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सियासत

मोदी की ताकत का प्रदर्शन तो सबने देखा, अब सब्र का परीक्षण होगा

सुशोभित-

देखें तो अंत में सब ठीक ही हुआ। निरंकुश की नकेल कसना चुनावों का मुख्य मक़सद था, जो सध गया। अगर इंडिया गठबंधन सरकार बनाने का दावा करता तो क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनते? मुझे संदेह है क्योंकि उन्होंने कभी इनकम्बेंट होने में रुचि नहीं दिखाई। चाहते तो 2004 से 2014 के बीच केंद्र में मंत्रिपद ले सकते थे। लेकिन उनका मन एक्टिविस्टनुमा प्रतिरोध में ही अधिक रमता मालूम होता है। जभी तो चुनावों के फ़ौरन बाद शेयर बाज़ार घोटाले पर प्रेसवार्ता करने बैठ गए। सरकार बनाने की तिकड़मों में रुचि नहीं ली।

अगर राहुल प्रधानमंत्री नहीं बनते तो कौन बनता? प्रियंका तो नहीं। जैसे सोनिया ने 2004 में मनमोहन का नाम आगे बढ़ाया था, वैसे इस बार क्या खड़गे जी को आगे किया जाता? यों खड़गे जी सुलझे हुए और सौम्य व्यक्ति हैं। दलित हैं। 1948 में रज़ाकारों के आंदोलन में उन्होंने अपनी माँ और बहन को गँवा दिया था, पर मन में कटुता नहीं है, ना ही इस बारे में सार्वजनिक रूप से प्रलाप करते हैं। वो पद के योग्य होते। लेकिन क्या होता अगर अखिलेश या ममता शीर्ष-पद के लिए दबाव बनाते? ये दोनों अराजकतावादी हैं और दुनिया आज बारूद के ढेर पर बैठी है। केंद्र में कांग्रेस के पीएम को ही बिठाना था।

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यदि स्पष्ट मैंडेट मिल जाता तो कांग्रेस सरकार बनाने का जतन करती। जनादेश में थोड़ी कसर रह गई तो मज़बूत विपक्ष की भूमिका ही श्रेयस्कर। अपोज़िशन की ताक़त पहले से कई गुना बढ़ चुकी है। सरकार में नीतीश-नायडु का ‘डबल-इंजिन’ लगा दिया गया है। दोनों भाई मिलकर लगाम लगाए रखेंगे। गाहे-बगाहे फ़ज़ीहतें होती रहेंगी। नीतीश जी अग्निवीर रद्द करवायेंगे, नायडु जी मुसलमानों को आरक्षण दिलवायेंगे, नहीं देने पर समर्थन-वापसी की धौंस चलेगी। अटल जी का जैसा हाल गठबंधन-सहयोगियों ने बना रखा था, वैसा हो जायेगा। अटल जी तो निबाह ले गये, साहब निभा पायेंगे क्या? ताक़त का प्रदर्शन तो सबने देखा, अब सब्र के गुण का परीक्षण होगा।

चुनाव के ज़रिए शक्ति-संतुलन स्थापित कर दिया गया है। लोकतंत्र बच गया। संविधान अक्षुण्ण रहा। राजा के मन में जनता ने अपनी ताक़त का डर बैठा दिया। अब मनसा-वाचा-कर्मणा परिवर्तन देखने को मिलेगा। परिवर्तन अंतरात्मा के बदलाव से नहीं, गठबंधन को क़ायम रखने से प्रेरित होगा- पर यही सही। जब मंत्रिपदों का बँटवारा होगा तब देखने जैसा नज़्ज़ारा होगा। सहयोगियों ने काबीना के बड़े पद माँग लिए तो क्या होगा? कोई होम मिनिस्ट्री माँग बैठा तो? नड्डा जी पार्टी अध्यक्ष पद से रिटायर हो रहे हैं। शाह साहब को वहाँ समायोजित तो कर लिया जायेगा, पर नाक नीची हो जायेगी।

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चुनावों की थकान पूरी हुई, अब लोकतांत्रिक-मनोरंजन के दिन सामने हैं। जो हुआ, भला हुआ!

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