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सियासत

जमाखोर कार्पोरेट्स के भक्त हैं नरेंद्र मोदी!

दया सागर-

देखिए सरकारें सफेद झूठ कैसे बोलती हैं. सरकार जोरशोर से प्रचार कर रही है नए कानून से किसान अपनी उपज कहीं भी किसी राज्य में बेचने के लिए आजाद होगा. जबकि सच ये है कि किसान आज भी अपनी उपज देश में कहीं भी बेच सकता है.

देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो किसी किसान को अपना अनाज किसी को बेचने से रोके. लेकिन हल्ला मचाया जा रहा है कि किसान को आजादी मिल गई.

दरअसल आजादी किसान को नहीं मिली है. आजादी कारपोरेट जगत को मिली है कि वह कहीं से किसी किसान से सीधा माल खरीद सकेगा. वह भी बिना मंडी टैक्स या कोई और टैक्स दिए.

वह न सिर्फ जितना चाहे माल खरीद सकेगा बल्कि उसे जमा भी कर सकेगा, क्योंकि नए एक्ट में जमाखोरी कानून भी खत्म किया जा रहा है.

अब तक कोई भी व्यापारी केवल मंडी से ही टैक्स देकर किसानों की उपज खरीद सकता था. नए बिल ने व्यापारी की इस मजबूरी को खत्म कर दिया है. तो ये बिल किसके हित में है अब ये बताने की जरूरत नहीं है.

मान लीजिए मेरे पास 100 कुंतल गेहूं है. मैं उसे किसी बिचौलिए या मंडी को नहीं बेचना चाहता. क्योंकि मेरे गेहूं की क्चालटी बहुत अच्छी है इसलिए राजस्‍थान का एक फ्लोर मिल वाला मुझसे सीधा गेहूं खरीदना चाहता है. मैं 100 कुंतल गेहू ट्रक से लेकर फ्लोर मिल जाऊंगा. मेरे पास खसरा खतौनी का प्रमाण है कि मैं किसान हूं. इसलिए मुझे कानूनन कोई नहीं रोक सकता.

अब फ्लोरमिल वाले के पास दो विकल्प हैं. एक ये कि बिना लिखत पढ़त में दिखाए मेरा गेहूं खरीद लें जो उसके लिए खतरे से खाली नहीं. दूसरा कानूनी विकल्प उसके पास ये है कि वो ढाई फीसदी मंडी शुल्क लेकर वह गेहूं मुझसे खरीदे और वह शुल्क मंडी में जमा कर दे.

इस तरह किसान को आजादी है कि वह अपना माल कहीं भी किसी को बेचे. लेकिन व्यापारी को ढाई फीसदी मंडी शुल्क तो मंडी को चुकाना ही होगा. अब नया कानून ने उस व्यापारी को इस मंडी शुल्क से मुक्त कर दिया है.

मैं आपको बता दूं नियमतः मंडी शुल्क के रूप से मिले इस पैसे को कायदे से किसानों और मंडियों को मजबूत करने के लिए लगना चाहिए. लेकिन ये अब तक जाता था राजेनताओं और भ्रष्ट मंडी अफसरों की जेब में.

ये सही है कि कोई किसान की कॉलर पकड़ कर अनाज खरीदने पर मजबूर नहीं करने जा रहा है. लेकिन खुले बाजार में जब रेट ही 1400 रु. प्रति कुंतल होगा गेहूं का तो कोई भी इससे ज्यादा में क्यों कर खरीदेगा? वो कारपोरेट हो या गांव का बनिया. अभी जब सरकार ने एनएसपी बांध रखी है 1975 रु. प्रति कुंतल की तो किसान के पास विकल्प है कि वह सरकार को अपना अनाज बेच दे.

कल या अगले 5 साल बाद सरकार WTO के दबाव में एनएसपी खत्म कर देगी तब क्या होगा? आप कहेंगे सरकार कहां कह रही है कि वह एनएसपी खत्म करने जा रही है। किसान कह रहे हैं तो ठीक है आप एक कानून ला दीजिए ‌कि एनएसपी नहीं खत्म करेंगे। वह भी आप नहीं करना चाहते.

किसान कह रहे हैं ठीक है ये कानून बना दीजिए कि कोई भी व्यापारी, कंपनी या कारपोरेट एनएसपी से कम दाम पर किसान से उपज नहीं खरीद सकता. ये भी सरकार नहीं कर रही. क्यों? क्योंकि बाजार के नियम इसकी इजाजत नहीं देते. अब समझे आप?


इसी मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार शिशिर सोनी का लिखा पढ़ें-

https://www.bhadas4media.com/naye-kisan-kanun-se-kisko-fayda/

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