शुरुआती चरणों में पिछड़ती भाजपा के कमजोर होने के पीछे उत्तरदायी हैं ये कारण

Krishan pal Singh-

जब यह आलेख लिखा जा रहा है उस समय तक उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए चार चरणों का मतदान पूरा हो चुका है। इन चरणों में मतदाताओं को रूझान देखकर जो लोग निराश हो रहे हैं कि लोकतंत्र में पिछले चुनाव में जो बड़ी रेखा खींचने का प्रयास किया गया था वह फिर मिटा दी गई है। लोगों ने न तो हिन्दुत्व की व्यापक छतरी का ध्यान रखा है, न ही लाभार्थी परक योजनाओं के माध्यम से भाजपा सरकार द्वारा सबका साथ सबका विकास के नारे को मूर्तरूप देने की जो कोशिश हुई थी उसका सुफल निकला है और न ही कानून व्यवस्था को सर्वोत्तम बनाने जैसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आत्ममुग्ध दावे को लोगों ने तवज्जों दी है बल्कि मुख्य रूप से इस चुनाव मंे जातिवाद का प्रेत फिर से जाग रहा है उन्हें अपनी समझ दुरूस्त कर लेनी चाहिए। सतह पर चाहे जो कारण दिखायी देते हों भाजपा का कोर वोटर तक अपनी पार्टी से मुंह मोड़ने के चाहे जो तात्कालिक और सतही बहाने समझ रहा हो लेकिन गहराई में जाकर देखें तो साफ हो जायेगा कि उसकी विमुखता के पीछे सिर्फ ऐसी और स्थानीय वजहें नहीं हैं बल्कि अचेतन में बुनियादी और सार्वभौम मुद्दे हैं जिन्होंने पहले से उसे असंतोष के लिए प्रेरित कर रखा है। सिलसिलेवार गौर करें तो मुख्य रूप से उन मुद्दों की शिनाख्त की जा सकती है जो इस चुनाव में प्रभावी हो रहे हैं।

सामाजिक न्याय-

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का घोर वर्ण व्यवस्थावादी चरित्र सामाजिक न्याय के तकाजे को फिर से उद्वेलित करने का कारण बन गया है। वे सामाजिक समरसिता के भाजपा के जिस नारे के कायल हैं मौजूदा दौर में उससे बात संभल नहीं सकती। सामाजिक समरसता तो सामंती काल खंड में भी लोग व्यवहार में रही है। बाल्मीकि समाज के बुजुर्ग को भी आमतौर पर गांवों में कक्का, काकी, बब्बा कहकर बुलाने का रिवाज था लेकिन अछूत समाज का कोई व्यक्ति कितना भी मेधावी और बहादुर होकर भी पदाधिकारी बनाना गवारा नहीं किया जा सकता था। बाल्मीकि समाज के व्यक्ति की नियति घृणित पेशे से ही जुड़े रहने की थी यहां तक कि उसे अच्छा और ताजा भोजन खाने का भी अधिकार नहीं था। बासी और जूंठें पावने से वह अपनी भूख मिटाने को मजबूर रहता था। कमोवेश यही स्थिति अन्य दलित जातियों और पिछड़ों की थी लेकिन संविधान ने सभी को गरिमा के साथ जीने के अधिकार का एहसास कराया। नीचे धकेली गई जातियों में शासन और प्रशासन में भागीदारी के लिए उत्कट आग्रह पनपा जिसे सामाजिक न्याय का नाम दिया गया जिसके बलवती होने के बाद परिदृश्य बदल गया। अब सामाजिक समरसता के ढ़कोसले से हांसिये की जातियों को बहलाना संभव नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासनिक पदस्थापनाओं के माध्यम से अपनी जो नीति उजागर की उसमें स्पष्ट था कि वे पिछड़ी और दलित जातियों के अधिकारियों को क्षमतावान होने के बावजूद सत्ता में भागीदारी के सवाल पर प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा महत्व देने के पक्षधर नहीं हैं। अपने इस दृष्टिकोण से वे संघ नेतृत्व के तो आंखों के तारे बन गये जो संक्रमण काल की मजबूरी में आपात धर्म के बतौर उपेक्षित जातियों के नेतृत्व को अपने सिर पर लादने की चालाकी दिखा सकता है लेकिन अंततोगत्वा उसका लक्ष्य ऐसे हिन्दू राष्ट्र को कायम करना है जिसमें सारी शीर्ष सत्तायें मुट्ठीभर सवर्णों के हाथ में केन्द्रित रहें। लेकिन योगी द्वारा इस नीति पर अमल किये जाने की वजह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लंबे समय तक भाजपा को सत्ता में बनाये रखने के लिए जो विसात बिछाई थी वह तितर बितर हो गई। इस चुनाव में पिछड़े और दलित भाजपा से उस गर्मजोशी के साथ जुड़े नहीं रह गये हैं जो शिद्धत उन्होंने 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके लिए दिखाई थी। यह चुनाव में भाजपा के आधार के बड़े क्षरण के तौर पर साफ दिख रहा है।

वर्णाश्रम राज के अंतर्विरोध-

अतीत में भी वर्णाश्रम राज की व्यवस्था इसमें तीखे अंतर्विरोध उभरने के कारण धराशायी हुई थी। सबसे पहले क्षत्रिय समाज ने ब्राह्मण समाज के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया जब राजा विश्वामित्र ऋषि का दर्जा प्राप्त करने के लिए उद्यत हुए। इसके चलते उनमें और वशिष्ठ में युद्ध छिड़ा और कई प्रमुख लोग हताहत हुए। इसका विस्तार उपनिषदों की रचना मंे देखने को मिला। तथागत बुद्ध और तीर्थंकर महावीर स्वामी ने क्षत्रिय कुल में जन्मने के बावजूद नये धर्मों का सूत्रधार बनकर इस क्रम को आगे बढ़ाया। इस बीच पौराणिक काल में भी परशुराम ने क्षत्रियों द्वारा वर्ण व्यवस्था की मर्यादा के अतिलंघन के लिए उन्हें सबक सिखाने की कोशिश की लेकिन सफल होकर भी उन्होंने क्षत्रियों के ही राजा बनने के अधिकार को हस्तगत नहीं किया। ब्राह्मणों को राज गद्दी का सुख पुष्यमित्र शुंग के सम्राट बनने पर मिला जिसके रसास्वादन को स्थायी बनाने के लिए बकौल डा0 अम्बेडकर मानव स्मृति के स्थान पर मनुस्मृति चलाई गई जिसमें सत्ता और युद्ध को लेकर उन पर लागू तमाम वर्जनाओं और निषेधों से उन्हें मुक्त कर दिया गया। उस समय से राज सत्ता के मामले में क्षत्रियों के प्रभुत्व पर सशंकित होने के जिस संस्कार ने उनके अंदर जड़ें जमाई उसके चलते योगी से उनके क्षत्रिय गर्व के कारण उनमें द्रोह पनपना लाजिमी था। इसलिए हिन्दू राष्ट्रवाद की उत्प्रेरक सवर्ण एकता डगमगा गई और उत्तर प्रदेश में जो उस राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गया था उसमें चूलें हिल गई।

गवर्नेंस की कमजोरी-

योगी पर धर्माचार्य की वर्ग चेतना हावी रही जिससे वे हिन्दू तीर्थ स्थलों और त्यौहारों की भव्यता के लिए पानी की तरह पैसा बहाकर अपराजेय लोकप्रियता हासिल करने के मुगालते में बने रहे लेकिन आधुनिक शासन प्रशासन तंत्र के मंत्र वे नहीं पकड़ सके जिससे लोगों में भारी असंतोष पैदा हुआ। तड़का लगाने से दाल स्वादिष्ट बन जाती है। लेकिन दाल न हो तो तड़का मात्र किसी काम का नहीं है। जैसे मसाला डालने से सब्जी बहुत जायकेदार हो सकती है लेकिन सब्जी न हो सिर्फ मसाला लोगों को हजम नहीं हो सकता। इसी तरह बेहतर गवर्नेंस होने पर धर्म को बढ़ावा उनके लिए फायदेमंद हो सकता था लेकिन गवर्नेंस का पहलू उनमें जीरो दिखा। उन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही कई दिनों तक कोई काम करने की बजाय विभिन्न विभागों के प्रमुखों से विभागों के लिए उनकी भावी कार्ययोजनाओं को लेकर प्रेजेंटेशन देखे पर उसके मुताबिक कोई कार्यनीति तैयार करने का कौशल उनमें जीरो था जिससे यह बांझ कवायद साबित होकर रह गई। अपने मंत्रियों की कार्यकुशलता के लिए उन्होंने भारतीय प्रबंधन संस्थान में उनकी क्लास लगवाई लेकिन इसके सबक अंततोगत्वा मंत्रियों के किसी काम के नहीं दिखे। पालिथीन के सफाई के नाम पर छोटे दुकानदारों को छापेमारी करके बर्बाद करने में कसर नहीं छोड़ी गई लेकिन पालीथीन बनाने वाले कारखाने सलामत रखे गये। अब पालीथीन का इस्तेमाल पहले से ज्यादा बढ़ गया है। अधिकारियों ने इसमें काली कमाई की अतिरिक्त मद बना ली है और योगी को अब इसका ध्यान भी नहीं है। हेलमेट लगाने जैसी छोटी मोटी अवहेलनाओं के लिए यातायात नियमावली में भारी जुर्माने तय करके उन्होंने ककड़ी चोर को फांसी की सजा का इंतजाम तो कर दिया लेकिन गांवों तक में इसके लिए चलाये गये अभियान में लोगों का भारी उत्पीड़न किये जाने के बाद अब इसकी चर्चा तक बंद कर दी गई है। अब यातायात नियमों के बड़े जुर्माने पुलिस वालों के लिए भरपूर तरीके से जेब भरने के साधन बन गये हैं जबकि सरकारी खजाने में जुर्माना नाममात्र का जमा हो रहा है। योगी में किसी अभियान को तार्किक परिणति तक पहुंचाने की क्षमता नहीं दिखी। इसी कमजोरी के कारण गौवंश के संरक्षण के अपने सपने को भी वे कामयाब नहीं बना सके हैं। जितनी गायें पहले कटने से नहीं मर रही थी उससे ज्यादा गायें इस समय भूख से तड़पते हुए मर रही हैं। इसके साथ-साथ किसानों का भी गौवंश का स्वच्छंद विचरण न रूकने से जो नुकसान हुआ उससे बुन्देलखण्ड और पश्चिम में खासतौर से सरकार के प्रति चुनाव में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। जहां तक उनके माफिया विरोधी अभियान का सवाल है एक धर्म विशेष के माफियाओं को जिनके तार शत्रु देश से जुड़े होने तक का संदेह था बेशक उन्होंने ढंग से सबक सिखाया लेकिन अखिलेश और उसके पहले उनके पिता मुलायम सिंह यादव के राज में मकानों और जमीनों पर कब्जा करने वाले जिन गैर मुस्लिम माफियाओं को प्रोत्साहन मिलता था उनका बाल बांका नहीं हो सका। कब्जे हटवाने के नाम पर उन्होंने लोगों के साथ धोखा किया। ग्रामों में तालाब, चकरोड आदि सरकारी जगहों पर कब्जा करने वाले छुटभैयों मात्र तक उनकी कार्रवाई सीमित रही। योगी की व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होने की छवि तो पांच वर्ष तक सत्ता में रहने के बावजूद खंडित होने की नौबत कभी नहीं आयी लेकिन नौकरशाही की मनमानी और भ्रष्टाचार को जाने अनजाने में उनके राज में जमकर कोसा गया जिसकी कीमत जनता को चुकानी पड़ी इसलिए उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी का कोई मतलब नहीं रह गया। वर्ण व्यवस्थावाद के उनके माइंडसेट का प्रभाव नौकरशाही की पदस्थापनाओं में देखने को मिला। जिसमें श्रेष्ठतावाद के तहत कुल मिलाकर उन्होंने राज्य सेवा से अवार्डेड अधिकारियों को दरकिनार किया और जिलों व रेंज व कमिश्नरी में सीधे चयनित आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को अधिकतम महत्व दिया। नौकरशाही के प्रति आकर्षण के कारण कई जिलों में डीएम एसपी तीन साढ़े तीन साल तक नहीं हटाये जबकि दूरनदेशी नेता मुख्यमंत्री बनने पर इन अधिकारियों को अपेक्षाकृत जल्दी-जल्दी हटाते रहते हैं ताकि एन्टीइनकम्बेंसी को अधिकारियों के तबादलों के माध्यम से शिफ्ट कर दिया जाये।

जनप्रतिनिधि रहे पंगु-

योगी आदित्यनाथ ने संन्यास की प्रतिबद्धता से मुकर कर राजनीति के लिए आकर्षण दिखाया पर नेता बनकर भी नेताओं को लेकर उनकी सोच दूषित रही। उन्होंने जनप्रतिनिधियों की अधिकारियों में बिल्कुल नहीं चलने दी क्योंकि वे शायद नेताओं को चोर समझते हैं। दूसरी ओर इसके माध्यम से अगर उनका नेताओं को न बिगड़ने देने का ध्येय था तो यह भी पूरा नहीं हुआ। लगभग सारे विधायकों की हैसियत में पांच साल में भारी बढ़ोत्तरी इसकी गवाही देता है। जनप्रतिनिधि लोगों की सिफारिश करते थे तो अधिकारियों का मानना गंवारा नहीं होता था जिससे लोग जनप्रतिनिधियों से नाराज होते रहे। फिर भी जब निवर्तमान विधायकों में ज्यादातर की उम्मीदवारी बहाल रखी गई तो इस तरह की नाराजगी भी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए दुखदायी बन गई। दूसरी ओर प्रशासन में न चलने से कार्यकर्ता अपने को उपेक्षित अनुभव करने लगे थे जिससे चुनाव में पार्टी का काम करने के नाम पर उनमें उत्साह नहीं दिखा। नतीजतन अभी तक जितने चरणों में मतदान हुआ है उनमें यह देखने में आया है कि भाजपा के लिए समर्पित वोटर तो बहुत कम संख्या में मतदान केन्द्र पर पहुंचे जबकि भाजपा को सत्ता से हटाने को कटिबद्ध वोटरों ने भारी मतदान किया। क्या इसका खामियाजा उठाने भाजपा नहीं जा रही है।

योगी के प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब का हश्र-

संघ ने चने को झाड़ पर खूब चढ़ाया। योगी आदित्यनाथ में अगले प्रधानमंत्री का अक्स देखा जिसके लिए योगी में भी उमंग पैदा हो गई थी। पर इस बात पर गौर नहीं किया गया कि योगी नाथ पीठ के होते हुए भी कहीं न कहीं सनातनी मान्यताओं से बंधे हुए हैं। सनातनी मान्यता में समुद्र पार करने वाले को धर्मभ्रष्ट घोषित किया जाता है। इसी कारण गांधी जी जब पढ़ाई करके विदेश से लौटे तो उनको अपना शुद्धि संस्कार कराना पड़ा था। इसी दकियानूसी की वजह से योगी मुख्यमंत्री बनकर भी विदेश यात्रा करने से बचते रहे। जबकि अब तो मुख्यमंत्री के लिए भी विदेश यात्रा करना अनिवार्य हो गया है। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश दोनों को विदेश यात्रा की जरूरत महसूस हुई थी। गुजरात में नरेन्द्र मोदी जब मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने भी विदेश यात्रा की थी। प्रधानमंत्री का तो बिना विदेश यात्रा के गुजारा ही नहीं चल सकता। हर देश का राष्ट्राध्यक्ष चाहता है कि उसका संवाद दूसरे देश के शासन प्रमुख से हो। अन्य मंत्री की विदेश यात्रा को दूसरे देश में कोई खास महत्व नहीं मिलता। ऐसे में योगी को प्रधानमंत्री बनाने की कल्पना कितनी व्यवहारिक हो सकती है इसका अंदाजा लगाया जाना चाहिए। बहरहाल उनकी सरकार का भविष्य क्या होगा यह तो 10 मार्च को ही पता चलेगा। लेकिन भाजपा के आधार में उत्तर प्रदेश में भारी कमी तो स्पष्ट दृष्टिगोचर है। इसलिए इसके कारणों का विवेचन अन्यथा नहीं कहा जा सकता।

K.P. Singh
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