मृत्युंजय कुमार का यह बयान अगर छापा तो फिर डॉ. कफील का पक्ष भी दिया जाना चाहिए था

Sanjaya Kumar Singh : इसे खबर की लाश न कहूं तो यह और क्या है? गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के कारण अगस्त 2017 के दो दिन में 63 (कुल करीब 70) बच्चों की मौत के बाद गिरफ्तार, आठ महीने जेल में रहे और अभी तक मुअत्तल, डॉ. कफील खान ने शनिवार को दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की। कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ ने राष्ट्रीय खबरों के एक पन्ने पर इस खबर को सबसे ऊपर छह कॉलम में छापा है।

शीर्षक है, “डॉक्टर को क्लीन चिट मिलने के छह महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं”। हिन्दी के अखबारों में यह खबर नहीं के बराबर छपी है। इस पर मैंने सुबह में एक पोस्ट लिखी थी, “अगस्त में बच्चे मरते ही हैं और मीडिया”। मैं जो अखबार देखता हूं उनमें किसी में यह खबर प्रमुखता से नहीं छपी है। टेलीग्राफ अपवाद है।

अमर उजाला में छपी खबर

अमर उजाला में यह खबर जिस शीर्षक से छपी है. वह खबर की जान निकाल कर लाश छाप देने की तरह है। पत्रकारिता में दिलचस्पी रखने वालों के लिए इस खबर में जो तथ्य छूट गए हैं या छोड़ दिए गए हैं। भक्ति का जमाना निकल जाए उसके बाद बच्चे फीस देकर स्किल इंडिया में यही सब सीखेंगे।

  1. अप्रैल में आई विभागीय जांच की रिपोर्ट का खुलासा होने के बाद
  2. आश्चर्यजनक है कि सरकार ने इस रिपोर्ट पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की, खुलासा भी नहीं किया।
  3. इस मामले में वे आठ महीने जेल में रहे और पैसे-पैसे के मोहताज हो गए थे।
  4. द टेलीग्राफ ने लिखा है कि उन्होंने रिपोर्ट की कॉपी दी / दिखाई / टेलीविजन पर तो सबने देखा है। ऐसे में यह कहना कि उन्होंने दावा किया – तथ्यात्मक रूप से गलत है। अगर रिपोर्ट की प्रमाणिकता पर संदेह है तो उसपर सीधे लिखा जाना चाहिए या उसे सच माना जाना चाहिए।
  5. मुख्यमंत्री के सलाहकार के बयान पर डॉक्टर कफील ने कहा- ”मैं आठ अगस्त 2016 को (बीआरडी मेडिकल कॉलेज) स्थायी लेक्चरर बना। उससे पहले मैं गोरखपुर में नेशनल रुरल हेल्थ मिशन के लिए तीन साल तक ठेके पर काम करता था। ठेके के इस पद के लिए कोई नॉन प्रैक्टिसिंग भत्ता नहीं था और प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक नहीं थी। यह मेरे प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ने के एक साल बाद 2017 में हुई मौतों से बिल्कुल अलग मामला है।”

कायदे से मृत्युंजय कुमार का यह लचर बयान नहीं छापा जाना चाहिए था या फिर डॉ. कफील का पक्ष भी दिया जाना चाहिए था। मुख्यमंत्री के सलाहकार के लिहाज से यह बयान बहुत ही हल्का, लचर और गैर जरूरी है। इससे बेहतर होता वे चुप रहते या फिर और भी बातों का जवाब देते।


“अगस्त में बच्चे मरते ही हैं” और मीडिया

“अगस्त में बच्चे मरते ही हैं” के बावजूद गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के कारण अगस्त 2017 के दो दिन में 63 (कुल करीब 70) बच्चों की मौत के बाद गिरफ्तार डॉक्टर कफील खान को आठ महीने बाद, अप्रैल 2018 में जमानत मिली थी। शुक्रवार, 27 सितंबर को टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर से पता चला कि इस मामले की जांच के लिए बनाए गए स्पेशल टास्क फोर्स ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर क्लीन चिट दे दी थी। ऐसे में यह सवाल तो बनता कि 2018 और 2019 के अगस्त में बच्चे क्यों नहीं मरे? अगर सरकार ने कुछ खास किया तो 2017 में और उससे पहले क्यों नहीं और नहीं किया तो 2017 में कहा था उसका क्या मतलब?

डॉक्टर कफील खान को दोषमुक्त किया जाना बड़ी खबर है। 70 गरीब बच्चों की मौत, मंत्री के बयान और डॉक्टर कफील के खिलाफ मीडिया में चले अभियान के कारण। मीडिया के पास यह मौका था कि वह जांच रिपोर्ट को प्रकाशित-प्रसारित कर अपना पाप धोता अपनी गलतियों का पश्चाताप करता और सरकार की सेवा में लगे होने के आरोप को ढंकने, धोने की कोशिश करता। पर मीडिया में जो जैसा है वैसा ही रहा। कायदे से तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री से बात की जानी चाहिए थी। उसके बाद मौतें क्यों नहीं हुईं (या हुई खबर नहीं छपी), बिहार (वहां के स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार लीची खाने से) और झारखंड में बच्चों की जो मौतें हुईं वह उत्तर प्रदेश की मौतों से कितना और कैसे अलग है या मुख्य रूप से लापरवाही का ही मामला है तथा अभिभावकों के लिए कितना तकलीफदेह रहा और सरकारी व्यवस्थाओं की तुलना आदि का मौका था पर ऐसा कुछ नहीं किया गया।

वह भी तब जब अगस्त महीने में ही संबंधित मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह से स्वास्थ्य मंत्रालय ले लिया गया। अब डॉक्टर कफील खान कह रहे हैं कि मंत्री को बचाने के लिए उन्हें फंसाया गया। फिर भी मीडिया कफील खान की खबरों को वो प्रमुखता नहीं दे रहा है जो उनके खिलाफ (गलत) खबरों को दी गई थी। खबरों के अनुसार, डॉक्टर कफील खान को अप्रैल में ही दोषमुक्त करार दिए जाने की खबर सितंबर तक दबी रही और जब बाहर आई तो उसे स्वीकार करने, अप्रैल में जब सरकार को सौंपी गई थी तबसे अभी तक कोई कार्रवाई नहीं करने की बजाय इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि उन्हें प्राइवेट प्रैक्टिस करने का दोषी माना गया है।

डॉक्टर कफील खान ने शनिवार को प्रेस कांफ्रेंस की उसकी खबर भी आज अखबारों में प्रमुखता से नहीं दिखी। अखबारों ने खुद कल खबर नहीं की तो आज प्रेस कांफ्रेंस की खबर इसलिए महत्वपूर्ण है कि सरकारी जांच रिपोर्ट में ही आरोपों से बरी किए जाने के पांच महीने बाद तक वे निलंबित हैं। बच्चों की मौत के जिम्मेदार लोगों का पता नहीं चला है और पता करने के लिए क्या कार्रवाई की गई है यह किसी को पता नहीं है और डॉक्टर कफील खान सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार खान ने कल प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगाया कि अप्रैल में दे दी गई रिपोर्ट पर छह महीने तक कोई कार्रवाई नहीं की गई क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की कार्रवाई से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपमानित (डबल इंजन की सरकार) न होना पड़े।

…. (ऑक्सीजन सिलेंडर के) आपूर्तिकर्ता पुष्पा सेल्स ने अप्रैल (2017) से स्वास्थ्यमंत्री (सिद्धार्थ नाथ सिंह), मेडिकल शिक्षा के डायरेक्टर जनरल (केके गुप्ता) और मुख्यमंत्री को भी कई चिट्ठियां लिखी थीं और आग्रह किया था कि ऑक्सीजन के पेंडिंग बिल क्लियर किए जाएं। (इसके बाद ही आपूर्ति बंद हुई थी जिससे बच्चों की मौत हुई थी)। डॉ. खान ने आगे कहा, “(बच्चों के) असली हत्यारे सीबीआई जांच से ही पहचाने जाएंगे। इन बच्चों के अभिभावकों को मुआवजा मिलना चाहिए और उत्तर प्रदेश सरकार को इस नरसंहार के लिए माफी मांगनी चाहिए और मुझे सम्मानपूर्वक काम पर वापस लिया जाना चाहिए।”

शुक्रवार को पीटीआई ने मुख्यमंत्री के सलाहकार मृत्युंजन कुमार के हवाले से कहा, “यह कहना सही नहीं है कि डॉक्टर कफील को विभागीय जांच में क्लीन चिट मिली है। उन्होंने रिपोर्ट का गलत निष्कर्ष निकला है (जिसपर सरकार पांच महीने बैठी रही?)।” डॉक्टर खान ने इस पर शनिवार को कहा, वे आठ अगस्त 2016 को (बीआरडी मेडिकल कॉलेज) स्थायी लेक्चरर बने, उससे पहले वे गोरखपुर में नेशनल रुरल हेल्थ मिशन के लिए तीन साल तक ठेके पर काम करते थे। उन्होंने कहा, “ठेके के इस पद के लिए कोई नॉन प्रैक्टिसिंग भत्ता नहीं था और प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक नहीं थी। यह मेरे प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ने के एक साल बाद, 2017 में हुई मौतों से बिल्कुल अलग मामला है।”

द टेलीग्राफ ने खबर के अंत में अधिवक्ता संजय हेगड़े का कथन छापा है, “डॉक्टर कफील खान के साथ जो कुछ हुआ उसके बाद हर डॉक्टर सोचेगा कि मरीज की जान बचाने के लिए उसे कुछ अलग करना चाहिए कि नहीं? अगर अदालतें और मीडिया शांत रहे तो ऐसा फिर होगा।”

जनसत्ता अखबार में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की फेसबुक वॉल से.

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Comments on “मृत्युंजय कुमार का यह बयान अगर छापा तो फिर डॉ. कफील का पक्ष भी दिया जाना चाहिए था

  • Dr kafil 2009 me pg cheating me bhi pakare gaye hain … dr sahab private practice me Lipt
    The ye sarvvidit satya hai … ab emotional game khel rahe hain ….

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    • Manish Singh says:

      जब नेतागण स्वयं प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं तो सिर्फ डॉक्टर पर ही पाबंदी क्यों लगाना बेईमानी है। हेमा मालिनी, कपिल सिब्बल, अरूण जेटली, पी चिदंबरम मनोज तिवारी,सिद्धू आधी सभी प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं/थे ।

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