समाज विरोधी टीवी एंकर थे रोहित?

अनिल जैन-

इस व्यक्ति ने ‘सबसे तेज’ बेखबरी टीवी चैनल पर बैठ कर किसानों को खालिस्तानी और देशद्रोही कहा। नागरिकता कानून का विरोध करने वालों पाकिस्तान परस्त कहा। एक साल पहले तब्लीगी जमात के बहाने समूचे मुस्लिम समुदाय को कोरोना फैलाने का जिम्मेदार बताया। आरक्षण के बहाने दलितों, आदिवासियों और सामाजिक तौर पर पिछड़ी जातियों के प्रति तरह-तरह के अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।

टीवी की रोजाना होने वाली बहस में विपक्षी दलों के प्रवक्तों को अपमानित करना, विपक्षी नेताओं को देशविरोधी बताना और भाड़े के महंतों व मौलानाओं को अपने शो में बुला कर सांप्रदायिक जहर फैलाना तो आम बात थी।

हथियार कंपनियों की दलाली करने वाले सेना के रिटायर्ड अफसरों को टीवी पर बैठा युद्धोन्माद फैलाने का काम भी खूब किया। सरकार के गंदे से गंदे काम का बचाव भी बेहद अकड़ और फूहड़ दलीलों से किया।

कुल मिलाकर बेहद घटिया और समाज विरोधी टीवी एंकर था (पत्रकार नहीं)। याद नहीं आता कि उसने पत्रकारिता के मान्य मूल्यों और सिद्धांतों के अनुरूप कभी कुछ किया हो। मुझे उसके असमय दुनिया छोड़ कर चले जाने का उतना ही दुख है जितना कि उसे कभी-कभार टीवी पर देखकर खुशी होती थी।
रोहित के परिजनों खासकर उसकी दो छोटी-छोटी बेटियों के प्रति पूरी सहानुभूति और संवेदना है।


सुशील मानव-

पहले दो तस्वीरें निहारिये. यकीन मानिये आपके अंदर का मरा हुआ इंसान ज़िंदा हो जायेगा। आपके संवेदना की सुप्त गंगा बह निकलेगी. आपकी विचारधारा क्या है इसका को़ई मतलब नहीं रह जाता यदि आप इंसान नहीं हो पा रहे हैं।

कुछ लोग आज तक न्यूज चैनल के मरहूम एंकर रोहित सरदाना के कार्यक्रमों की तस्वीरें साझा करके उनके ख़िलाफ़ ऊल जलूल बक रहे हैं। रोहित सरदाना एक कठपुतली था, जो रोटी रोजी के डोर से बंधा था उसे नचा तो न्यूज चैनल के संपादक और मालिकान लोग रहे थे।

रोहित सरदाना की सत्ता परस्ती को जितना कोसना था हमने उनके जीवित रहते कोस लिया था, अब उनके नहीं रहने पर हमें अपने इंसान को बचाते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति शोक संवेदना व्यक्त करना चाहिये।


अशोक कुमार पांडेय-

साहित्य अकादमी विवाद के बाद जिस पहले शो में गया था उसके संचालक रोहित सरदाना थे। भाजपा के प्रवक्ता से भी अधिक बदतमीज़ी से बात करते हुए।

सरकार को हर हाल में डिफ़ेंड करते उनके ट्वीट लगातार देखता रहा हूँ। साम्प्रदायिकता का अलमबरदार होना उनका चयन था। आज उमर सहित अनेक लड़के जेल में हैं, कोविड के ख़तरे से जूझ रहे हैं तो उसमें इस तरह की पत्रकारिता का भी हाथ है। फ़ासीवाद की राह प्रशस्त करने वाले लोगों में से वह भी एक थे।

इस बार कोविड को लेकर वह सहज नहीं थे। लगातार ट्वीटर पर मदद की अपीलें कर रहे थे। एक भाजपा प्रवक्ता से उलझ भी गए थे…शायद कोई एहसास हो कि जिस सरकार पर इतना भरोसा करते रहे वह किस क़दर नाकाम हुई।

एक युवा का इस तरह चले जाना सिर्फ़ दुखद हो सकता है। एक परिवार का इस तरह बिखर जाना सिर्फ़ उदासी का सबब हो सकता है।

मेरे कोई निजी रिश्ते नहीं थे लेकिन सुन कर दुःख हुआ। काश वह एक ढंग के पत्रकार होते तो इस दुःख के और भी आयाम होते।


ममता मल्हार-

अगर आप किसी की मौत पर खुश हो सकते हैं तो मुझे आपके इंसान होने पर शक है। अगर आप किसी दुनिया से जाने के बाद समसामयिक राजनीतिक सहमती असहमति को आधार बनाकर धर्म की दुहाई देकर उस इंसान को गन्दा लिख रहे हैं तो मुझे आपके धार्मिक होने पर शक है। रोहित सरदाना मौत से एक दिन पहले तक लोगों की मदद करने का प्रयास कर रहे थे।

पत्रकार भी अच्छे थे। पिछले कुछ सालों में सिनेरियो बदला तो पत्रकारों की प्राथमिकताएं भी बदलीं। समाचार चैनल कई सालों से नहीं देखती मैं। मगर जो भी जितना भी रोहित सरदाना का सामने आया ठीक ही लगा बाकियों से। मेरी पहचान के बहुत से लोग इस दुनिया से जा रहे। मगर मुझे उनकी सिर्फ अच्छाई याद रह रही।

मैं नहीं जानती कौन क्या कर पा रहा है मगर आज भी जो लोगों की मदद के लिये खुद को झोंक चुके हैं वे दिन रात सोना जागना भूल चुके हैं। पत्रकार कई लगे हुए हैं बिना किसी स्वार्थ के जान पहचान के । मगर कुछ हरामखोरों के पास आज भी ऐसा घटिया कलेजा और दिमाग है कि वे किसी को विचारधारा के नाम पर सिर्फ गंदगी उगल रहे हैं लोगों को कोस रहे हैं।

अरे इस दौर में भी जीवन की सच्चाई को नहीं समझे तो मुझे तुम्हारी इंसानी समझ पर शक है।।इंसानी समझ इसलिए लिख रही हूं क्योंकि जानवर भी ऐसे समय एक बार संवेदनशील हो जाता है तुम लोग क्या हो यार? किस ग्रह के प्राणी हो। कल को तुम मरोगे फिर खुद के बारे में सोचा है कि आखरी समय में क्या क्या याद आएगा। तुम्हारे जाने के बाद क्या कहेंगे लोग तुम्हारे बारे में। बहुत भुगत रहे हो इंसानी अपराध की सजा अब भीतर के इंसान के जगा लो यार। बस करो बहुत हुआ।


Sheetal p singh-

बिहार सरकार के मुख्य सचिव की कोरोना के चलते मृत्यु हो जाने की खबर आ रही है । दो दिन पहले यूपी के IAS एसोसिएशन के अध्यक्ष जो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी थे की कोरोना से मृत्यु होने की खबर आई थी । देश की सरकार के अटार्नी जनरल रह चुके विख्यात न्यायविद सोली सोराबजी भी इसकी लपेट में आ गये और आज रोहित सरदाना की भी मृत्यु का समाचार मिला ।

ये सब लोग देश की नीति निर्धारण की प्रक्रिया की ऊपरी पायदान पर पहुँच चुके लोग थे ।

यह सबको समझना होगा कि जाति धर्म क्षेत्र और घृणा के आधार पर देश प्रदेश चलाने के दावेदारों को सत्ता सौंपने के पक्ष में हम कितने ही कुतर्क गढ़ने में खुद को कामयाब समझें / विजय जुलूस में नागिन डांस कर लें या मीडिया/ सोशल मीडिया मैनिपुलेट कर लें , इस सब की एक सीमा है!

यह सीमा सच्चाई के सामने वैसे ही भरभरा कर गिर जाती है जैसे आज देश की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल है ! मीडिया पर कंट्रोल और सोशल मीडिया के पेड अनपेड ट्रोल के ज़रिये आप अपने गुनाह दूसरों पर डालने में सिर्फ़ एक हद तक ही सफल हो सकते हैं! अगर अस्पताल न होंगे, उनमें उपकरण न होंगे, डाक्टर न होंगे , दवा न होगी , आक्सीजन न होगी तो सिर्फ़ स्वास्थ्य मंत्री के झूठे बयान के सामने आपकी अपनी “लाश” होगी जिसके दाहसंस्कार की भी कोई गारंटी न होगी !

कोरोना ने हममें से लाखों लोगों को श्मसान/ क़ब्रिस्तान पहुँचा कर यह सबक़ सिखाया है । बहुत कड़वा है पर कोई उपाय नहीं है!

खुद से सच बोलना सीख लीजिए ।


प्रभात डबराल-

साल याद नहीं लेकिन ये अच्छी तरह से याद है कि रोहित सरदाना का सहारा समय -मध्य प्रदेश में चयन के लिए जब फ़ाइनल इंटरव्यू हुआ तब तक मुझे उनकी राजनीतिक विचारधारा के बारे में अच्छी तरह से पता चल चुका था. लेकिन ये मेरे लिए ना तब कोई इश्यू था ना अब है. इस आधार पर मैंने कभी किसी को सलेक्ट या रिजेक्ट नहीं किया.

तीन चार साल, जितना समय भी हम साथ रहे रोहित को मैंने एक शालीन, ज़हीन और मेहनती पत्रकार से अलग किसी और रूप में नहीं देखा. सुधीर चौधरी भी तो सहारा समय में कुछ समय के लिए हम लोगों के साथ रहे. कई और भी आज के बड़े बड़े नाम हैं जो हम लोगों के साथ काम करते हुए संयम से रहे और अच्छा काम किया.

बाद में इनमें से बहुतों ने व्यावसायिक विकास की जो राह पकड़ी उससे असहमत हुआ जा सकता है. विचारधारा को तमग़े की तरह पहनकर चैनल मालिकों या सत्ता प्रतिष्ठान की चाकरी करना कोई अच्छी बात थोड़े ही है.

इस बिंदु पर, रोहित के असामयिक निधन पर भीतर से अत्यंत दुखी होने के बावजूद सोच रहा हूँ कि क्या ही अच्छा होता कि रोहित चीख चिल्लाहट वाली सत्ता पोषित पतनशील पत्रकारिता के बहाव में मौज लेने का लोभ संवरण कर पाते.

लेकिन ये तो उन्हें सोचना है जिनके सामने इस प्रकार के लोभ चुनौती के रूप में खड़े हैं. जिन्हें ये देखना है कि भविष्य में वो खुद को कहाँ पर खड़ा देखना चाहते हैं.

मेरे लिये तो आज का दिन एक युवा पत्रकार के असामयिक निधन पर शोक व्यक्त करने का दिन है. अलविदा रोहित …


अमरेंद्र रॉय-

रोहित सरदाना को मैं निजी तौर पर नहीं जानता। हालांकि जब मैं सहारा टीवी में था तो वो शायद वहां के मध्य प्रदेश चैनल में आ गए थे और मेरे जी न्यूज में पहुंचने के थोड़े समय बाद वहां आ गए थे। उन्हें पहली बार जी न्यूज में ही न्यूज पढ़ते देखा। वहीं रहते हुए पत्रकारिता में उन्होंने अपनी पहचान बनाई। बाद में आज तक चले गए और अंतिम सांस तक उसी के साथ जुड़े हुए थे। वे एक खास विचार धारा से जुड़े हुए थे और उनकी एंकरिंग के दौरान वह बहुत आक्रामक अंदाज में दिखता था। इस नाते कुछ लोग उन्हें जितना पसंद करते थे उतना ही दूसरे लोग उन्हें नापसंद करते थे।

उनकी मृत्य पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविद, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, लोक सभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत तमाम लोगों ने श्रंद्धाजलि अर्पित की है। ये वो लोग है जिनकी रोहित सरदाना अपने कार्यक्रमों में बचाव और गुणगान किया करते थे।

रोहित सरदाना अपने कार्यक्रमों और आक्रामक विचारों की वजह से चर्चित बेशक हो गए हों। पर थे वे भी एक पत्रकार ही। हो सकता है आर्थिक रूप से वे बाकी पत्रकारों से थोड़ा मजबूत हो गए हों, लेकिन उनके पीछे उनका परिवार है और उनके दो छोटे बच्चे हैं। इन समर्थ लोगों को उनके बारे में भी कुछ सोचना चाहिए। उन्हें कोई पेंशन नहीं मिलने वाली। इसलिए संभव हो तो पीएम, सीएम, केंद्र और राज्य सरकारों को इसी संदर्भ में रोहित सरदाना के परिवार के लिए कुछ ठोस करना चाहिए। जिस संस्थान में वे काम कर रहे थे, उसे भी बड़ा दिल दिखाना चाहिए।

ज़्यादातर पत्रकारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती। रिटायरमेंट के बाद तो और भी दयनीय हो जाती है। कुछ राज्य सरकारों ने इस ओर ध्यान दिया है और थोड़ा ही सही पर पेंशन देना शुरू किया है। पर केंद्र सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है। मैं रोहित सरदाना के न तो विचारों से सहमत हूं न ही उनकी आक्रामक एंकरिंग से। बावजूद इसके उनकी असमय मौत से दुखी हूं। जिन्हे उनके कार्यक्रमों से लाभ मिलता रहा निश्चित तौर पर उन्हें भी दुख है और वे जाहिर भी कर रहे हैं। मेरा उनसे बस नम्र निवेदन है कि वे रोहित के परिवार के लिए कुछ करें।

पत्रकारों के अपने संगठन हैं। विचार भले अलग हो पर सब पत्रकारों के हितों की ही बात करते हैं। मेरा इन सभी पत्रकार संगठनों से भी अनुरोध है कि वे रोहित के परिवार की मदद में आगे आएं। वे सरकार से भी अनुरोध करें कि पत्रकारों के हित में कोई बेहतर नीति बनाई जाए ताकि पत्रकारों के पास जब काम न रहे, रिटायर हों या असामयिक निधन हो तो उन्हें मदद मिल सके।


अविनाश पांडेय समर-

I am from JNU. Rohit Sardana called me anti national. I am a liberal. Rohit Sardana called me Tukde Tukde Gang. I am a leftist. Rohit Sardana called me urban naxal.

He did all this only for money from his masters. He knew that none of this was true. Shed tears for him. I can’t. It is more than enough that I am not celebrating.

जेएनयू का हूँ. रोहित सरदाना ने मुझे देशद्रोही कहा। माहौल बनाया कि कहीं भी भीड़ लिंच कर देती। उदारवादी हूँ। रोहित सरदाना ने मुझे टुकड़े टुकड़े गैंग कहा। माहौल बनाया कि कहीं भी भीड़ मार दे। वामपंथी हूँ- रोहित सरदाना ने अर्बन नक्सल कहा। देशद्रोह के मामले लगाने की वकालत की।

ये सब उसने सिर्फ़ पैसों के लिए कहा। उसे पता था सब झूठ है। आपको बहुत दुःख हो तो बाल्टी भर आँसू बहा लें। मेरे लिए इतना ही बहुत है कि ख़ुशी से नाच नहीं रहा- जश्न नहीं मना रहा। वजह उसने भरपूर दी थी!


पंकज मिश्रा-

घण्टों शांत रहे , कुछ नही दिखाया , मानो कोई स्क्रिप्ट राइटर स्क्रिप्ट लिख रहा हो , फिर किसी director ने बताया हो कि कैसे acting करनी है , तब जा के आज तक पर रोहित की खबर टेलिकास्ट होना शुरू हुई |

किसी को अच्छा लगे या बुरा मगर सच बताऊं तो 5 मिनट के लिए आज तक खोला मोबाइल app पे , ऐसा मेलोड्रामा उफ्फ … आंख भी पोंछ रही तो कॉजल का ध्यान , मुंह पोंछ रही तो लिपिस्टिक का ध्यान …. ये सब एंकर से ज्यादा ऐक्टर है …

रोहित चला गया उसके कुछ अच्छे कार्यक्रमों का कोलाज बना कर दिखाते …. बैक ग्राउंड में उंहूँ उंहूँ की आवाज़ , स्क्रीन को c ग्रेड सिनेमा का पर्दा बना दिया …..

मुझे संजय गांधी के मरने पर इंदिरा का और इंदिरा के मरने पर राजीव का संयत चेहरा याद आता है , आडवानी अटल पर बेहद सुशांत और संयत वक्तव्य देते है …

फिलहाल ये सब मुझे पेशेवर रुदाली से ज्यादा और कुछ नही लग रहे …. मीडिया का चरित्र किस कदर बदल चुका है |

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Comments on “समाज विरोधी टीवी एंकर थे रोहित?

  • राकेश says:

    जय वामपंथी पत्रकार मृत्यु में भी अपने लिए अवसर खोज रहे हैं तो अपनी भड़ास निकाल सकें

    Reply
  • Rahul sisodiya says:

    जिस अनिल जैन ने रोहित सरदाना के खिलाप लिखा बो बहुत बड़ा हरामी हैं। साले हरामी की औलाद इस वक्त तो कम से कम दलाली नही करता। साले जब तक रोहित रहें जब तक तो तू उसके चरणों में रहता था और आज उनके जाने के बाद तू अपनी ओखाद दिखा रहा हैं। शर्म कर हरामी चुल्लू भर पानी मे डूब मर।

    राहुल सिसौदिया

    Reply

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