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प्रो जी साईबाबा की सजा खत्म होना बड़ी खबर है लेकिन मेरे दो ही अखबारों में लीड है

जो दूसरी खबरें लीड हैं वो हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकती हैं, भाजपा से जज साब के ‘संपर्क’ और सब चंगा सी’ के प्रधानी दावे के बीच बांबे हाईकोर्ट में हुआ ड्रामा याद नहीं आया

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में वर्षों-महीनों की बड़ी खबरों में एक खबर है, कोलकाता हाईकोर्ट के जज अभिजीत गंगोपाध्याय ने इस्तीफा दे दिया है और भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा की है। आपको यह चाहे बड़ी खबर न लगे पर तथ्य यह है कि उन्होंने कहा है (या कह गये) कि, “मैंने भाजपा से संपर्क किया और भाजपा ने भी मुझसे संपर्क किया।” इसमें सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक हाईकोर्ट जज को राजनीतिक दल से संपर्क करने की क्या जरूरत थी और अगर थी भी तो केंद्र में सत्तारूढ़ दल को किसी राज्य के हाईकोर्ट के किसी जज से संपर्क करने की क्या जरूरत थी। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसपर भाजपा का कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं है। मीडिया ऐसे मामलों में भाजपा का पक्ष नहीं लेता-देता है। पार्टी के सबसे बड़े, महान नेता और देश के प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते। आज कुछ अखबारों में प्रो जी साई बाबा को बरी किये जाने की खबर लीड है। उस लिहाज से यह हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकती है फिर भी लीड नहीं है। क्यों, समझना मुश्किल नहीं है।   

जज साब के संपर्क की खबर के साथ प्रो साईबाबा की सजा खारिज होने की खबर देश में इस समय की न्याय व्यवस्था की पोल खुलती नजर आ रही है। तो कल की खबरों ने बताया था कि 1998 में संविधान पीठ का फैसला तब की सरकार के हक में था तो अब नया फैसला मौजूदा सरकार के तेवर और व्यवहार के अनुकूल है। फिर भी हम यही मानेंगे कि न्याय पालिका सरकार के प्रभाव से मुक्त है और जजों को ईनाम देना हो या संदिग्ध मौत की जांच का मामला खारिज हो जाये, देश में सब चंगा सी। व्यवस्था यही चाहती है कि संदेशखाली में ईडी अफसरों की पिटाई की खबर की सीबीआई जांच हो और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री के खिलाफ ईडी का मामला सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया तो वह खबर (कई अखबारों में) पहले पन्ने पर नहीं है तो हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण। उधर, झारखंड की कोर्ट ने कहा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ईडी के सम्मन का उल्लंघन करने के दोषी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश के विशेष पीठ के गठन पर भी सुनवाई ही नहीं की सो आप जानते हैं।

मीडिया की चिन्ता

मीडिया की हालत यह है कि इलेक्टोरल बांड से संबंधित जानकारी साझा करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भारतीय स्टेट बैंक ने समय मांगा है तो क्यों और इसपर क्या होना चाहिये आदि से संबंधित मुद्दों पर कांग्रेस प्रवक्ता की प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के लोग कई दूसरे सवाल पूछते हैं पर इलेक्टोरल बांड या एसबीआई से संबंधित कोई सवाल नहीं किया जाता है। ऐसी व्यवस्था और हालात में जज रहे एक व्यक्ति को भारतीय जनता पार्टी एकमात्र पार्टी लगती है जो टीएमसी जैसी भ्रष्ट पार्टियों के खिलाफ लड़ रही है। ऐसा उन्होंने कहा है और अमर उजाला ने छापा है। अखबार ने प्रमुखता से यह बताने की जरूरत नहीं समझी की जज साब नौकरी में रहते हुए या पंच परमेश्वर के भेष में एक राजनीतिक दल के संपर्क में थे और वह दल भी उनके संपर्क में था तथा उसके मामले में फैसला दे रहे थे जो उनकी नजर में भ्रष्ट है या जो भ्रष्ट पार्टी से लड़ने वाली अकेली पार्टी है।

इसमें और चीजों के अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि फैसला निष्पक्ष कैसे होगा और इसके लिए अभियुक्त या उसके विरोधी से संपर्क रखना कितना जरूरी या कितना सामान्य है। ऐसी हालत में अमर उजाला ने जज साब को अपना पक्ष रखने के लिए ‘मंच और माइक’ दिया है और उनका कहा अखबार में पहले पन्ने पर छपा है। मेरे लिए उनके कहे से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यहां तृणमूल पर जज साब का आरोप तो है, तृणमूल का पक्ष नहीं है। इस संबंध में कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ ने लिखा है, अपने घर पर प्रेस कांफ्रेंस में न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने अपने इस्तीफे का कारण बताया और कहा कि वे तृणमूल और इसके नेताओं, खासतौर से उसके राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की पोल खोलना चाहते हैं।

टेलीग्राफ ने आगे लिखा है, अभिषेक के नेतृत्व में तृणमूल ने तुरंत मौके का फायदा उठाया और हमला कर दिया। डायमंड हार्बर के सांसद ने कहा है, “उन्होंने जो कुछ भी कहा है उसमें से मैंने एक बेहद दिलचस्प तथ्य नोट किया है … उन्होंने कहा है, मैंने भाजपा से संपर्क किया, भाजपा ने मुझसे संपर्क किया। इस तरह उन्होंने स्पष्ट किया है कि फैसले देते वक्त वे भाजपा के संपर्क में थे। बाकी को मैं जनता पर छोड़ता हूं, उन्होंने आगे कहा।” कोलकाता हाईकोर्ट के एक जज से संबंधित इन तथ्यों के साथ आज कई अखबारों में संदेशखाली की खबर लीड है। उसपर आने से पहले सबका शीर्षक देख लीजिये।

इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को लीड बनाया है। फ्लैग शीर्षक है, ईडी टीम पर 5 जनवरी का हमला। मुख्य शीर्षक है, सीबीआई ने संदेशखाली की जांच अपने हाथ में ली। बंगाल सरकार सुप्रीम कोर्ट गई। उपशीर्षक है, कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा पुलिस पक्षपाती है, जांच के स्थानांतरण, शेख की हिरासत का आदेश दिया। (शेख तृणमूल के निलंबित नेता हैं जिनके घर ईडी छापा मारने गई थी तो हमला हो गया था, कई दिन फरार रहने के बाद अब गिरफ्तार किया गया है। इस मामले की जांच अब सीबीआई को दे दी गई है और वह चाहती है कि शेख को उसके कब्जे में दे दिया जाये। आज के अखबारों की खबर मुख्य रूप से यही है और इस तरह जिस हाईकोर्ट के एक जज फैसला करते हुए तृणमूल पार्टी के राजनीतिक विरोधी भाजपा के संपर्क में थे और जिनसे भाजपा भी संपर्क में थी उसी हाईकोर्ट ने कहा है और) आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड है, पश्चिम बंगाल पुलिस को पूरी तरह पक्षपाती कहते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को ईडी पर हमले की 5 जनवरी की घटना की जांच का काम और मुख्य अभियुक्त शाहजहां को सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया।     

इंडियन एक्सप्रेस ने न्यायमूर्ति अभिजीत गांगुली की खबर इसी लीड के नीचे दो कॉलम में ही छापी है। शीर्षक है, हाईकोर्ट के जज के पद से इस्तीफा देने के बाद गंगोपाध्याय ने कहा, भाजपा में शामिल होउंगा। द टेलीग्राफ ने शेख शाहजहां को सीबीआई की हिरासत में सौंपने के हाईकोर्ट के आदेश के एक अंश को आज का अपना ‘कोट’ बनाया है। हिन्दी में वह कुछ इस प्रकार होगा, “बहुत संभावना है कि राजनीतिक रूप से बेशक बेहद प्रभावशाली राजनीतिज्ञ आरोपी को बचाने के लिए राज्य पुलिस ने लुका-छिपी का तरीका अपनाया था।“ द टेलीग्राफ की आज की लीड भी यही है, राज्य सरकार ने सीबीआई को हिरासत में देनें से मना किया। अब शाहजहां को लेकर रस्साकशी।      

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज यही खबर लीड है। शीर्षक है, शाहजहां को सीबीआई को सौंप दें, कलकत्ता हाईकोर्ट ने बंगाल से कहा। संदेशखाली मामले में एक और ट्विस्ट शीर्षक से इस मामले के कुछ और पक्ष रखे गये हैं। हाईकोर्ट के आदेश से पश्चिम बंगाल सरकार को इस हाईप्रोफाइल मामले में लगने वाले झटकों की श्रृंखला में सबसे नया झटका लगा। बेंच ने ईडी अधिकारियों पर हमले की जांच सीबीआई को स्थानांतरित करने का आदेश दिया। पश्चिम बंगाल सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और शेख को सीबीआई को सौंपने से मना कर दिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार सीबीआई-ईडी का उपयोग अपने विरोधियों को परेशान करने के लिए करती रही है।

ईडी के ऐसे ही एक छापे के दौरान टीम पर हमला हो गया था और शाहजहां लंबे समय तक फरार रहे। इस बीच उनपर दूसरे आरोप भी लगे और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है तथा राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया है। निश्चित रूप से यह भाजपा नेताओं के मामले में की गई कार्रवाइयों के मुकाबले कम नहीं है और ना इसमें पक्षपात लगता है। फिर भी मामले की जांच सीबीआई से कराने का हाईकोर्ट का आदेश है और राज्य सरकार ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और यह सब तब है जब कल ही हाईकोर्ट ने एक जज ने खुद कहा है कि वे पद पर रहते हुए भाजपा के संपर्क में थे और अब इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होंगे। ऐसे में यह सवाल तो है ही कि अदालत की निष्पक्षता कहां है और कैसे है?   

वह भी तब जब आज ही खबर है कि महाराष्ट्र हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, जी साई बाबा और पांच अन्य को माओवादी मामले में दी गई सजा को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कार्रवाई साईबाबा के दस साल जेल में रहने के बाद की है। शारीरिक तौर पर अक्षम 57 साल के साईबाबा व्हीलचेयर पर चलते हैं। उनपर भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप था और 9 मई 2014 को गिरफ्तार किये गये थे। उनपर यूएपीए की धाराएं लगाई गई थीं। 2017 में उन्हें उम्र कैद हुई थी। 2021 में दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था। 14 अक्तूबर 2022 को बांबे हाईकोर्ट ने अभियोजन की मंजूरी न होने के कारण उन्हें बरी कर दिया था पर सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां विशेष सुनवाई हुई और हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया गया था। आज यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है।

डीके शिवकुमार के खिलाफ मामला खारिज

आज ही एक और खबर कर्नाटक की है। इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ बहुप्रचारित मनी लांड्रिंग का एक मामला खारिज कर दिया है और कहा है कि आईपीसी की धारा 120बी के तहत सजा योग्य अपराध (साजिश) मनी लांड्रिंग के मामले की जांच का एकमात्र अपराध नहीं हो सकता है। इनपर दिल्ली और बैंगलोर के बीच अवैध धन की आवाजाही के लिए एक सघन नेटवर्क तैयार करने का आरोप है। इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने ईडी के समन खारिज नहीं किया तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा था। दूसरी ओर, इस मामले में वे दो महीने जेल रह चुके हैं। जाहिर है, ईडी के सारे मामले सही और कार्रवाई योग्य नहीं होते हैं।

इन और ऐसी खबरों की पृष्ठभूमि में तृणमूल के एक नेता को सीबीआई जांच के जरिये फंसाने की कोशिशों के मद्देनजर पश्चिम बंगाल सरकार के बचाव के प्रयासों की प्रस्तुति देखने लायक है। यहां यह उल्लेखनीय कि भाजपा  गवाह बनने से अभियुक्त अपने ऊपर लगे आरोपों से बरी हो जाता है और तमाम मामलों में जब सरकार को परेशान करने वाले आरोपों में गवाह हो सकता है तो सरकार का चिन्तित होना जायज है।

नवोदय टाइम्स ने सीबीआई के शिकंजे में नहीं आया शेख को लीड बनाया है जबकि उपशीर्षक है, कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी बंगाल पुलिस ने नहीं दी शाहजहां की हिरासत, हाइकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची बंगाल सरकार। यहां जज साब की खबर सेकेंड लीड है, हाईकोर्ट जज का पद छोड़कर भाजपा में जायेंगे अभिजीत गंगोपाध्याय। अमर उजाला में लीड का शीर्षक है, संदेशखाली की जांच सीबीआई करेगी हाईकोर्ट ने कहा – शेख को भी सौंप दें। जज साब की खबर यहां तीन कॉलम में है पर यह नहीं बताया गया है कि वे भाजपा के संपर्क में थे।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने शाहजहां की खबर को लीड बनाया है। हिन्दी में यह शीर्षक कुछ इस तरह होगा, शाहजहां को सीबीआई को सौंपे, कलकत्ता हाईकोर्ट ने बंगाल से कहा। जज साब की खबर इसी के साथ तीन कॉलम में है। शीर्षक होगा, विवादास्पद जज ने इस्तीफा दिया, भाजपा से जुड़ेंगे। आज के मेरे सात अखबारों में से पांच की चर्चा कर चुका। बाकी दो में एक द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया आज थोड़े अलग हैं। उनपर आने से पहले बता दूं कि इंडियन एक्सप्रेस में आज पहले पन्ने पर एक तस्वीर है जो किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। फोटो कैप्शन का शीर्षक है, प्रधानमंत्री कल घाटी में होंगे। इसके साथ बताया गया है कि गुरुवार को प्रधानमंत्री के घाटी दौरे की तैयारियां चल रही हैं और यह अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को खत्म किये जाने के बाद से पहला होगा। वे बख्शी स्टेडियम में जनसभा को संबोधित करेंगे। एएनआई की इस तस्वीर में और चीजों के अलावा भाजपा के झंडे लहरा रहे हैं।

प्रो. जी साईबाबा

द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज जी साईबाबा के मामले को लीड बनाया है। यह एक बड़ा, गंभीर और चर्चित मामला है तथा दो साल में दो बार न्यायपालिका ने इस मामले में आरोपों को खारिज कर दिया है। ऊपर मैंने लिखा है कि पिछली बार हाईकोर्ट में ऐसा होते ही सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी और तब हाईकोर्ट के आदेश को स्टे कर दिया गया था। अब फिर कोई डेढ़ साल बाद अगर व्हील चेयर पर चलने वाले 57 साल के प्रोफेसर पर लगे आरोपों को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है तो साफ है कि उन्हें फंसाने की कोशिश की गई थी और भले ही अब लग रहा है कि वे छूट गये पर 10 साल तो जेल में रहे ही और उन्हें फंसाने में लगे लोग हार मान लेंगे या उनके पास कोई दूसरा तरीका नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। फिर भी अखबारों ने इसे महत्व नहीं या है तो इसीलिए कि वे सरकार के साथ हैं।

महाराष्ट्र की भाजपा सरकार टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया है कि फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी और फैसले को टालने की उसकी अपील खारिज कर दी गई। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसपर उनकी पत्नी का भी पक्ष छापा है जो 10 साल के संघर्ष के बाद न्याय शीर्षक से छपा है। अखबार में इस खबर का शीर्षक है, हाईकोर्ट ने साईबाबा, अन्य को बरी किया कहा, माओवादियों से संपर्क का कोई लिंक नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें जमानत देने के सामान्य नियम को भी नहीं माना गया पर मामला ही कारिज हो गया। कानूनी पहलुओं की तो मुझे जानकारी नहीं है पर मानवीयता यही होती कि एक विकलांग आरोपी का मामला जब हाईकोर्ट से खारिज हो गया और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की तो उसी दिन स्टे करने और जेल में रहने की व्यवस्था की बजाय जमानत हो जाती और दो चार दिन में सुनवाई करके अंतिम फैसला हो जाता। पर जमानत तो नहीं ही मिली, डेढ़ साल बाद सुनवाई और रिहाई हो पाई। जनहित में सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों को इस तरह परेशान नहीं किया जा सके पर सब हो रहा है और जज नौकरी छोड़कर भ्रष्टाचार दूर करने की कोशिश में चुनाव लड़ रहे हैं। 

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