मालेगांव कांड सुनवाई में मीडिया नहीं चाहती NIA, पत्रकारों ने कोर्ट में डाला हस्तक्षेप आवेदन

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) नहीं चाहती कि साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित एवं अन्य आरोपियों के विरुद्ध मालेगांव बम विस्फोट मामले में खुली अदालत में सुनवाई हो। एनआईए ने विशेष न्यायाधीश वी. एस. पडलकर की अदालत में आवेदन दाखिल कर कहा है कि मालेगांव धमाका मामला सांप्रदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था से संबंधित है, इसलिए इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए मामले की सुनवाई बंद कमरे में की जाए। इस मामले में अनावश्यक पब्लिसिटी से बचने की जरूरत है।

इस बीच, विभिन्न मीडिया संस्थानों के पत्रकारों के एक समूह ने विशेष अदालत के समक्ष हस्तक्षेप आवेदन दायर किया है और यह अनुरोध किया है कि उन्हें भी उत्तरदाताओं के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। विशेष न्यायाधीश वी. एस. पडलकर बुधवार को एनआईए अधिनियम की धारा 17 (1) और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम की धारा 44 (1) के तहत दायर एनआईए के आवेदन के साथ पत्रकारों द्वारा दायर आवेदन पर भी सुनवाई करेंगे।

एनआईए ने आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित द्वारा वर्ष 2016 में इन-कैमरा कार्यवाही करने के लिए दायर अर्जी की अनुमति देने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को आधार बनाया है जिसमें ट्रायल कोर्ट ने आंशिक रूप से इस प्रार्थना को अनुमति देते हुए उनके खिलाफ आरोप तय करने की कार्यवाही को इन-कैमरा करने को कहा था।हस्तक्षेप करने वाले पत्रकारों के समूह ने तर्क दिया है कि एनआईए सीमित अवधि के लिए और विशिष्ट परिस्थितियों में पारित आदेश पर भरोसा नहीं कर सकता है। वकील रिजवान मर्चेंट और गायत्री गोखले पत्रकारों के समूह का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

एनआईए ने अपने आवेदन में कहा कि आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने मुस्लिम जिहादियों से बदला लेने और दो समुदायों के बीच दरार पैदा करने के लिए मालेगांव धमाके को अंजाम दिया।मालेगांव को बम धमाके के लिए इसलिए चुना गया, क्योंकि यह मुस्लिम बहुल इलाका था।इन सब बातों को ध्यान में रखकर और समाज में सौहार्द बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मामले की सुनवाई बंद कमरे में हो और इसे पब्लिसिटी से दूर रखा जाए।

गौरतलब है कि इससे पहले एक विशेष सीबीआई न्यायाधीश ने मीडिया को तुलसीराम प्रजापति और सोहराबुद्दीन शेख के कथित फर्जी मुठभेड़ के ट्रायल की रिपोर्टिंग करने से रोक दिया था। पत्रकारों के समूह द्वारा चुनौती देने पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने 4 फरवरी, 2018 को उक्त मीडिया गैग आदेश को रद्द कर दिया था। जस्टिस रेवती मोहिते डेरे ने कहा था कि प्रेस एक लोकतंत्र में सार्वजनिक हित का सबसे शक्तिशाली प्रहरी है।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम की धारा 17 ‘गवाहों के संरक्षण’ और उप-धारा (2) कहती है कि इस तरह के गवाह के संबंध में या सार्वजनिक अभियोजन पक्ष की ओर से किसी भी कार्यवाही में किसी गवाह द्वारा किए गए आवेदन पर या उसके स्वयं के प्रस्ताव पर, यदि विशेष अदालत इस बात को लेकर संतुष्ट है कि इस तरह के गवाह का जीवन खतरे में है तो यह कारणों को लिखित रूप में दर्ज कर ऐसे उपाय करे जो यह इस तरह के गवाह की पहचान और पते को गुप्त रखने के लिए उपयुक्त है। हस्तक्षेप आवेदन में पत्रकारों ने खा कहा है कि एनआईए ने किसी भी विशिष्ट परिस्थिति का हवाला नहीं दिया जहां गवाह के जीवन के लिए खतरा बताया गया हो। इसके अलावा, आवेदन में यह तर्क दिया गया है कि यहां तक कि अगर किसी भी गवाह के लिए कोई खतरा या धमकी की आशंका है तो गवाह संरक्षण कार्यक्रम के तहत उनकी सुरक्षा बढ़ाई जा सकती है। इसलिए मीडिया पर प्रतिबंध लगाना किसी भी परिस्थिति में आवश्यक नहीं है।

गौरतलब है कि पिछले हफ्ते बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस इंद्रजीत महंती और जस्टिस ए. एम. बदर की पीठ ने प्रसाद पुरोहित की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनआईए को विशेष अदालत के समक्ष आवेदन दाखिल करने के लिए स्वतंत्रता प्रदान की थी, जिसमें इस मामले के 38 गवाहों को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने की मांग की गई थी। अभियोजन पक्ष ने अब तक 124 गवाहों की जांच की है।

इस बीच मामले के एक आरोपी समीर कुलकर्णी ने कोर्ट से कहा है कि मैं मामले की बंद कमरे में सुनवाई करने की एनआईए की मांग वाले आवेदन को सिरे से खारिज करता हूं।मैं चाहता हूं कि मामले की सुनवाई खुली अदालत में हो।इस मामले में कुलकर्णी ने अपना जवाब भी तुरंत दाखिल कर दिया है।

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