जानिए, आरएसएस के लिए ओवैसी जी कितने महत्वपूर्ण हैं!

राकेश कायस्थ-

2014 में `मोदी मैजिक’ के दम पर बीजेपी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ चुकी थी। उसके कुछ ही महीने बाद महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव हो रहे थे। उन दिनों मेरा ड्राइवर एक मुसलमान नौजवान हुआ करता था।

एक दिन रास्ते में मैंने उससे पूछा– तुमने किसको वोट दिया.. दिलशाद?

उसने थोड़ा पॉज लेते हुए बोला– सर इस बार तो मेरे पूरे परिवार ने पतंग छाप को दिया है।

थोड़ी देर चुप्पी रही और फिर उसने खुद समझाया– सब लोग अपने-अपने जात-धर्म वालों को दे रहे हैं। मराठी शिवसेना को दे रहे हैं, जो हिंदू हैं, वो बीजेपी को दे रहे हैं, फिर हम औवैसी साहब क्यों ना दें?

औवैसी के पक्ष में यही तर्क सोशल मीडिया पर भी दिखाई देते हैं। मुसलमान वोट देते हैं लेकिन उसके वोट से मुसलमान लोकसभा और विधानसभाओं में नहीं पहुंचते बल्कि कोई और पहुंचता है।

ये एक मासूम सी दलील है, जो पहली नज़र में कुछ हद तक तार्किक लग सकती है। इसी दलील में औवैसी के एक अखिल भारतीय मुसलमान नेता के रूप में उभरने और आरएसएस द्वारा उनका कारगर इस्तेमाल करके अपने पक्ष में एक अजेय समीकरण बनाने की संभावनाएं छिपी हैं।

2020 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान असदउद्दीन और उनके छोटे भाई अक़बरउद्धीन औवैसी ने मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके में भावुक तकरीरें कीं। नतीजा ये हुआ कि मुसलमामन वोटरों के एक बहुत बड़े तबके ने आरजेडी के साथ अपना बरसों पुराना रिश्ता तोड़ दिया और तेजस्वी यादव लगभग जीती हुई बाजी फोटो फिनिश में हार गये।

अगर यही पैटर्न पूरे देश में दोहराया गया तो नतीजा क्या होगा? मुस्लिम बहुल तमाम सीटों पर ओवैसी वोट काटेंगे और बीजेपी विरोधी कोई भी पार्टी वहाँ से जीत नहीं पाएगी। ओवैसी इसीलिए आरएसएस के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं।

यूपी में ओवैसी पर हुए कथित हमले के बाद के घटनाक्रम पर गौर कीजिये। सत्ता पक्ष के लिए रात-दिन फील्डिंग करने में जुटा रहने वाले मीडिया ने ना सिर्फ हमलावरों की हिंदू पहचान को लेकर ढोल पीटना शुरू किया बल्कि ये भी बता दिया कि उनका बीजेपी से रिश्ता है।

क्या बीजेपी की ओर से कोई खंडन आया? कम से कम मेन स्ट्रीम मीडिया में दिखाई नहीं दिया। पूरे प्रकरण के ज़रिये मुसलमानों को यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बीजेपी तुम्हारे प्यारे नेता को मिटाने की तैयारी में है, इसलिए जुट जाओ और पतंग छाप पर मुहर लगाओ।

लेकिन क्या मुसलमान वोटर ऐसा करेंगे? संभवत: नहीं। बिहार का पैटर्न बंगाल में नहीं दोहराया गया। ओवैसी ने बहुत तगड़ा कैंपेन किया था। मगर जिन मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस और लेफ्ट मजबूत हैं, वहाँ भी मुसलमानों का एकमुश्त वोट तृणमूल को गया पतंग छाप को नहीं।

सांप्रादायिक राजनीति को हमेशा विरोधी के रूप में अपने जैसे चेहरे की ज़रूरत होती है, ताकि उसका भय दिखाकर लोगों को गोलबंद किया जा सके। ओवैसी को एक सर्वमान्य मुसलमान नेता के रूप में उभारने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा है।

मौजूदा केंद्र सरकार अपने छोटे से छोटे राजनीतिक विरोधी को निपटाने के लिए आईटी और ईडी का इस्तेमाल करती है। क्या आपने कभी सुना है कि ओवैसी की फंडिंग पर मीडिया ने कोई सवाल उठाया हो या उनके खिलाफ किसी सरकारी एजेंसी ने कोई कार्रवाई की हो।

आरएसएस की राजनीतिक सफलता यह है कि 2014 के बाद से जातीय समीकरणों को साधकर और उसके उपर हिंदू राष्ट्रवाद का चादर लपेटकर उसने मुस्लिम वोटों को बहुत हद तक अप्रसांगिक बना दिया है।

इसका दूसरा चरण ओवैसी जैसे नेता को मजबूत करना है। मुसलमानों को लोकसभा और विधानसभाओं में दाढ़ी-टोपी वाले कुछ चेहरे चाहिए या राजनीति में अपनी स्थायी प्रसांगिकता, यह उन्हें तय करना है। इसका साफ संकेत यूपी के चुनाव में मिल जाएगा।



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