बोले , ‘ यह तो ठीक है बरखुरदार पर आप करते क्या हैं ? राजेश खन्ना तब सुपर स्टार थे। तिलमिला कर रह गए।

लेकिन होता है कई बार ऐसा भी। बहुत से लोग तमाम मशहूर वैज्ञानकों को नहीं जानते। मशहूर खिलाड़ियों को नहीं जानते। अर्थशास्त्रियों को नहीं जानते। बहुत से लोग बहुत सी बात नहीं जानते। मैं भी बहुत सारी बातें नहीं जानता। अधिकांश लोग आज भी नहीं जानते कि राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , मुख्य मंत्री क्या होता है या कि कौन है। अपने ज़िले के डी एम , एस पी को भी नहीं जानते लोग। ऐसे ही बहुत से लोग टी वी , सीरियल , न्यूज़ , फेसबुक आदि सोशल मीडिया भी बिलकुल नहीं जानते। संयोग से ऐसे लोगों की संख्या बेहिसाब है। सोशल मीडिया कम्यूनिकेशन का सब से बड़ा माध्यम भले हो पर भारत का अधिकांश जनगण मन सोशल मीडिया से अभी बहुत दूर है।

हालां कि मेरा अनुमान है कि नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया से दूर नहीं होंगे। अपनी ताकत का सब से बड़ा अस्त्र-शस्त्र भला कोई क्यों छोड़ेगा ? सोशल मीडिया वैसे भी एक नशा है। एक मोहब्बत है। एक अफीम है। जो एक बार आ गया यहां , गया काम से। यह सोशल मीडिया एक मस्ती है। इस की मस्ती के मस्ताने हज़ारों की इबारत और रवायत तोड़ कर भारत में ही करोड़ो में हैं। इस की ताकत हाथी से भी बहुत ज़्यादा है। कांग्रेस आज भी रोती है कि 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा की तरह क्यों नहीं उस ने भी तब सोशल मीडिया का सहारा लिया था।

तो तय मानिए कि सिर्फ और सिर्फ केंद्रीय मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए सोशल मीडिया के बहाने ठहरे हुए जल में एक कंकड़ फेंका है नरेंद्र मोदी ने। बस ! और देखिए न लगभग सारे न्यूज़ चैनलों ने इसी विषय पर आज का अपना प्राइम टाइम न्यौछावर कर दिया। भूल गए दिल्ली दंगा , संसद का हंगामा , पश्चिम बंगाल आदि-इत्यादि। ट्रेड सेटर ने अपना काम बखूबी कर दिया है। क्रिकेट की भाषा में इसे हेलीकाप्टर शॉट कहते हैं। अब आप कैच करिए या चूकिए , यह आप जानिए।

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