मोदी के सलाहकारों ने एक न्यूज चैनल के जरिए वैदिक जी को एक्सपोज करवा दिया : ओम थानवी

Om Thanvi : मुझे ऐसा शुबहा होता है कि बाबा रामदेव का हाथ सर पर लेकर वैदिकजी मोदी के दरबार में अपनी “कूटनीतिक योग्यता” का डंका पीट रहे थे कि कहीं राजदूत बना दिए जाएं; लेकिन मोदी या उनके सलाहकारों ने एक टीवी चैनल के जरिए उनको खुद एक्सपोज करवा दिया। न रहा बांस, न बजी बांसुरी। बाद को रही-सही कसर अपने बड़बोलेपन और प्रचार की भूख में वैदिकजी ने खुद पूरी कर दी। इतनी कि कोई उम्मीद लेकर कहीं उठने -बैठने लायक भी नहीं रह गए।

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

वैदिक ने कल एनडीटीवी पर जनसत्ता अखबार के सरकुलेशन का जिक्र करते हुए ओम थानवी पर कमेंट किया था… इसको लेकर एफबी पर आईं कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं…

Dhirendra Pandey : वैदिक जी ने टीवी पर थानवी जी को कहा जनसत्ता दस बीस हजार छपता है मुझे करोड़ो लोग टीवी पर देख रहे हैं। कई बार उन्होंने ये भी आभास कराया कि वैदिक जी इतने सारे प्रधानमन्त्रियों को विदेशी राष्ट्र्नेताओं को करीब से जानते हैं। तब से मैं ये सोच रहा हूँ की शारापोवा सचिन को भले न जानती हों वैदिक जी को निश्चित रूप से जानती होगी |

शिवानन्द द्विवेदी सहर : मैं व्यक्तिगत तौर पर वेद वैदिक जी द्वारा एनडीटीवी पर दिये गए उस बयान की निंदा करता हूँ जिसमे उन्होंने जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी जी को कहा “थानवी जी ! आपका अखबार 20-30 हजार छपता है जबकि मुझे करोंडो लोग टीवी पर देख रहे हैं”। यह बोलते हुए वैदिक जी का दंभ छल-छला कर बाहर आ गया। ऐसा बयान देकर वैदिक जी बड़े होते-होते एकबार फिर सरेआम बौने हो गए। हालांकि सुबह से ही वो कम से कम पचास बार बोल चुके हैं कि तमाम प्रधानमंत्री उनके मित्र रहे हैं। आत्ममुग्धता बुरी बात है वैदिक जी, खासकर तब जब बड़े कद का व्यक्ति बोले।

Samar Anarya :  जनसत्ता का सर्कुलेशन चाहे जितना हो वेदप्रताप वैदिक साहब, लोग आज भी खबरों के लिए जनसत्ता और द हिन्दू ही पढ़ते हैं, पांचजन्य नहीं. वह भी इलाहाबाद-गोरखपुर जैसे शहरों में एक दिन इन्तेजार के बाद.

पत्रकार के बतौर मिलने पर इंटरव्यू लिया जाता है, उसे छापा जाता है भाई. कहाँ है वह इंटरव्यू? छपा क्यों नहीं अब तक? संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य ने वेदप्रताप वैदिक की पाकिस्तान यात्रा और नवाज शरीफ से मुलाकात की बात छापते हुए भी हाफ़िज़ सईद वाला गुल क्यों कर दिया?

वेदप्रताप वैदिक को दोतरफा सलाम. पहला संघियों का असली चरित्र उजागर करने के लिए और दूसरा अर्नब गोस्वामी को चिल्ला के चुप करा देने के लिए. दूसरे वाले पर तो मैं उनके लिए पत्रकारिता के शिखर सम्मान की भी मांग करता हूँ, कसम शराब पाक की, न्यूज़आवर (विद अर्नब, ऑफ कोर्स) की रिकार्डिंग देख के कलेजे को जो ठंडक मिल रही है उसका कोई मुकाबला नहीं.

वैदिक को लेकर एफबी पर प्रकाशित कुछ अन्य स्टेटस…

Prashant Tandon : देख रहा हूँ भक्त गण वैदिक – हाफिज़ सईद मुलाकात पर लीपा पोती कर रहे है. ये जोखिम भरा काम है. बात उतनी सीधी है नही जितना वैदिक जी बता रहे है. दो बाते साफ है – एक तो वैदिक जी कोई इंटरव्यू नही लेने गये थे और दूसरा वो जो भी कर र्हे थे वो अपनी मर्ज़ी से नही कर रहे थे. ये कोई track 2 कारनामा था जिसमे कही कोई शार्ट सर्किट हुआ है. ये मोदी सरकार का बडा scandal है. ये लोग पहले भी मह्सूद अज़हर को सौंप चुके है.

Vineet Kumar : लीजिये मीडिया के कद्रदान..अब हाफ़िज़ सईद और आत्ममुग्ध पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की मुलाकात रियलिटी शो में कन्वर्ट हो गयी..mtv rodies, बिग बॉस, splitvillaz जैसे शो से लौटे प्रतिभागी की तरह वैदिक लाइव बता रहे हैं कि कैसे-कैसे क्या-क्या हुआ और कैसे मिले..लोग दूसरे की तारीफ़ में कसीदे पड़ते हैं, साबजी तो स्वरचित वैदिक चालीसा पाठ करने में लगे हैं. पंक्ति दर पंक्ति अपनी हिम्मत, चतुरता, साख और वैराग्य वृत्ति का बखान..कल होते-होते ये शख्स लोहे जुटाकर अपनी मूर्ति निर्माण की मांग न कर बैठे.

वेद प्रताप वैदिक यदि अपने माद्दे से वर्ल्ड मोस्ट वांटेड हाफिज सईद से मिल आये और उनकी मुलाकात में सरकार की ओर से कोई मदद या भूमिका नहीं रही है तो मैं मीडिया मंडी के इस मसीहा को सलाम करता हूँ. नहीं तो यहाँ तो आलम ये है कि फील्ड की रिपोर्टिंग तो छोडिये, एडिटिंग मशीन पर संतान पैदा करने में एक दर्जन स्पांसर्स के बिना काम नहीं चलता..वेद प्रताप वैदिक ने ऐसे समय में घनघोर महान काम किया है जबकि बाकी के मीडिया महंत और जिनमे वो खुद भी शामिल हैं, छोटे-छोटे घरेलू मुद्दे पर न केवल चुप मार जाते हैं बल्कि सिस्टम के आगे लोटने लग जाते हैं. रही बात वैदिक की विश्वसनीयता की तो इस तरह की पत्रकारिता का पहले कभी न तो उनका रिकॉर्ड रहा है और न ही जोखिम पत्रकारिता का कोई नमूना ही सामने है. अचानक तितर के हाथ बटेर लगने की स्थिति में सवाल उठना स्वाभाविक है. इन सबके बीच bea के महासचिव एन.के.सिंह का ये कहना कि जो भी वैदिक का विरोध कर रहे हैं, वो संकीर्ण पत्रकारिता का नमूना पेश कर रहे हैं, वो हैरान नहीं करता बल्कि ये साबित करता है कि महत्वपूर्ण मुद्दे पर चुप्पी के बाद का प्रलाप ऐसा ही होता है. रही बात स्वयं वैदिक के तर्क कि हमने जब इंदिरा गाँधी के लिये ये सब नहीं किया तो अब क्यों करेंगें, इसका मतलब कि पत्रकारिता के स्तर पर उनके पास कोई ठोस तर्क नहीं है..ये सही है कि आतंकवादी से मिलकर कोई आतंकवादी नहीं हो जाता लेकिन ये भी हम अपने ही देश में देखते आये हैं कि नक्सली पर लिखने और उनसे मिलनेवाले लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता नक्सली करार दे दिये जाते हैं..कुछ नहीं तो वैदिक जी को लोगों की नहीं तो सरकार की भावना का सम्मान तो करना ही चाहिये..

Mansi Manish : वेद प्रताप वैदिक पत्रकारिता के नाम पर शर्म है। उसे पत्रकार कहना बंद करो, वो राष्ट्रवादी संघी बाबा रामदेव का चेला है। न जाने कब भेस बदलकर भाग ले। Arnab goswami ने आज इसे सही धोया।

Rajat Amarnath : वेद प्रताप वैदिक तो आज के समय के ‘बुद्ध’ बन गये क्या हाफ़िज़ सईद का ‘अंगुलीमाल’ की तरह ह्रदय परिवर्तन करवा पाये? उस पत्रकार का स्तर आप इसी बात से लगा सकते हैं जो अपने से कम उम्र के नेता को अपना बड़ा भाई बताए…..ज़रा हर न्यूज़ चैनल पर सुन लीजिये ‘वेद प्रताप वैदिक’ को।

Sanjay Tiwari : असल में वैदिक जी बुद्ध बनकर सईद को शुद्ध करने गये थे. स्साला! ये मिडिल क्लास कंट्री हमारे समय के महात्मा बुद्ध को पहचान ही नहीं पा रहा है. अब बगदादी को शांति संदेश देने इराक कब जा रहे हैं वैदिक जी?

Ashok Azami : हाफ़िज़ सईद के इंटरव्यू की कोशिश में जब मुझपर हमले हुए तो मुझे कई जर्नलिस्ट के मुझे फोन आए। कुछ ढाल बनकर मेरे आगे खड़े हो गए तो कई मुझपर चीखते रहे। एक प्रतिक्रिया कुछ यूं थी कि तुम इंडिया के मोस्ट वांटेड आतंकवादी का इंटरव्यू करोगे। उसपर मुंबई अटैक समेत कई आतंकी हमलों के इल्ज़ाम हैं। वह बात करने के लायक नहीं है। अगर वह मेरे सामने पड़ जाए तो मैं उसे उड़ा दूंगा। ज़िंदगी में पहली बार मैं इस क़दर तनाव से घिरा हुआ था। बिना किसी बहस के मैं सिर्फ उन्हें सुनता रहा और जी, जी करता रहा। लेकिन खरा सवाल यह है कि हाफिज़ सईद को उड़ाने से क्या होगा। सईद को उड़ाने पर बगदादी की तरह पाकिस्तान में कोई नया ख़लीफ़ा क्यों नहीं पैदा होगा? मेरी कोशिश का मक़सद बिल्कुल साफ था। मैं सईद से ख़ूनखराबे के मायने पूछने और उसके जीवन में शांति की अहमियत जानने के लिए उत्सुक था। बीबीसी से बातचीत में वेद प्रताप वैदिक कहते हैं कि मैंने अपनी जान पर खेलकर भारत के लिए बहुत बड़ा काम किया है. दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध बनाने के लिए नेक काम किया है. मेरा बचाव करने की किसी को ज़रूरत नहीं है.” अगर वाक़ई वैदिक की मंशा यही थी तो मेरा सीधा सवाल है कि यह नेक काम सिर्फ कोई वेद प्रताप वैदिक क्यों करेंगे? कोई शाहनवाज़ मलिक क्यों नहीं कर सकता? यह Shahnawaz Malik ने लिखा है. Pushya Mitra भाई, हमें शिकायत है तो सिर्फ इतनी है. बाक़ी किसी को भी किसी से मिलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.

Rahul Ayodhya :  जब मैनें पूर्व सि‍मी अध्‍यक्ष डा.शाहि‍द बद्र फलाही का इंटरव्‍यू पब्‍लि‍श कि‍या था तो पुलि‍स ने उनके साथ साथ मेरा भी मोबाइल सर्विलांस पर लगाया था। कौनो ससुर पेशेवर आतंकवादी का इंटरव्‍यू लेकर आया है, का उसका भी मोबाइल सर्विलांस पर लगा है कि बस अइसे ही थेथरई हो रही है।

Vineet Kumar : देश के प्रिय बाल दर्शकों ! अगले दो दिनों तक कार्टून चैनल्स को छोड़कर हिंदी या अंग्रेजी के किसी भी न्यूज़ चैनल को देखना शुरू करो. इन पर वेद प्रताप वैदिक नाम के एक ऐसे शख्स अवतरित हुये हैं जो तुम्हारे टॉम न जेरी और डोरेमन से भी ज्यादा बहादुर और चमत्कारी हैं..तुमने अगर इनके कारनामे इनकी ज़ुबान से सुन ली न तो तुम्हारे कार्टून के सारे हीरो इनके इंटर्न लगेगें, यहाँ तक कि छोटा भीम भी..

Ravi Prakash : बहुत कम लोग जानते होंगे कि इन्हीं वैदिक ने स्वामी वेदांतानंद बनकर 2004 के उज्जैन में लगे कुंभ में क्षिप्रा किनारे अपनी कुटिया तान दी थी और संन्यासी हो गए थे। ठीक पत्रकार माधवकांत मिश्रा की तरह। पर बाद में पता नहीं क्या हुआ कि फिर वे पत्रकार के रूप में लौट आए। तो क्या यह उनके बहुरुपिया फॉरमेट का एक नया अंदाज है और ये मान लिया जाए कि वे अभी अपने और रूपों में भी प्रकट होने वाले हैं?

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Comments on “मोदी के सलाहकारों ने एक न्यूज चैनल के जरिए वैदिक जी को एक्सपोज करवा दिया : ओम थानवी

  • इंसान says:

    बचपन में मैंने अकसर लोगों को पखाने में अख़बार ले जाते देखा था| एक बार पूछने पर किसी बुजुर्ग ने बताया था कि बिना अख़बार पढ़े टट्टी नहीं उतरती है| हिंदी अंग्रेजी की भारतीय अखबारों में विषय वस्तु पढ़ मुझे ऐसा लगता है कि ये अख़बार केवल टट्टी उतारने के काम ही आ सकते हैं| और जब कभी कोई पखाने से बाहर आ कर भी इन्हें पढता है तो समझ ली जिए उस व्यक्ति का स्वभाव आवाजाही-कानाफूसी के दायरे में सिमिट कर रह गया है| वह निरा निकम्मा और आलसी वाद-विवाद की पींग पर हिडोले ले रहा है|

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  • bhai apne itne informative site ko accha bnane ke bjaye kejriwal ka gaar chatne wala kyo bna rahe ho…mediaite ek media site hai usa mei jispe saare viewpoint kei logon ka view rakha jaata hai…per tum to saaf chaaploosi ka limit paar kar rahe ho..tmko lagta hai ki sab aam aadmi tmhara spporter hai..kis gaflat mei ho galatfahmi door nahi hui hai kya tmhari 96% ka jamaanat jabta hua tha

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