‘एनडीटीवी का पतन क्यों हुआ?’ इस पर मैं एक उपन्यास लिख सकता हूं

Samarendra Singh

पब्लिक का पाखंड और एनडीटीवी के घड़ियाली आंसू! कुछ दिन पहले विकिपीडिया ने एक रिपोर्ट जारी की थी। भोजपुरी समाज में उस रिपोर्ट पर काफी बवाल मचा। ज्योति यादव ने द प्रिंट पर रिपोर्ट फाइल की तो लोग उनके पीछे पड़ गए। लोगों ने कहा कि भोजपुरी समाज को बदनाम करने की साजिश है। अब कोई सर्च इंजन और सर्च साइट इसमें क्या साजिश करेगा? और सिर्फ भोजपुरी समाज के साथ ही साजिश क्यों करेगा? लेकिन लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि हमारा समाज ऐसा ही है। कुंठित और दमित।

यहां सेक्स पर चर्चा निषेध है। राजेंद्र यादव जी कहते थे कि You can piss in public, you can shit in public but you can not kiss in public. इसलिए चर्चा सब अच्छी अच्छी करते हैं। राम की बात करेंगे, व्यवहार रावण जैसा होगा। कृष्ण की बात करेंगे, आचरण दुर्योधन जैसा होगा। ठीक उसी तरह यह पूछा जाए कि कौन सा चैनल देखते हो तो कहेंगे हम तो एनडीटीवी देखते हैं। और असल में क्या होता है – देखते आज तक हैं। देखते इंडिया टीवी हैं। देखते रिपब्लिक टीवी हैं।

हमेशा से यही होता है। ये लोग काल कपाल महाकाल देखेंगे, स्वर्ग की सीढ़ी देखेंगे, नाग नागिन की शादी देखेंगे, यमराज से मिला गजराज देख लेंगे। बिना ड्राइवर की कार देखेंगे। यू-ट्यूब के फर्जी वीडियो देख लेंगे। और कुछ नहीं तो धाकड़ लड़कियां देख लेंगे। सारा झूठ झमेला देख लेंगे और कोई टोकेगा कि ये क्या देख रहे हो .. तो कहेंगे तौबा…तौबा!

एनडीटीवी का पतन क्यों हुआ? इस पर मैं एक उपन्यास लिख सकता हूं। वह पतन इसलिए हुआ कि डॉ प्रणय रॉय हमेशा सरकार और बाजार के भरोसे की बात करते थे। उन्होंने पब्लिक के भरोसे की बात ही नहीं की। इसी चक्कर में उन्होंने अपने चैनल में एक से बढ़ कर एक पंटर पाल कर रखे थे। एक समय तो एनडीटीवी का ढांचा गैंडे जैसा था। पैर पतले-पतले और शरीर विशालकाय। काम करने वाले गुर्गे थोड़े से और राजा लोग एक खांची।

न्यूज रूम में जिधर नजर दौड़ाइए – कोई राजा अकड़ते हुए, देह ऐंठते हुए दिखाई देता था। लगता था कि हिंदी मीडिया के आधे से अधिक मठाधीश एक ही चैनल में भरे हुए हैं। अंग्रेजी के तो सारे एक ही जगह थे। हेडलाइन्स टुडे (आज के इंडिया टुडे) वाले बच्चा लोग की फौज जुटा कर चैनल चलाते थे। उनका संपादक भी बच्चों जैसे उछलता था। बात बात में लहराने लगता था। खैर, वो लहराता आज भी वैसे ही है। कुछ लोग जीवन भर हवा में संतुलन बनाते रह जाते हैं।

एनडीटीवी के 25 साल होने पर एक जलसा हुआ था। ऐतिहासिक जलसा। हम लोग चर्चा करते हैं कि किसी निजी कंपनी के विज्ञापन में प्रधानमंत्री की फोटो कैसे छप सकती है? लेकिन यहां पर एक निजी मीडिया कंपनी, वो भी वैसी कंपनी जिसका विजय माल्या की शराब कंपनी के साथ करार था, उस कंपनी का कार्यक्रम राष्ट्रपति भवन में हुआ। राष्ट्रपति भी कमाल के थे। जीवन भर कांग्रेस में रह कर मलाई खाते रहे और जब अंतिम समय नजदीक आया तो पुण्य कमाने संघ के दरबार में चले गए।

खैर, उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में डॉ रॉय ने ट्रस्ट (भरोसे) की बात की। किसके भरोसे की? कोई मीडिया संस्थान किसका भरोसा हासिल करना चाहेगा? जनता का भरोसा। उन बेजुबानों का भरोसा जिसकी जुबां बनने का दावा किया जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। डॉ रॉय ने वहां मौजूद रईसों, कारोबारियों और नेताओं के भरोसे की बात की। खुल कर कहा कि बाकी सारे चैनल टैबलॉयड हो गये हैं और बीबीसी, सीएनएन जैसा चैनल बनाने की क्षमता एनडीटीवी में है, इसलिए विज्ञापन देने वालों को उन पर भरोसा करना चाहिए और साथ देना चाहिए।

एक थके हुए, उबाऊ, मुरझाए हुए चेहरों वाले संस्थान का साथ बाजार क्यों देगा? सिर्फ इसलिए कि वो काल कपाल महाकाल नहीं दिखाता है। सिर्फ इसलिए कि वो भाषण देता है। सिर्फ इसलिए कि वहां एक से बढ़ कर फ्रॉड हैं।

यह पूछा जाए कि पिछले 7-8 साल में एनडीटीवी ने कितनी बड़ी खबरें ब्रेक की हैं? 20, 10, 5 … मुझे तो एक भी खबर नजर नहीं आ रही। यह भी पूछा जाए कि इनके पास कितने शानदार रिपोर्टर हैं? 20, 10 … मुझे तो कोई ऐसा रिपोर्टर नजर नहीं आ रहा जिसे देख कर कहा जाए कि रिपोर्टर ऐसा होना चाहिए। सब खाए-पीए- अघाए लोगों का अड्डा है। कोई शायरी करने लगता है। कोई मोजो में इतिहास रच रहा है। पत्रकारिता करने की जगह तमाशा रच रहा है। नौटंकी रच रहा है। कुछ पहले के लोग हैं जो किसी तरह इस चैनल को टिकाए हुए हैं। उन्हें छोड़ दिया जाए तो ये चैनल और संस्थान पूरी तरह खोखला हो चुका है।

फिर भी सर्वे कराते हैं कि लोग इन्हें ज्यादा देखते हैं। ये सरासर झूठ है। संभव ही नहीं। जिस खबरिया चैनल में खबर नहीं हो, जिस चैनल में मनोरंजन नहीं हो, जिस चैनल में ग्लैमर भी नहीं हो… उसे पब्लिक क्यों देखेगी? हां, ये जरूर होगा कि पूछने पर पब्लिक पाखंड रचने की कोशिश करे। पब्लिक कम पाखंडी नहीं होती। लेकिन देखने की बारी आएगी तो लोग रिपब्लिक ही देखेंगे। थोड़ा अतिरिक्त समय मिलेगा तो इंडिया टीवी देख लेंगे। और अतिरिक्त समय होगा तो आज तक पर किसी चिड़िया को चहचहाते देख लेंगे।

कोई एकदम खलिहर होगा तभी पंडित रवीश कुमार का एक ही प्रवचन रोज-रोज सुनेगा। वो सुनने के लिए बड़ा मजबूत कलेजा चाहिए और बिल्कुल ठस दिमाग। ऐसे मजबूत कलेजे और ठस बुद्धि वाले लोग बहुत थोड़े होते हैं। ये रेयर ब्रीड होती है। रवीश जी को इस ब्रीड का एहसान मानना चाहिए। कुल मिला कर टीआरपी के बारे में रवीश जी का प्रपंच एकदम बेबुनियाद है। उन्हें सौ में दो लोग ही देखते हैं। ये जो दो लोग हैं इन पर मुकदमा होना चाहिए। कोई इतना मूर्ख कैसे हो सकता है?

लिखते रहना है। सब दर्ज करते रहना है। चैनल में कोई कंटेंट नहीं है। एजेंसियों के भरोसे चैनल चल रहा है। आधी से अधिक गड़बड़ी इन्हीं लोगों की फैलायी हुई है। सब चौधरी बने घूम रहे हैं। और काम करने की जगह मौका मिलते ही रोना शुरू कर देते हैं।

सोच रहा हूं कि एनडीटीवी पर एक वेबसाइट लॉन्च कर दूं। एनडीटीवी का सच या फिर ऐसा ही कोई और नाम। मैंने कुछ नहीं तो अब तक 30-40 हजार शब्द लिखे होंगे। उन सभी को वहां पर संकलित कर देता हूं। कुछ नए अध्याय भी जोड़ देता हूं। एनडीटीवी और रवीश कुमार के भक्तों की संख्या भी काफी ज्यादा हो गई है और ये भी नरेंद्र मोदी के भक्तों की ही तरह बर्ताव करते हैं। ट्रोल करते हैं। दूसरों की वॉल पर जाकर बदतमीजी करते हैं।

रवीश कुमार रोते हैं कि नरेंद्र मोदी के भक्तों ने उन्हें परेशान कर रखा है। और इनके अपने भक्त दूसरों को परेशान करते हैं। उनके आंसुओं का बदला दूसरों से लेते हैं। यही संस्कृति इन्होंने विकसित की है। इन्हें सबके ऊपर लिखने का अधिकार चाहिए इस शर्त के साथ कि कोई इनके ऊपर कुछ न लिखे।

आज से 12 साल पहले मैंने अपने ब्लॉग चौखंबा पर लिखा था कि एनडीटीवी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म किसी भी दिन आज तक स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से अधिक खतरनाक है। मेरी बात सौ फीसदी सही थी। अर्णब गोस्वामी भी एनडीटीवी स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के छात्र रहे हैं। वहीं से उन्होंने शुरुआत की है। राजदीप के साथ वहीं पर वो शो किया करते थे। अर्णब गोस्वामी और डॉ प्रणय रॉय का एक ही क्लास है।

दोनों की प्रतिबद्धता अपने अपने सियासी धड़े के प्रति है। जनता और विचारधारा से प्रतिबद्धता नहीं है। इनकी नजर में विचारधारा का अर्थ सियासी दल है। जनता का मतलब सत्ताधारी गुट है। डॉ प्रणय रॉय ने हमेशा बड़ी बेशर्मी के साथ अपने सियासी गुट की सेवा की और अब अर्णब गोस्वामी भी उसी बेशर्मी के साथ अपने सियासी गुट की सेवा कर रहे हैं। जो थोड़ा बहुत अंतर दिखता है वो बाहरी आवरण का है। भीतर से दोनों एक हैं।

एनडीटीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे पत्रकार समरेंद्र सिंह की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार मौका मिलते ही बाकी सारे चैनलों पर कूद पड़ते हैं!

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Comments on “‘एनडीटीवी का पतन क्यों हुआ?’ इस पर मैं एक उपन्यास लिख सकता हूं

  • अमित प्रकाश says:

    समरेंद्र जी, आपको किसी ने मना किया है क्या उपन्यास लिखने के लिए.. लिखिए ना कौन रोक रहा है आपको.. इस तरह का ज्ञान देने के बजाय अगर उपन्यास लिख ही लेते तो शायद उसकी बिक्री से कुछ पैसा जरुर मिल जाता.. और बेरोजगारी में इससे अच्छी बात क्या होगी.. सोचिए इस ओर और कोई डेडलाइन बताइये कि कब लोग पढ़ सकेंगे आपका ज्ञान.. फेसबुक और भड़ास को बख्शिए…

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  • Suniel yadav says:

    Inko ndtv dekhnewale murkh samajh aa rahe hai, aapki samajhdari pe taras aata hai, ndtv pe jo bhi reporter aur anchor aate hai wo aam logo se judi khabre dikhate hai iske bawjood inhe koi kabil patrkar ndtv pe nahi dikha, andarkhane pranav Roy aur baaki dusre senior log ho sakta hai galat ho, lekin kam se kam wo aam logo se judi khabre dikhane ka dikhawa to kar rahe hai, baaki channel s to wo bhi nahi kar rahe

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