संघियों की बेहूदगी और नग्नता का विरोध करने पर राजदीप ने कीमत चुकाई!

Vasudev Sharma : हमें तो उस वक्त ही लग गया था कि राजदीपजी की पिटाई होने वाली है, जब वे उन दो बच्चियों से बातचीत करने की कोशिश कर रहे थे, जो मोदी के लिए लगाए जाने वाले हिंदुत्व के नारों का विरोध कर रही थीं। जब राजदीप ने एक बच्ची से मोदी-मोदी के शोर में विरोध का कारण पूछा, तब उस बच्ची ने कहा था कि हम इनकी इसी बेहूदगी का विरोध कर रहे हैं। मेडिसन स्केवर गार्डन से राजदीप ने उन तीन स्वरों को सुनाया जो आरएसएस के स्वयंसेवकों की बेहूदगी और नग्नता का विरोध कर रहे थे, ऐसे में उन्हें इसकी जो कीमत चुकानी थी, वह चुकाई।

वैसे मेडिसन स्केवर गार्डन के आस-पास विरोध प्रदर्शन करने वाले भारतीयों की संख्या भी पर्याप्त थी, जिसे दिखाया नहीं गया। शायद राजदीप उसे दिखाने की कोशिश करते, वैसे ऐसा नहीं कर पाएं, इसीलिए भी उनके साथ हाथा-पाई जरूरी थी। मेडिसन स्केवर गार्डन में भक्तों का उन्माद चरम पर था, लोकसभा चुनावों के समय आमसभाओं के दौरान मोदी-मोदी की जो आवाजें सुनाई देती थीं, वे मेडिसन गार्डन में भी सुनाई दे रही थीं। मेडिसन स्केवर गार्डन का नाजारा एक बात तो साबित करता है कि संघ अपने स्वयंसेवकों को उन्मादित करने में सफल रहा है। अमरीका में राजदीप के साथ जो कुछ भी हुआ, उसे उन्माद के आतंकवाद में बदलने की शुरूआत भी कह सकते हैं, यह शुरूआत अमरीका से हुई है, उसी अमरीका से जिसने ओसामा बिन लादेन को पैदा किया था। मेडिसन स्केवर गार्डन का उन्माद भारत को पाकिस्तान के करीब न पहुंचा दे, यह सोचकर चिंता भी होती है और डर भी लगता है।

राज एक्सप्रेस अखबार के छिंदवाड़ा ब्यूरो चीफ वासुदेव शर्मा के फेसबुक वॉल से.

Nadim S. Akhter : हां-हां, गलती राजदीप की थी भक्तगणों, तो….और क्या-क्या करना है राजदीप के साथ?? एक पत्रकार को भक्तगण भूखे भेड़ियों की तरह घेर लेंगे. उन्हें पता नहीं क्या-क्या कहेंगे (जो वीडियो में नहीं दिखाई-सुनाई दे रहा है, बहस काफी देर से हो रही है). फिर हूटिंग करेंगे. पत्रकार की बखिया उधेड़ेंगे, उसे भला-बुरा कहेंगे, उसकी पैंट उतारेंगे और उसके जीवनभर की कमाई को ये कहके दांव पर लगा देंगे कि तुम तो पक्षपाती हो. अगर नहीं हो, मेरे आराध्य, मेरे देव के बारे में सवाल मत पूछो. ऐसा मत बोलो. वैसा मत बोलो. देख नहीं रहे, कितनी भीड़ जमा है? तुम्हें सच नहीं दिखता क्या? कैसे पत्रकार हो यार? पक्षपाती कहीं के. हमारे आराध्य सबकुछ बदलकर रख देंगे. तुम अपना विश्लेषण और अपना Objective point of view अपने पास रखो. ये ज्ञान हिन्दुस्तान में अपने चैनल के स्टूडियो में बैठकर बघारना. यहां नहीं. यहां हम हैं.

हमारे आराध्य के बारे में एक सवाल भी हमें गंवारा नहीं. चलिए, भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वालों के अल्पज्ञान पर क्या रोष जताना और क्या गम गीला करना!! जो आज तक ये नहीं समझ पाए कि मर्यादापुरुषोत्तम राम ने एक मामूली धोबी के कथन पर अपने जीवन का इतना बड़ा फैसला लिया कि अपनी पत्नी को अकेले वनवास को भेज दिया. राम राजा थे. सबके प्यारे थे. चाहते तो धोबी को कठोर से कठोर दंड देते. ऐसा दंड कि फिर कभी कोई माता सीता के बारे में ऐसे शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन भगवान राम सहनशील थे. प्रजा की आलोचना और उनके कटु वचनों को भी वो सीने से लगाने का माद्दा रखते थे. एक आम धोबी की बात को उन्होंने इतनी गंभीरता से लिया कि उनके जीवन की पूरी कहानी ही बदल गई. लेकिन यहां भक्तगण अपने आराध्य के बारे में कुछ कटु नहीं सुनना चाहते. शांति से उसका जवाब नहीं देना चाहते. वे पत्रकार को भीड़ में एक जोकर और एक तमाशाई बना देना चाहते हैं. उसके आत्मसम्मान को अंदर तक भेद देना चाहते हैं. वे पत्रकार से भिड़ जाएंगे लेकिन संयम नहीं बरतेंगे. पत्रकार से अपेक्षा ये है कि वो उनकी गालियों को सुनकर, अपमान का घूंट पीकर, हूटिंग को बर्दाश्त करके चुपचाप वहां से कट ले. उन्हें जवाब ना दे. उनका प्रतिकार ना करे. और ये अपेक्षा भी कि पत्रकार, इंसान नहीं होते. उनमें भावनाएं नहीं होतीं.सिर्फ आपमें और हममें होती हैं. वाह रे लोकतंत्र. वाह रे लॉजिक. वाह रे प्रोपगंडा. वाह रे भक्तगणों.!!!! https://www.facebook.com/video.php?v=477128325760154

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


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Comments on “संघियों की बेहूदगी और नग्नता का विरोध करने पर राजदीप ने कीमत चुकाई!

  • kamredo v congress ki dalali karne vale patrkar ke bhes rosi roti chalane vale logo ke man me bjp v sangh ke prati jahar bhara huva h lekin inko pata nahi sangh inke gali dene ke bavjud din pratidin badata hi jaraha aour congress v vampanth khatam hota jaraha h kyon, kabhi vichar kiya, congress v komred keval bate karte h kam kuchh nahi kiya, garibi ke nam par keval apni dukan chalai

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  • Deepak Tiwari says:

    आज कल आर्टिकल का हेडलाइन देख कर समझ में आजाता है आर्टिकल लिखने वाले की मानसिकता क्या है.… पूरा आर्टिकल पढ़ने में टाइम बरबाद नहीं होता। साला कुत्तो की दुम सीधी नहीं हो सकती और गधो को घी नहीं पचता। ये दोनों कहावतें है इसका किसी कौम या पार्टी से कोई संबंध नहीं है 😆

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  • अविनाश says:

    फुर्सत मिली और प्रतिक्रियाऐं देखी तो दो शब्द कहने से खुद को रोक नहीं पाया ।
    “इन मोदियाए हुए लोगों का यदि सामान्य ज्ञान जाँचें तो पता चलेगा कि इनके लिये भगतसिंह और गोडसे दोनों समान देशभक्त थे, और हो भी क्यों नहीं? इनके नवोदित आराध्य को तो तक्षशिला ही बिहार में दिखाई देता ह।”
    … प्रभु इन्हें क्षमा करे!

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