‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद में ना तथाकथित ‘प्रयोग’ है और ना बिना कॉमा, फुल स्टॉप के कोई पन्ना!

संजय कुमार सिंह-

हिन्दी साहित्य के प्रयोग के बहाने अंग्रेजी अनुवाद की चर्चा… पुरस्कार मिलने की घोषणा के बाद किताब का एक पन्ना सोशल मीडिया में घूम रहा था जिसमें कोई कमा, फुल स्टॉप नहीं है। तब कहा गया था कि यह प्रयोग है और फिर पुरस्कृत साहित्य में ऐसा होता है। पुस्तक देखने पर पता चला कि यह वाक्य दो पन्ने से ज्यादा का है और तीसरे पर चार-छह लाइनों के बाद खत्म होता है। अनुवाद में ऐसा नहीं है और उसमें कॉमा फुलस्टॉप सब है।

रेत समाधि को बुकर मिलने की चर्चा हुई तो मैंने एक सामान्य प्रतिक्रिया में लिख दिया कि अनुवाद अच्छा होगा और बुकर अनुवाद को मिला है उसका मूल लेखन से क्या संबंध। बेशक, मेरे ऐसा कह देने भर से अनुवाद का मूल लेखन से संबंध खत्म नहीं हो जाएगा लेकिन बहुत सारे जानकारों, साहित्यकारों और प्रचारकों ने अपनी बातें रखीं। कुछ लोगों ने मूल लेखन को कमतर कहा पर ज्यादातर उसकी तारीफ के पुल बांधते रहे।

मेरा शुरू से मानना है कि निर्णायकों को हिन्दी आती ही नहीं है, तो हिन्दी लेखन का कोई मतलब नहीं है और उपन्यास का अनुवाद मूल अनुवाद से काफी अलग हो सकता है। यही नहीं, अच्छे अनुवाद यानी ट्रांसलेशन को ट्रांसक्रिएशन कहने का रिवाज बहुत पुराना है और सौभाग्य से मेरे पहले ही अनुवाद को ‘ट्रांसक्रिएशन’ कहा गया था। अनुवाद की तारीफ पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने लोकार्पण के मौके पर मेरे संपादक, दिवंगत प्रभाष जोशी के समक्ष की थी और मैं उस मौके पर मौजूद नहीं था।

आज मैं यह सब अपनी पीठ खुद थपथपाने के लिए नहीं बता रहा हूं बल्कि यह बताना चाहता हूं कि पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरामन की किताब का अनुवाद जिन लोगों के लिए किया-करवाया गया था उनमें चंद्रशेखर प्रमुख हस्ती थे और उनने उसकी धुंआधार तारीफ की जिसकी चर्चा मुझसे कई लोगों ने की। हालांकि, अनुवादक-पत्रकार के रूप में मैं चंद्रशेखर से ना पहले मिला था ना बाद में मिला। एक शादी में जरूर मिला था और एक बार पटना से दिल्ली के लिए वे उसी विमान में सवार हुए जिसमें मैं रांची से आ रहा था।

ऐसे में अनुवाद के अच्छा होने और ट्रांसक्रिएशन के बारे में मेरी एक समझ है और यह उन दिनों से है जब पुस्तकों का अनुवाद बहुत कम होता था। बाद में मैंने देखा है कि खराब अनुवाद के कारण अच्छी किताबें नहीं चलीं और बहुत सामान्य किताबों का भी अच्छा अनुवाद हुआ। पर वह अलग मुद्दा है। रेत समाधि में निश्चित रूप से कुछ अच्छे प्रयोग हैं पर अनुवाद में वैसा कोई प्रयोग नहीं दिखा और जिस क्रांतिकारी हिस्से को विशेषता बताया गया उसका अनुवाद भी सामान्य है।

अनुवाद पर चर्चा करने से पहले पुस्तक में प्रकाशित डेजी रॉकवेल (अनुवादक) की राय जान लेना ठीक रहेगा। वे जो कहती हैं वह संक्षेप में कुछ इस प्रकार है- रेत समाधि एक प्रयोगात्मक कहानी है जिसकी बुनाई में कई विशेषताएं हैं। यह भाषा उसके रूप और संरचना के साथ खेलती है लेकिन यह एक क्लासिक भी है …. हालांकि, अनुवादक के लिए रेत समाधि हिन्दी भाषा को एक प्रेम पत्र है। गीतांजलि श्री अंग्रेजी में खूब लिखती हैं, लेकिन अपनी मातृभाषा हिंदी में लिखना पसंद करती हैं। वे शब्दों की ध्वनि और कैसे वे एक दूसरे को प्रतिध्वनित करते हैं को पसंद करती हैं, अक्सर उन्हें प्रदर्शित करती हैं। …. मैंने अपने पूरे प्रयास में ध्वनि के रूप में पाठ को फिर से बनाने (रीक्रिएट करने) की कोशिश की है। पाठक पाएंगे कि इसमें हिंदी, उर्दू, पंजाबी और संस्कृत के शब्द खूब हैं। इसी तरह मूल पाठ अंग्रेजी से भरा हुआ था। वास्तव में, मूल उपन्यास कृत्रिम रूप से हिंदी केंद्रित है, जैसे अनुवाद कृत्रिम रूप से अंग्रेजी केंद्रित है।

आइए अब कुछ उदाहरण देखें

• बाहर दांत किटकिटाती ठंड, भीतर दांत किटकिटाती माँ।
Outside, tooth-chattering cold; inside, Ma, teeth a-chatter.

अंग्रेजी में वो मजा नहीं है जो हिन्दी में है।

नहीं नहीं मैं नहीं उठूँगी। अब तो मैं नहीं उठूँगी। अब्ब तो मैं नइ उठूँगी। अब्ब तो मैं नइई उठूँगी। अब मैं नयी उठूँगी। अब तो मैं नयी ही उठूँगी।
No, no, I won’t get up. Noooooo, I won’t rise nowwww. Nooo rising nyooww. Nyooo riiise nyoooo. Now rise new. Now, I’ll rise anew.

इसमें नहीं के लिए Noooooo तो ठीक है पर नयी के लिए नया हो गया। पढ़कर या सुनकर भी आप नहीं समझ सकते हैं नई से नयी का मतलब बदला है या सिर्फ उच्चारण दोष या विशेषता है। ऐसे में यह अनुवाद के लिए मुश्किल है। पर ध्वनि का खेल है जिसकी चर्चा अनुवादक ने की है। इस फेर में एमएलए अजीब तरह से लिखा गया है जो मैं नहीं लिख पाया।

• शब्द की एक पौध
A sapling of a word.

• अपनों से नफरत कौन करे पर अनख तो हो ही जाती है। उट्ठो।
Who can really hate their own? But certainly they can exasperate.

• वह दरवाजा ….
The door…

• वह दरवाज़ा। बहुतों को इल्म नहीं कि ये कोई मामूली दरवाज़ा नहीं है। कि इसने मज़बूती से जिन दीवारों को थाम रखा है उन पर पीढ़ियाँ टिकी हैं।
The door. Not many knew that this was no ordinary door. Generations had dwelled within the walls it upheld.

• बहन को हवाई अड्डे बुरे लगते थे इसलिए बार बार वो खुद को हवाई अड्डों में ही पाती। वहाँ उसे लगता वो कीड़े के बराबर का कीड़ा है, किसी ज़बरदस्त प्रयोगशाला में बंद।
Bade’s sister disliked airports because she found herself in them all the time. She felt like a tiny bug among many, trapped in a laboratory.

• ये सभी किरदार हैं। चींटी, हाथी, दया, दरवाज़ा, माँ, छड़ी, गठरी, बड़े, बेटी, रीबॉक जो बहू पहनती थी, और बाकी और, जिनका ज़िक्र तभी होगा जब होगा।
All of these are characters in this story: the bug, the elephant, the compassion, the door, Ma, the cane, the bundle, Bade, Beti, the Reeboks that Bahu wore, and the rest of the gang, who will come up in due course.

• हवा धाड़धाड़ चलती है। हवा दबे पाँव आती है। बातें आगे बढ़ते हुए बढ़ती है। बातें बदल जाती हैं इसलिए भी बढ़ जाती हैं।
Wind blows ferociously. Or arrives on tiptoe. Things move at their own pace. Things change, and that’s also why they move ahead. Keep moving.

• सिड आया। न आव देखा न ताव, उठाई छड़ी ज्यों उड़ाने और उड़ के खुद भी दादी के बिस्तर पर बैठ गया।
वाऊ ग्रैनी, ये देखो। फर्राटे सर्राटे झर्राटे से हवा में लगा उड़ाने, सटसटसट खोलता बंद करता, फिर खोल देता लम्बी, फिर बंद कर देता छोटी।
Sid came. Looking neither to the right nor the left, he snatched up the cane as if to fly away, then came shooting over to perch on Ma’s bed.
Wow, Granny, look at this.

• मेघधनुष? वो क्या? वो रेनबो!
A colourful arc? What’s that? A bow of rain. A rainbow?

• रिवायतें कैसे आती हैं, किसी ने पूछा होगा। गौरय्या से, उसे टका सा जवाब मिला। फिर पूरा भाषण भाषण देने वाले ने दे दिया।
Where do customs come from? someone must have asked. From a sparrow, came the terse reply. Upon which, an orator gave an entire speech on the subject.

इसके बाद का भाषण इटैलिक्स में है। ऐसे में लीलावती से शुरू होने वाला बहुचर्चित पन्ना बिना कॉमा फुलस्टॉप के क्यों है मैं नहीं समझ पाया। अंत में लीजिए वही अंश

• लीलावती के माथे पर चिन्ता की लकीर खिंच आयीं जब उसने यह सुना। वही लीलावती जो कंठेराम की बीवी थी और सुशीला की सास और हीरो की अम्मा जिसका असली नाम चम्पक था और जिसे बड़े ने ड्राइवरी करवा के सरकारी नौकरी दिलवा दी थी मगर जिसे सर्किट हाउस से निकाल दिया गया क्योंकि उसने एमएलए बाबू मिजाजीलाल जी की गाड़ी नशे के असर में चलायी थी हालाँकि इतनी सूझ उसे रही थी कि सुगन्धित सुपारी वाला पान अपने मुँह में दबा ले दारुई महक दबाने पर बार बार गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर सुगंधित तमाखू का लाल रस बाहर थूकता जाता जिसमें मिली सस्ती देशी शराब की बू बाबू मिजाजीलालजी की बेटी को आ गयी चूँकि वो ड्राइवर की सीट के ठीक पीछे बैठी थी और सामने का दरवाज़ा खुलता तो नशे का झोंका उसकी तरफ़ झपकता और सभ्भव है कुछ बूँदें भी जो वो खुशकिस्मत थी या बदकिस्मत कि अँधेरे में देख नहीं पाई और सबसे खुशकिस्मत खुद बाबू मिजाजीलाल जी जो इक्के वाले थे तब मिजाजी रहे एमएलए होकर बाबू और जी हो गए और क्या कड़ाके दार सफ़ेद खादी में सोते जागते कि पीक का वहम भी उसे मैलीआ दे और विधायक हों तो ज़रा सी भी छींटाकशी नाम डुबो सकती थी मगर सूँघने को कौन अँधेरा पर्दा-पार रख पाता तो बेटी की नाक ने चम्पक की कश्ती डुबाई चूँकि उसकी शिकायत सुनी गयी और ड्राइवर को निकाल बाहर किया और तब से उसका नामकरण बड़े ने कर डाला कि हीरो है और जब भी कंठेराम या लीलावती उनसे मिन्नत करते कि बड़े भैय्याजी कहीं लगा दीजिये तो बड़े को याद दिलाना पड़ता कि देखो मैंने लगवाया था इसलिए जेल की हवा से बच गया बच्चू वर्ना उसने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी और अब मैं कहाँ उसकी सिफ़ारिश करूँ जो फिर भी उन्होंने की और करते जिससे फिर से वो कहीं लगे और किसी दूसरे शहर में बिल्डिंग कॉन्ट्रैकटर के यहाँ मजूरी का मौका मिला भी कि आ जाये तो उन्होंने हिदायत दी कि काम सीख लेगा तो खुद भी कॉन्ट्रैकटर बन जाएगा जिसमें तुम सोच नहीं सकते कितना पैसा है लेकिन हमारा घर रिटायरमेंट के बाद और सिड बाबा का घर तुम्हें फ्री में बनाना होगा और सब हँसे और फुस्से का उदाहरण देखो जो किसी हाउिसंग सोसाइटी में महज़ प्लम्बर था बाथरूम बनाना वनाना उसका काम कि टाइल लगवा दो और नल शावर बदल दो फिर ऐसा एक्सपर्ट हो गया कि टॉयलेट सीट और वॉशबेसिन से शुरू करके खिड़कियों फ़र्श दीवारों व इटैलियन मोज़ैक और डबल ग्लेज़ और स्लाइडिंग स्क्रीन और शावर …..

Worry lines formed on Leelavati’s forehead when she heard. This was the same Leelavati who was Kanthe Ram’s wife, and Susheela’s mother-in-law, and the mother of Hero, whose real name was Champak, and whom Bade had helped get training as a driver, and a government job, but then he was thrown out of the Circuit House because he’d driven the car of the MLA Babu Mijaji Lai under the influence, although he’d been chewing fragrant supari paan to cover the booze smell, but then he kept opening the car door again and again and spitting out streams of red juice, which bore a stench of paan mixed with cheap country liquor, and that was what Mijaji Lai’s daughter smelled, since she was sitting directly behind the driver’s seat, so when the front door opened a boozy whiff wafted towards her, and possibly a few spittle drops as well, which she, luckily or unluckily, couldn’t see in the dark, and the luckiest thing of all was that Babu Mijaji Lai ji himself had once been an ikka driver and was at that time only Mijaji, but after becoming an MLA added on the Babu as well as the ji, and wore brilliant white homespun round the clock which even a hint of paan spit could besmirch, because as a legislator even the slightest hint of such a droplet could ruin his name, but who can draw the veil of darkness over smells, so it was his daughter’s nose that sank Champak’s ship, since her complaint was heard and the driver was thrown out, and since then Bade had dubbed him Hero, and whenever Kanthe Ram or Leelavati entreated him, Oh, Bade, please find him work somewhere, then Bade would have to remind them, Look, I did get him a job, that’s how the guy avoided getting thrown in jail, otherwise he did pretty much everything wrong, so where should I recommend him now, but nonetheless he did anyway, and Hero wound up with an opportunity as a labourer for a building contractor in some other city, and Bade explained to him that if he would learn the work, he, too, would become a contractor, and he’d make more money than he could imagine, but, he added, after I retire, you will have to build our home for free, and Sid Baba’s home too, and everyone laughed, and take Phussa, for example, he was merely a plumber in some society, his job was to set the tiles when they were making the bathrooms and change the sink and shower ….

इसे देख पढ़कर मय अशुद्धियों या प्रयोग के टाइप करना बहुत ही मुश्किल है। इसलिए माफी चाहता हूं। इतने से ही अंदाजा लगाइये। टाइपिंग में हू-ब-हू कॉपी होने की कोई गारंटी नहीं है। कोशिश की है कि ‘साहित्य’ और ‘गलतियां’ जैसी हैं वैसी ही रहें।

अब आप तय कीजिए कि पुरस्कार अनुवाद को मिला है या मूल लेखने को और अनुवाद कितना मूल है। किताब और अनुवाद की कहानी यह भी है कि मूल हिन्दी वाली किताब की कीमत 450 रुपए है और 375 मुद्रित पन्ने। अंग्रेजी में 725 पेज है और अनुवाद 699 रुपए का है। हिन्दी में मामला अलग होता है। अनुवाद घट जाता है, पन्ने घट जाते हैं इसलिए कीमत कम हो जाती है। प्रकाशक कहते हैं कि हिन्दी की किताबों की कीमत कम होनी चाहिए। हिन्दी और अंग्रेजी की किताबें लगभग एक साथ ऑर्डर की, एक साथ आई भी और अंग्रेजी में 2022 का अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार विजेता होना लिखा है जो अंग्रेजी में इतनी प्रमुखता से नहीं है और हिन्दी के पाठक माथा धुन रहे होंगे कि हिन्दी में बुकर कब से मिलने लगा। कचरा सिर्फ हिन्दी पत्रकारिता में नहीं है, प्रकाशन में भी भरा हुआ है।

-संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं। साथ ही देश के जाने माने अनुवादक भी!

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One comment on “‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद में ना तथाकथित ‘प्रयोग’ है और ना बिना कॉमा, फुल स्टॉप के कोई पन्ना!”

  • सत्य पारीक says:

    हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद और अंग्रेजी उपन्यास का हिंदी अनुवाद में दोनों की भावनाए मर जाती हैं , क्योंकि लेखक के भाव शब्दों में वह नहीं होते जो मूल उपन्यास में होते हैं।

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