आखिर औरतों के मामले में ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की नींद क्यों टूटती है?

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे….

पाकिस्तान की एक लेखिका हैं तहमीना दुर्रानी…. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के पूर्व गवर्नर गुलाम मुस्तफा खर से शादी और तलाक के बाद 1991 में उन्होंने एक उपन्यास लिखा था माय फ्यूडल लॉर्ड… यानी मेरे आका… यह उनकी आत्मकथा थी… इससे पाकिस्तान की सियासत में भूचाल आ गया था… इसके बाद उन्होंने ब्लास्फेमी लिखा…

हिंदी में यह उपन्यास कुफ्र के नाम से आया था… यह उपन्यास सत्ता और खुदा के एजेंट (तहमीना ने यही लिखा है) यानी धर्म गुरुओं के अनैतिक गठजोड़ की अक्कासी करता है… हीर एक मासूम लड़की है जिससे पाकिस्तान की एक दरगाह का सज्जादानशीन पीर साईं शादी करता है… और पूरा उपन्यास पीर साईं के हीर पर जुल्म, ऐय्याशियों और सत्ता से उसके गठजोड़ की बेबाक दास्तान है…

यह जिक्र यूं कि दो दिन पहले बरेली के एसएसपी ऑफिस में एक मुस्लिम महिला इंसाफ की मांग करने आई थी… 2016 में उसकी शादी हुई और इसी महीने नौ जून को उसके पति की कैंसर से मौत हो गई… इससे पहले पति की बीमारी का फायदा उठाते हुए जेठ ने रेप की कोशिश की… असफल होने पर उसे जबरन पेशाब पिलाया… पति की मौत के बाद डेढ़ माह के बच्चे के साथ उसे घर से निकाल दिया…

ऐसे दर्जनों केस हर महीने आते हैं सामने… लेकिन यहां के मौलाना-मोलवी खामोश हैं… न कोई पंचायत न कोई हिदायत… ज्यादातर प्रशासन और सत्ता से आंतरिक जुगलबंदी में व्यस्त हैं… महिलाओं के बारे में जब भी कोई कानून बनने या सुधार की बात होती है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सक्रिय हो जाता है… बाकी दिनों में यह कहां रहता है क्या करता है कुछ पता नहीं…

आखिर औरतों के मामले में ही बोर्ड की नींद क्यों टूटती है फिर चाहे शाह बानो केस हो या सायरा बानो… आखिर मर्दों के मामलों में वह कब बोलेगा…. औरत गुजारे भत्ते की बात करे या एक बार में तीन तलाक की मुखालफत करे तो इस्लाम खतरे में… मर्दों की जिनाकारी पर हर तरफ खामोशी…. दिलचस्प यह है कि बोर्ड के बड़े बारह पदों पर एक भी महिला नहीं है….

इस्लाम औरतों पर जुल्म की सख्ती से मुखालफत करता है… मर्दों द्वारा किए जा रहे जुल्मो सितम पर मौलाना साहब खामोश हैं और न बोर्ड ही इस मामले में कभी कुछ बोलता है… यह औरतों की जिंदगी को आसान बनाने की कोशिश तक नहीं करते… शरीया का राग अलापने वाला बोर्ड क्यों नहीं हर जिले में ऐसा सिस्टम बनाता है कि फैमिली के मैटर वहां निपटाए जाएं…. क्योंकि मर्द तलाक दिए बिना तीन शादियां कर सकता है लेकिन औरत की जिंदगी तलाक के कोर्ट केस में उलझकर खत्म हो जाती है और बच्चे बचपन की खूबसूरती से महरूम हो जाते हैं….

कोई बोलेगा इस बारे में… महिलाओं के मामलात में ही हमेशा मजहब खतरे में क्यों पड़ जाता है…!!!!!

ज़ाहिद-ए-तंग-नज़र ने मुझे काफ़िर जाना
और काफ़िर ये समझता है मुसलमान हूँ मैं

लेखक कुमार रहमान वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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