मोहम्मद अज़ीज़ के गुजरने पर रवीश ने जैसे उन्हें याद किया, वैसा शायद ही कोई लिख पाए!

Ravish Kumar

गानों की दुनिया का अज़ीम सितारा था,मोहम्मद अज़ीज़ प्यारा था. काम की व्यस्तता के बीच हमारे अज़ीज़ मोहम्मद अज़ीज़ दुनिया को विदा कर गए। मोहम्मद रफ़ी के क़रीब इनकी आवाज़ पहचानी गई लेकिन अज़ीज़ का अपना मक़ाम रहा। अज़ीज़ अपने वर्तमान में रफ़ी साहब के अतीत को जीते रहे या जीते हुए देखे गए। यह अज़ीज़ के साथ नाइंसाफ़ी हुई। मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ बंद गले की थी मगर बंद गली से निकलते हुए जब चौराहे पर पहुँचती थी तब सुनने वाला भी खुल जाता है। एक बंद गिरह के खुल जाने की आवाज़ थी मोहम्मद अज़ीज़ की। यहीं पर मोहम्मद अज़ीज़ महफ़िलों से निकल कर मोहल्लों के गायक हो जाते थे। अज़ीज़ अज़ीमतर हो जाते थे।

एक उदास और ख़ाली दौर में अज़ीज़ की आवाज़ सावन की तरह थी। सुनने वालों ने उनकी आवाज़ को गले तो लगाया मगर अज़ीज़ को उसका श्रेय नहीं दिया। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर भी वो गायक बड़ा गायक नहीं माना गया जबकि उनके गाने की शास्त्रीयता कमाल की थी। अज़ीज़ गा नहीं सकने वालों के गायक थे। उनकी नक़ल करने वाले आपको कहीं भी मिल जाएँगे। उनकी आवाज़ दूर से आती लगती है। जैसे बहुत दूर से चली आ रही कोई आवाज़ क़रीब आती जा रही हो। कई बार वे क़रीब से दूर ले जाते थे।

फिल्म ‘सिंदूर’ के गाने में लता गा रही हैं। पतझड़ सावन बसंत बहार। पाँचवा मौसम प्यार का, इंतज़ार का। कोयल कूके बुलबुल गाए हर इक मौसम आए जाए। गाना एकतरफ़ा चला जा रहा है। तभी अज़ीज़ साहब इस पंक्ति के साथ गाने में प्रवेश करते हैं। ‘ लेकिन प्यार का मौसम आए। सारे जीवन में एक बार एक बार।’ अज़ीज़ के आते ही गाना दमदार हो जाता है। जोश आ जाता है। गाने में सावन आ जाता है।

चौंसठ साल की ज़िंदगी में बीस हज़ार गाने गा कर गए हैं। उनके कई गानों पर फ़िदा रहा हूँ। ‘मरते दम तक’ का गाना भी पसंद आता है। छोड़ेंगे न हम न तेरा साथ, ओ साथी मरते दम तक। सुभाष घई की फ़िल्म ‘राम लखन’ का गाना ‘माई नेम इज़ लखन’ उस दौर को दमदार बनाया गया था। इस गाने ने अनिल कपूर को घर-घर का दुलारा बना दिया। मोहम्मद अज़ीज़ अनिल कपूर में ढल गए थे। यह उनके श्रेष्ठतम गानों में से एक था।

मोहम्मद अज़ीज़ को काग़ज़ पर सामान्य गीत ही मिले लेकिन उन्होंने अपने सुरों से उसे ख़ास बना दिया। और जब ख़ास गीत मिले उसे आसमान पर पहुँचा दिया। महेश भट्ट की फिल्म ‘नाम’ का गाना याद आ रहा है। ये आँसू ये जज़्बात, तुम बेचते हो ग़रीबों के हालात बेचते हो अमीरों की शाम ग़रीबों के नाम। मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ ही उस वक़्त के भारत के कुलीन तबक़े को चुनौती दे सकती थी। बहुत ख़ूब दी भी । उनकी आवाज़ की वतनपरस्ती अतुलनीय है। आप कोई भी चुनावी रैली बता दीजिए जिसमें ‘कर्मा’ फ़िल्म का गाना न बजता हो। रैलियों का समां ही बँधता है मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ से।’ हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हमवतन हमनाम हैं, जो करें इनको जुदा मज़हब नहीं, इल्ज़ाम है। हम जिएंगे और मरेंगे, ऐ वतन तेरे लिए दिल दिया है, जाँ भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए ।’

हमने हिन्दी प्रदेशों की सड़कों पर रात-बिरात यहाँ वहाँ से निकलते हुए अपनी कार में मोहम्मद अज़ीज़ को ख़ूब सुना है। उनके गानों से हल्का होते हुए गाँवों को देखा है, क़स्बों को देखा है। तेज़ी से गुज़रते ट्रक से जब भी अज़ीज़ की आवाज़ आई, रगों में सनसनी फैल गई। अज़ीज़ के गाने ट्रक वालों के हमसफ़र रहे। ढाबों में उनका गाना सुनते हुए एक कप चाय और पी ली। उनका गाया हुआ बिगाड़ कर गाने में भी मज़ा आता था। फिल्में फ्लाप हो जाती थीं मगर अज़ीज़ के गाने हिट हो जाते थे।

विनोद खन्ना अभिनीत ‘सूर्या’ का गाना सुनकर लगता है कि कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो है। इस गाने को सुनते हुए अक्सर लगता रहा कि तमाम तकलीफ़ों को मिटाने ‘सूर्या’ आ रहा है। सूर्या के आते ही सब ठीक हो जाएगा। नाइंसाफ़ी से लड़ते रहना है। सुबह होगी। बाद की पढ़ाई ने समझा दिया कि मसीहा कभी नहीं आता। किसी एक के आने से सब ठीक नहीं होता है। यह सच है कि मैंने ‘सूर्या’ के इस गाने को असंख्य बार सुना है। सोचता रहता हूँ कि मुंबई के गीत लिखने वालों ने कितनी ख़ूबी से ऐसे गाने पब्लिक स्पेस में अमर कर दिए। इस गाने को आप किसी किसान रैली में बजा दीजिए, फिर असर देखिए।

जो हल चलाए, उसकी जमीं हो
ये फ़ैसला हो,आज और यहीं हो
अब तक हुआ है,पर अब न होगा
मेहनत कहीं हो, दौलत कहीं हो
ये हुक्म दुनिया के नाम लेकर आएगा सूर्या
एक नई सुबह का पैग़ाम लेकर आएगा सूर्या
आसमां का धरती को सलाम लेकर आएगा सूर्या

अज़ीज़ साहब हम आपके क़र्ज़दार हैं। आपके गानों ने मुझे नए ख़्वाब दिए हैं। लोग कहते थे कि आपकी आवाज़ लोकल है। शुक्रिया आपके कारण मैं लोकल बना रहा। मुझे इस देश के गाँव और क़स्बे आपकी आवाज़ के जैसे लगते हैं। दूर से क़रीब आते हुए और क़रीब से दूर जाते हुए। हिन्दी फ़िल्मों के गाने न होते तो मेरी रगों में ख़ून नहीं दौड़ता। आपने कई चाट गानों को सुनने लायक बनाया। कई गानो को नहीं सुने जा सकने लायक भी गाया। राम अवतार का एक गाना झेला नहीं जाता है। ‘फूल और अंगारे’ का गाना आज भी सुनकर हँसता हूँ और आपको सराहता हूँ।

तुम पियो तो गंगाजल है ये
हम पीये तो है ये शराब
पानी जैसा है हमारा ख़ून
और तुम्हारा ख़ून है गुलाब
सब ख़्याल है सब फ़रेब है
अपनी सुबह न शाम है
तुम अमीर हो ख़ुशनसीब हो
मैं ग़रीब हूँ बदनसीब हूँ
पी पी के अपने ज़ख़्म सीने दो
मुझको पीना है पीने दो
मुझको जीना है जीने दो

मोहम्मद अज़ीज़ मेरे गायक हैं। रफ़ी के वारिस हैं मगर रफ़ी की नक़ल नहीं हैं। हालांकि उनमें रफ़ी की ऊँचाई भी थी लेकिन वे उन अनाम लोगों की ख़ातिर नीचे भी आते थे जिनकी कोई आवाज़ नहीं थी। अज़ीज़ के कई गानों में अमीरी और ग़रीबी का अंतर दिखेगा। हम समझते हैं कि गायक को गाने संयोग से ही मिलते हैं फिर भी अज़ीज़ उनके गायक बन गए जिन्हें कहना नहीं आया। जो आवाज़ के ग़रीब थे। जिन्हें लोगों ने नहीं सुना। उन्हें अज़ीज़ का इंतज़ार था और अज़ीज़ मिला। आपने हिन्दी फ़िल्मों के गानों का विस्तार किया है। नए श्रोता बनाए। आप चले गए। मगर आप जा नहीं सकेंगे। लोग मर्द टांगे वाला गाते रहेंगे, इसलिए कि इस गाने को कोई कैसे गा सकता है। ‘आख़िर क्यों’ का गाना कैसे भूल सकता हूँ। यह गाना आपको रफी बनाता है।

एक अंधेरा लाख सितारे
एक निराशा लाख सहारे
सबसे बड़ी सौग़ात है जीवन
नादां है जो जीवन से हारे
बीते हुए कल की ख़ातिर तू
आने वाला कल मत खोना
जाने कौन कहाँ से आकर
राहें तेरी फिर से सँवारे

अज़ीज़ की बनाई रविशों पर चलते हुए हम तब भी गुनगुनाया करेंगे जब आप मेरे सफ़र में नहीं होंगे। जब भी हम अस्सी और नब्बे के दशक को याद करेंगे, अज़ीज़ साहब आपको गुनगुनाएँगे। आपका ही तो गाना है। ‘देश बदलते हैं वेष बदलते नहीं दिल बदलते नहीं दिल, हम बंज़ारे।’ हम बंज़ारों के अज़ीज़ को आख़िरी सलाम।

रवीश कुमार देश के जाने-माने टीवी पत्रकार हैं.

उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेरों कमेंट्स में से चुनिंदा यूं हैं….

Siddharth Kalhans वाकई अज़ीज़ को अमर कर दिया आपने। आज अखबारों में भी अज़ीज़ को वो स्पेस नहीं मिला जिसके वो हकदार थे।

Saleem Akhter Siddiqui रवीश अज़ीज़ के बारे में ऐसा शायद ही कोई लिख पाए।

Umesh Yadav महान गायक को सादर नमन।।श्रध्दांजलि।।आपकी लेखनी से बढ़ कर और सच्ची श्रद्धांजलि क्या हो सकती है?किंतु आप फिल्म ‘अमृत’ के उस कालजयी गीत का जिक्र नहीं किया है जिसकी बदौलत ही मोहम्मद अज़ीज़ को बतौर प्लेबैक सिंगर एक नई पहचान मिली।वह गीत “दुनिया मे इतना ग़म है, मेरा ग़म कितना कम है”।यह गीत आज भी लोकप्रिय है।जहां तक गीत “एक अंधेरा लाख सितारे”की बात है तो पहले यह गाना लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी किशोर दा से गवाने वाले थे।बकायदा रिहर्सल भी हो चुका था।किंतु किशोर दा को लगा कि वह गाने के साथ पूरा न्याय नहीं कर पा रहें है।किशोर दा ने ‘अमृत’ फिल्म का वह गीत सुनें थें।उन्होंने ने ही लक्ष्मी कांत-प्यारेलाल जी को मोहम्मद अज़ीज़ साहब का नाम सुझाया था।बाकी तो ईतिहास है।।

Ravish Kumar मैं ये इतिहास नहीं जानता था। शुक्रिया

Tanvir Aeijaz मैंने पटना में देखा है, मेरे दोस्त आबिद को जो मुन्ना अज़ीज़ के गानों पर और तेज़ी से अपनी सिलाई की मशीन चलाने लगता था।

Shishir Soni मुन्ना अज़ीज़ को बॉलीवुड की सियासत ने हमेशा तरन्नुम का मुन्ना समझा लेकिन वे हर दिल में घर करते गए। हर दिल अज़ीज़ होते गए। मगर कहीं खो से गए थे। भुला दिए गए थे। एक कलाकार अज़ीज़ होते हुए भी जीते जी कैसे मुन्ना बना दिया जाता है कि उसे फकत 64 की उम्र में जाना पड़ जाता है, अफसोसजनक है। बेहतरीन शब्दांजली के लिए रविश का साधुवाद।

Athar Hussain ‘Aaj kal yaad kuch aur rehta nhi, ek bs aaap k yaad aane k baad’ hamesha yaad kiye jayenge Aziz sb..

Ayaj Khan हर एक का अपना एक मोहम्मद अज़ीज़ है मेरा पसंदीदा गाना है- तुम्हारा चाहने वाला अभी दीवाना बाकी है ये शम्मा बुझ नही सकती अभी परवाना बाकी है

Atul Sehwag अजीज की आवाज बहुत ही लजीज थी, किशोर रफी और कुमार सानू उदित नारायण के बीच के दौर के खालीपन को अकेले संभाला था।

Md Aslam प्यार हमारा अमर रहेगा, याद करेगा जहां
तू मुमताज़ है मेरे ख़्वाबों की, मैं तेरा शाहे जहां

Moinuddin Rbs Chishty कहते हैं आज ‛जौक’ जहां से गुजर गया, क्या खूब आदमी था, खुदा मग़फ़रत करे।

Vishal Chandrashekhar Pandit दिल भिगो दिया आपने।सच मे ये ही है श्रद्धाजंलि। नमन अज़ीज़ साहब आपको

Javed Imran बहुत बेहतरीन लिखा सर आप ने , शायद इस से बेहतर इस मौके पर कोई और नही लिख सकता ।

Neeraj Yadav क्या खूब लिखा है, मोहम्मद अज़ीज़ को इससे शानदार श्रद्धांजलि नहीं हो सकती है. धन्यवाद.

Vishal Chaudhary बहुत उम्दा लिखा है आपने

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Comments on “मोहम्मद अज़ीज़ के गुजरने पर रवीश ने जैसे उन्हें याद किया, वैसा शायद ही कोई लिख पाए!

  • This entire article is too good ,and its much better than any leading news paper like NBT,DB,DJ,AU to name few.But since i am born in early 70`s and got an opportunity to enjoy music made by LP,RD,Rajesh Roshan,Bappi Lahiri,Kalyan ji Anandji and Khayyam Saheb
    during the first time release of the movies between 75 to 85….which in my view is golden era of Mumbai Hindi Cinema.That era was dominated by Kishore Kumar,Rafi saheb,Mukeshji,Lataji,Ashaji mainley. But still when Munna Aziz entered in bollywood his voice was similar to Shabbir Kumar…but later on Munna Aziz give an edge to all the contemporary singers and sung very loveable songs like Hum tumhe itna pyar karenge ke log hume yaad karenge,Duniya me kitna gam hai,Aye mere dost(Film Naam)….Aaj kal yaad aur kuch bhi rahta nahi……and many more…..we will miss you Munna aziz….love you for ever…Omi Singh 9310003929

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  • Ek qaabil gaayak ka jana , sanget ke is daridr dour ko aur bhi daridra bana gaya hai. mohammd Rafi sahab ke intkaal par top music director Laxmikant -Pyarelal[LP] ne kaha tha . aaj hum anaath ho gaye.
    vaastav me Rafi sahab ka aakhri waqt tak behatreen upyog LP hi kar rahe the. Dosti film se shuroo ye sath Naseeb,jani dushman, Asha, Karz, Kranti, Dostana , deshpremi se aur bhi aage jata , kintu Rafi chale gaye. aakhiri geet bhi unhone LP ki film Aas-paas ke liye gaya tha.
    Ek vaccuum tha . Rafi ki talaash ko kuchh had tak anvar aur shabbir kumar ne poora kiya, lekin Mohammad Azeez Munna ke aane par nazaara jeevant ho gaya,
    LP ko to jaise bahut badaa sahara mil gaya. Ravish kumar ji ne jitni bhi filmo ke geeton ka zikr kiya hai, unme ek-aadh ko chhod kar sabhi LP ke geet hain.
    sindoor, Nagina, Ram lakhan, Karma, Naam- ka tu kal chalaa jaaega , saudaagar ka imli ka boota, Khudaa gawaah, Hum ,aapke sath, Amrit, ajooba,Khalnaayak,Banjaaran etc. lagbhag 90 pratishat geet LP ke liye gaaye aur sur ka jaadoo bikhera.
    Aakhir kyon me Rajesh Roshan ne “ek andhera laakh sitaare ‘ geet me munna ka behatreen istemaal kya.
    Krodh film me Rafi ke prati shraddhaanjali dete hue LP-Anand Bakshi-Mohaamaad azeez ka ek yyadgaar geet kaun bhool sakta hai–
    na fankaar tujhsa tere baad aaya.
    mohammad Rafi tu bahut yaad aaya..

    inhi panktiyon ko Mohammad azeez bhai ke liye upyog karte hue us gunee, samarth gaayak ko” Bhadaas’ ke maadhyam se bhaav bhari shraddhaanjali…

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