रील्स एडिक्ट : भारत को शार्टवीडियोज की लत पहले चीनियों फिर अमेरिकियों ने लगायी!

रंगनाथ सिंह-

आप जब भी सोशलमीडिया विशेषज्ञों से बात करें तो एल्गोरिद्म और एआई की बात जरूर होती है। मेरी जाहिर और छिपी हुई इंटरनेट हिस्ट्री में ऐसा कुछ नहीं है जिसके आधार पर ये रील्स मुझे सजेस्ट किये जाएँ। फेसबुक क्या, मैं किसी के रील्स वगरैह नहीं देखता। इंस्टा, फेसबुक, टिकटॉक, यूट्यूब कहीं भी शार्ट वीडियोज नहीं देखता। इनके ऑप्शन में जाकर कई बार ऐसी पोस्ट न दिखाने का विकल्प क्लिक कर चुका हूँ लेकिन ये फिर आ जाता है।

जाहिर है कि रील्स वाले आदमी की आदिम वृत्तियों का इस्तेमाल करके उसे रील्स एडिक्ट बनाने का प्रयास करते रहते हैं। मार्केटिंग वाले ज्ञानी मानते हैं कि किसी चीज को साफ्टली पुश किया जाता रहे तो ग्राहक एक समय के बाद रिजीस्ट करना छोड़ देता है और कम से कम एक-दो बार प्रोडक्ट जरूर ट्राई करता है। अगर प्रोडक्ट का नेचर एडिक्टिव है तो चतुर से चतुर ग्राहक भी उसकी चपेट में आ ही जाता है। इस कैम्पेन का टारगेट सभी आयुवर्ग के मर्द होंगे। मर्दों के लिए स्त्री क्या है, यह बात सभी कम्पनियों को पता है।

मुझे लगने लगा है कि हमारे देश में शार्टवीडियोज वही काम कर रहे हैं जो किसी जमाने में चीन में अफीम ने किया होगा।। चीनियों को अफीम की लत ब्रितानियों ने लगायी। भारत को शार्टवीडियोज की लत पहले चीनियों फिर अमेरिकियों ने लगायी है। खैर, हमारा देश किस दिशा में जा रहा है, यह देखना हमारा काम है, जाना देश का काम है। हम दोनों अपना-अपना काम करते जा रहे हैं। हम देख रहे हैं, देश जा रहा है, हम देख रहे हैं, देश जा रहा है और यह इतने सालों से हो रहा है कि अब इसपर अफसोस के सिवा कुछ और करने का भी मन नहीं होता।

इस प्रवृत्ति पर कुछ करने का ख्याल उस दिन मुल्तवी कर दिया था जिसदिन बीबीसी हिन्दी ने ढिंचक पूजा का इंटव्यू किया। तब पुरानी सहानुभूति के नाते वहाँ के एक साहब से पूछा, अब बीबीसी ढिंचक पूजा का इंटरव्यू करेगी! उन्होंने अच्छे से समझा दिया कि ढिंचक पूजा के बारे में जानना देश के लिए क्यों जरूरी है! उनकी समझाइश सुनकर मुझे चुप लग गयी। मुझे भी मीडिया में नौकरी करनी थी।

इस मसले पर उस दिन का चुपचुप आज मुँह खोला है। तब से अब तक देश में फूहड़ता का बाजार बहुत बड़ा हो चुका है। बड़ा होने के साथ-साथ यह बहुत तगड़ा भी हो चुका है। इतना तगड़ा कि अब सरकार भी इतना ही कर सकती है कि भारतीय बाजार को चीनी टेक कम्पनियों के हाथ से छीनकर, वह मार्केट गैप उपलब्ध करा सके जिसमें अमेरिकी कम्पनियाँ अपने रील्स बेच सकें। जाहिर है, चीन और अमेरिका में चुनना होगा तो मैं भी दूसरा ही चुनूँगा। लेकिन यह तय है कि अगर भारत ने चीन की तरह अपना डिजिटल स्पेस क्लेम नहीं किया तो वह दिन भी आएगा जब उसके पाँव के नीचे जमीन नहीं होगी और पाँच अमेरिकी कम्पनियाँ जब चाह लेंगी तो भारत की सरकार गिरा देंगी। जय हिन्द।


फ़ेसबुक आबादी के vulnerable तबके को सेमी पोर्न स्टफ़ का एडिक्ट बनाकर अपना व्यापार बढ़ा रहा है । चरित्र की मार्केटिंग करने वाली वर्तमान सरकार क्यूँकि फ़ेसबुक से अपने प्रचारात्मक हित में फ़ैसले लेती रहती है इसलिए इस पर आँख मूँदे है। -शीतल पी सिंह



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