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पराड़कर स्मृति समारोह : गैर हिन्दीभाषी पत्रकारों ने किया हिन्दी का निर्माण

वाराणसी। प्रसिद्ध पत्रकार नवीन जोशी ने कहा है कि साहित्य से ज्यादा पत्रकारिता ने हिन्दी को परिष्कृत करने का कार्य किया और ऐसा करने वाले पत्रकारों में गैर हिन्दी पत्रकारों की बड़ी भूमिका है। हिन्दी पट्टी के बाहर हिन्दी को विकसित करने का कार्य होता रहा। कोलकाता इसका एक बड़ा केन्द्र था। गैर हिन्दी भाषी पत्रकारों में मराठी पत्रकारों की बड़ी संख्या रही। पराड़कर जी, गर्देजी, दुगवेकर, सप्रे जी, खाड़िलकर जी जैसे पत्रकारों का नाम इनमें प्रमुख है।

वाराणसी। प्रसिद्ध पत्रकार नवीन जोशी ने कहा है कि साहित्य से ज्यादा पत्रकारिता ने हिन्दी को परिष्कृत करने का कार्य किया और ऐसा करने वाले पत्रकारों में गैर हिन्दी पत्रकारों की बड़ी भूमिका है। हिन्दी पट्टी के बाहर हिन्दी को विकसित करने का कार्य होता रहा। कोलकाता इसका एक बड़ा केन्द्र था। गैर हिन्दी भाषी पत्रकारों में मराठी पत्रकारों की बड़ी संख्या रही। पराड़कर जी, गर्देजी, दुगवेकर, सप्रे जी, खाड़िलकर जी जैसे पत्रकारों का नाम इनमें प्रमुख है।

जोशी रविवार को सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर स्मृति न्यास के तत्वावधान में आयोजित पराड़कर स्मृति समारोह में विचार व्यक्त कर रहे थे। 12 जनवरी को पराड़कर जी की पुण्यतिथि थी। समारोह का आयोजन उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, काशी पत्रकार संघ और नादरंग के सहयोग से पराड़कर स्मृति भवन में किया गया था। जोशी ने कहा कि पराड़कर जी के पीछे उनके मामा देउस्कर जी की बड़ी प्रेरणा रही। पराड़कर जी की रुचि आर्थिक पत्रकारिता में भी थी और आज भी जब हिन्दी में आर्थिक पत्रकारिता की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, पराड़कर जी ने अपने दौर में हिन्दी में आर्थिक पत्रकारिता की और बहुत सारे शब्द दिए। पराड़कर जी ने दूसरी भाषा का हिन्दी में अनुवाद करते समय हिन्दी की प्रकृति का बहुत ध्यान रखा जबकि आज इसका ध्यान नहीं रखा जाता है। गर्दे जी ने भी हिन्दी को बहुत सायास साध लिया था। सप्रे जी मराठी और हिन्दी के बारे में कहा करते थे कि मुझे मां से अधिक मौसी ने पाला है।

समारोह में सकाल और स्वराज जैसे समाचार पत्रों के सम्पादक रहे और पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष एस.के.कुलकर्णी ने कहा कि हिन्दी और मराठी के रिश्ते पुराने हैं। लोकमान्य तिलक ने याद दिलाया था कि सात सौ साल पहले संत नामदेव ने हिन्दी भाषा में लिखा था। पराड़कर जी, सप्रे जी, गर्दे जी जैसे मराठी भाषी पत्रकारों ने न सिर्फ हिन्दी की पत्रकारिता की बल्कि हिन्दी भाषा की सेवा की। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि मराठी भाषी पत्रकारों ने हिन्दी को नया मुहावरा और जनोन्मुख क्रान्तिकारी तेवर प्रदान किया। हिन्दी पट्टी को मराठी भाषी पत्रकारों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह विडम्बना है कि गैर हिन्दी भाषी लोग जिस प्रकार हिन्दी को अपनाते हैं, हिन्दी पट्टी के लोग गैर हिन्दी प्रदेशों में जाकर उनकी भाषा और संस्कृति को अपनाने में वैसा भाव नहीं रखते हैं।

दो सत्रों में चले इस समारोह में जहां मराठी पत्रकारों की हिन्दी सेवा पर चर्चा हुई वहीं साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकारिता के विरासत और वर्तमान पर भी विचार रखे गए। वरिष्ठ रंग समीक्षक कुंवरजी अग्रवाल ने कहा कि हिन्दी पत्रकारिता का आरंभ ही साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रकारिता से हुआ है। भारतेन्दु पत्रकार भी थे और उन्होंने बहुत सारे पत्र निकाले। उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता का अद्भुत समन्वय किया है। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष राजनारायण शुक्ल ने कहा कि पत्रकारिता को छोटे-छोटे कस्बों, गांवों में कार्य करने वाली प्रतिभाओं को भी प्रकाश में लाने का कार्य करना चाहिए। चर्चित नाटककार राजेश कुमार ने कहा कि आज पत्रकारिता में साहित्य और संस्कृति का स्पेस लगातार कम होता जा रहा है। प्रमुख रंगकर्मी प्रवीन शेखर ने कहा कि सांस्कृतिक पत्रकारिता सिर्फ सूचना या समीक्षा नहीं है, वह सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज है। समारोह में जितेन्द्र नाथ मिश्र, काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष सुभाषचन्द्र सिहं, महामंत्री अत्रि भारद्वाज ने भी विचार व्यक्त किए। दोनो सत्रों का संचालन पराड़कर जी के पौत्र आलोक पराड़कर ने किया।

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