राहुल के लोकसभा वाले भाषण से कुछ कांग्रेसी और कुछ ‘लिबरल’ गदगद हैं!

उर्मिलेश-

राहुल गाँधी के लोकसभा में दिये अच्छे भाषण से कुछ कांग्रेसी और कुछ ‘लिबरल’ गदगद हैं. उन्हें लगता है, इस भाषण का चमत्कारिक असर होगा. अज्ञान के आनंदलोक में डुबकी लगाते हमारे समाज के एक उल्लेखनीय हिस्से पर ऐसे एक, दो या तीन अच्छे भाषण का कितना असर पड़ेगा? सघन राजनीतिक काम और जन पक्षी नीतियों के क्रियान्वयन से ही समाज सही दिशा की तरफ उन्मुख हो सकता है. भाषण से वही प्रभावित होगा, जिसकी पहले से ही बेहतर समझ है.

हमने पहले भी देखा है. विपक्षी खेमे के प्रमुख नेता राहुल गांधी रह-रहकर अपनी राजनीतिक चमक बिखेरते रहते हैं. लेकिन उनके शब्द और कर्म में जिस तरह की एकरूपता, सुसंगतता और उनके एक्शन में रणनीतिक निरंतरता की ज़रूरत है, वह अभी तक नहीं दिखती. निजी तौर पर वह मुझे सज्जन लगते हैं, शायद ज़रूरत से ज्यादा सज्जन!

जमीनी सच की जानकारी कम होने के चलते उनकी कुछ मुश्किलें वैसी ही हैं जैसी उनके पिता की थीं. अच्छी बात है, उनके कुछ मित्र-सलाहकार और निकटस्थ शुभचिंतक राजीव गाँधी के मित्र-सलाहकारों से काफी बेहतर हैं. लेकिन उनके Think Tank में जमीनी सच से कटे और जिद्दी लोगों की संख्या कुछ कम नही है.
‘कुलीन-कांग्रेसी’ और बौद्धिक-मंडली (ThinkTank) के ऐसे ही सदस्य उनकी बड़ी समस्या हैं.

यथार्थ से कटे ऐसे कुछ रणनीतिकार अगर बीच में विघ्न-बाधा न बनें और राहुल गांधी को सचमुच कुछ जमीनी सलाहकार मिल जायं तो वह 2024 आते-आते हिन्दुत्ववादियों के लिए सचमुच मुश्किल खड़ी कर सकते हैं.

उन्हें अब अपना दायरा बढाना चाहिए और किसी राजनीतिक-होलटाइमर की तरह काम और आचरण करना चाहिए. अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियो और कुछ अनुभवी सूबाई नेताओं के अलावा देश के तीन बडे क्षेत्रीय नेताओं से भी उन्हें ज्यादा संवाद करना चाहिए. ये नेता हैं: M K Stalin, P Vijayan और H D Deve Gowda. कुलीन और चाटुकार किस्म के कांग्रेसियो से थोड़ा बचना चाहिए.


गिरीश मालवीय-

कल राहुल गांधी सदन में ऑक्सफैम की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बता रहे थे कि मोदी राज में देश के 98 सबसे अमीर लोगों के पास 55.5 करोड़ गरीब लोगों के बराबर दौलत इकठ्ठी हो गई है। दुनिया मे गरीबों की सबसे संख्या भारत में निवास कर रही है। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में पिछले साल गरीबों की संख्या दोगुनी हो गई है, जबकि देश में 40 नए अरबपति बने हैं।

अरबपतियों की संख्या में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर है। चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत में दुनिया में तीसरे सबसे अधिक अरबपतियों की संख्या है।

दरअसल मोदी राज में अरबपतियों की बढ़ती संख्या अच्छी अर्थ व्यवस्था की नहीं है, खराब होती अर्थ व्यवस्था की संकेतक है. जो लोग कठिन परिश्रम करके देश के लिए भोजन उगा रहे हैं, इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर रहे हैं, फैक्टरियों में काम कर रहे हैं, उन्हें अपने बच्चों की फीस भरने, दवा खरीदने और दो वक्त भोजन जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और इसके विपरीत अमीरों की दौलत बढ़ती ही जा रही है। भारत के टॉप के दस दौलतमंद उद्योगपतियों के पास इतनी दौलत हो गयी है कि वे आगामी 25 सालों तक देश के सभी स्कूल – कॉलेजों के लिए फंडिंग कर सकते हैं, भारत के टॉप 98 परिवारों की कुल दौलत भारत सरकार के टोटल बजट का करीब 41% है।

कोरोना काल मे स्थिति बद से बदतर हो गई है वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम 2022 के पहले दिन प्रकाशित ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व के शीर्ष 1,000 सबसे धनी लोग COVID-19 महामारी के कारण हुई आर्थिक क्षति से सिर्फ 9 माह में उबरने में सफल रहे हैं, जबकि विश्व की सबसे गरीब आबादी को इस महामारी के दुष्प्रभाव से उबरने और पूर्व COVID-19 स्थिति को प्राप्त करने में एक दशक का समय लग सकता है। 2021 में जहां भारत में 84 प्रतिशत परिवारों की आय में गिरावट आई, वहीं भारतीय अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई।

इन अरबपतियों पर वार्षिक संपत्ति कर लगाने से हर साल 78.3 अरब अमेरिकी डॉलर मिलेंगे, जिससे सरकारी स्वास्थ्य बजट में 271 फीसदी बढ़ोतरी हो सकती है।

कल राहुल गांधी ने सदन में खुल कर अडानी अंबानी का नाम लिया। भारत में पिछले साल सबसे अमीर 100 परिवारों की संपत्ति में वृद्धि का लगभग पांचवां हिस्सा सिर्फ अदानी घराने के पास आया है। कोरोना काल में गौतम अडानी, विश्व स्तर पर 24वें स्थान पर और भारत में दूसरे स्थान पर आ गए हैं। 2020 में 8.9 बिलियन अमरीकी डॉलर से 2021 में 50.5 बिलियन अमरीकी डॉलर तक एक साल में उनकी कुल संपत्ति आठ गुना बढ़ गई। वहीं, मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति 2021 में 85.5 अरब डॉलर हो गई, जो 2020 में 36.8 अरब डॉलर थी।

साफ दिख रहा हैं कि संपत्ति का असमान वितरण ग़रीबों को और गरीब कर रहा है और मोदी सरकार अडानी अंबानी को अमीर बनाने पर पूरी तरह से आमादा है।


सौमित्र रॉय-

कल राहुल गांधी लोकसभा में पूरे 47 मिनट तक धारदार बोलते रहे। संघी सरकार की आत्मा पर चोट-दर-चोट करते रहे।

उसके बाद नरेंद्र मोदी ने अपने दर्जन भर से ज़्यादा पन्ना प्रमुख मंत्रियों को उनका विरोध करने के लिए छोड़ दिया। साथ में दरबारी मीडिया तो थी ही।

ज़रा सोचिए। देश के लोकतंत्र में अवाम की बात, उनकी चिंताओं को ज़ाहिर करना भी किस कदर चुभने लगा है।

संसदीय परंपराएं इशारा करती हैं कि विपक्ष के सारे सवालों का जवाब प्रधानमंत्री खुद दें, उनके पन्ना प्रमुख नहीं। मंच भी संसद ही होनी चाहिए।

लेकिन बिना टैलिप्राम्प्टर के अटकने, भटकने वाले कार्यपालिका के प्रमुख देश के पीएम एकतरफा संवाद पसंद करते हैं, क्योंकि सवालों, बहस से उन्हें नफ़रत है।

बजट पेश होने के बाद मोदी ने कहा था कि वे उसे पढ़ेंगे, समझेंगे। एक दिन बाद ही उन्होंने जीडीपी को 230 लाख करोड़ के बजाय 2.30 लाख करोड़ बक दिया और वह भी बीजेपी के मूर्ख कार्यकर्ताओं के सामने। मूर्ख दरबारी मीडिया ने उसे हूबहू छाप भी दिया।

राहुल के भाषण पर पन्ना प्रमुख मंत्रियों की बिलबिलाहट उन्हें बीजेपी IT सेल के 2 रुपये वाले ट्रोल की पहचान देती है। असल में इन मंत्रियों की हैसियत ही देश चलाने की नहीं, ट्रोल करने की है।

विदेश मंत्री जैसे घाघ राजनेता को भी अपना अनुभव कूड़े में डालकर 1973 के बाद का इतिहास तोड़-मरोड़कर बकना पड़ा। लेकिन बहस में उनके पास भी जवाब नहीं होगा कि अगर चीन और पाकिस्तान वाकई दुश्मन हैं तो मोदी अपनी “शरीफ़ बिरयानी” और जिन-पिंग को झूला झुलाने पर क्या बोलेंगे?

राहुल जैसा ही हाल हम कुछ सवालियों का भी है। पूछते हैं तो बजाय जवाब देने के, ट्रोल्स हमारी वैधानिकता, बोलने की आज़ादी को चुनौती देने लगते हैं।

शायद 6-7 फरवरी को मोदी लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देंगे। इस बार संसद हंगामों से नहीं, सवालों से गरमाई हुई है।

बजट, योजनाएं, कोविड, विकास और देश की सुरक्षा के दावे- सब भरभराकर ढह चुके हैं और सरकार इसे अमृत काल कह रही है।

काश! पीएम के जवाब से पहले संसद में मोदी के पिछले सारे झूठ और जुमलों का 5 मिनट का एक फ्लैशबैक दिखाया जा सके।

फिर शायद मोदी भी अपने भगत योगी की तरह रोने लगें।

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