यह ब्राह्मण समुदाय शिक्षा पर एकाधिकार रखना अपना दैविक अधिकार समझता है

रोहित वेमुला श्रृंखला का लेख…. शिक्षालयों में जरुरी है एजुकेशन डाइवर्सिटी…

-एच.एल.दुसाध

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर केन्द्रित एक पुस्तक को अंतिम रूप देने में विगत कुछ सप्ताहों से बुरी तरह व्यस्त हूँ. मेरे संपादन में तैयार हो रही ’शैक्षणिक परिसरों में पसरा भेदभाव : सवर्ण वर्चस्व का परिणाम’ नामक सवा दो सौ पृष्ठीय यह पुस्तक देश के शिक्षा जगत के 27 प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों और 13 विद्वानों के साक्षात्कार से समृद्ध है. गत 23 अप्रैल को इस किताब के दूसरे प्रूफ पर नजर दौड़ाते और लेखों को चार अध्यायों में सजाते–सजाते सुबह के पांच बज गए थे. देर रात तक काम करने के बाद रविवार 24 अप्रैल की सुबह 10 बजे के करीब नींद से जागा. आदत के अनुसार चाय की चुस्की लेते हुए अख़बारों पर नजर दौड़ाने लगा. अचानक एक बहुपठित अखबार के दूसरे पृष्ठ के एक खबर पर मेरी दृष्टि चिपक गयी. मैंने एकाधिक बार ध्यान से उस खबर को पढ़ा. ’डीयू के दलित शिक्षकों ने लगाया प्रताड़ना का आरोप’ शीर्षक से छपी निम्न खबर को मेरी ही तरह शायद और लोगों ने भी बहुत ध्यान से पढ़ा होगा-

”दिल्ली विश्वविद्यालय के दो प्रतिष्ठित कॉलेजों में कार्यरत दलित शिक्षकों ने प्रशासन द्वारा उन्हें प्रताड़ित करने और उनकी योग्यता पर सवाल खड़े करने का आरोप लगाया है. हिन्दू कॉलेज में प्रशासन की प्रताड़ना का शिकार एक शिक्षक अब दिल्ली पुलिस आयुक्त से जान का खतरा बताते हुए मामला दर्ज करने की मांग कर रहा है. हिन्दू कॉलेज में इतिहास विभाग में एसोसियेट प्रोफ़ेसर डॉ.रतनलाल का आरोप है कि वो कॉलेज परिसर में ही रहते हैं लेकिन पिछले छः माह से उन्हें आवंटित घर को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है. डॉ.रतनलाल ने बताया कि कॉलेज प्रबंधन की ज्यादती का आलम ये है कि उनकी बात न मानने के चलते 33 एकड़ में फैले कॉलेज परिसर में उनके घर के ठीक बगल में कम्पोस्ट प्लांट के नाम पर 20 फीट लम्बा-20 फीट चौंड़ा और 10 फीट से 12 फीट गहरा गड्ढा तैयार कर उसमें सूखी पत्तियां एकत्र की जा रही हैं जिसमें कभी भी आग लग सकती है. यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ उनका परिवार बल्कि बगल में ही स्थित कैमेस्ट्री लैब और स्टोर रुम भी इसकी चपेट में आ सकता है. इस सम्बन्ध में हिन्दू कॉलेज की कार्यवाहक प्राचार्य डॉ.अंजू श्रीवास्तव से बात करने की कोशिश की गयी तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. इसी तरह श्रद्धानंद कॉलेज में एससी, एसटी, ओबीसी फोरम फॉर टीचिंग एंड नॉन टीचिंग स्टाफ तक ने आगामी 27 अप्रैल को होने जा रही प्रबंध समिति की बैठक में पेश होने वाले उस प्रस्ताव का विरोध किया है जिसमें कोटे के शिक्षकों की योग्यता पर ही सवाल खड़े करते हुए उनकी ट्रेनिंग की बात की गयी है. कॉलेज में एसोसियेट प्रोफ़ेसर सूरज यादव का कहना है कि प्रबंध समिति में कोषाध्यक्ष की ओर से इस बाबत पेश प्रस्ताव उनकी समझ से परे है. उन्होंने कहा कि कॉलेज में नियुक्त शिक्षक चाहे सामान्य श्रेणी के हों या फिर कोटे के अंतर्गत नियुक्ति प्राप्त, सभी पीएचडी, नेट योग्यता प्राप्त हैं और नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय की प्रक्रिया को पूरा करते हैं. ऐसे में उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा करते हुए उनके लिए अलग से शैक्षणिक कार्यक्रम की बात करना चिंताजनक है.”

उपरोक्त खबर पढ़कर मन बोझिल हो गया. अख़बार परे रख कर जब फेसबुक खोला तो पाया कि वहां भी इस घटना से जुड़े कई पोस्ट पड़े हैं, जिनमें कॉलेज प्रशासन की भेदभावपूर्ण रवैये को लेकर ढेरों आक्रामक कमेंट्स किये गए थे. फेसबुक पर विचरण करते-करते वर्धा के महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के बेहद जनप्रिय बहुजन शिक्षक सुनील कुमार ‘सुमन’ के एक पोस्ट पर दृष्टि स्थिर हो गई. उन्होंने लिखा था- ‘अगर आप किसी वंचित समुदाय से हैं तो इस व्यवस्था में आपकी सृजनात्मकता को कैसे खत्म करने की कोशिश की जाती है और कैसे आपको बार-बार एहसास कराया जाता है कि आप अपराधी हैं, इसकी बानगी देखिये… जुलाई, 2015 में हाईकोर्ट से मिली जीत के चलते हुई मेरी ज्वाइनिंग के बाद हिंदी विश्वविद्यालय की जातिवादी लॉबी भयानक ढंग से मेरे खिलाफ सक्रिय हो गई. इस गिरोह के ‘दबाव’ या फिर नए कुलपति जी के अपने सामाजिक दुराग्रहों के चलते दिसंबर, 2015 से उसी आरोप की ‘जांच’ फिर से शुरू हो गयी, जिसको हाईकोर्ट ने झूठा बताकर ख़ारिज कर दिया था. दिलचस्प यह कि यह ‘जांच’ उसी समिति को दुबारा सौंप दी गई, जिसकी रिपोर्ट का हाईकोर्ट ने पोस्ट मार्टम किया था. मुझे विवि रजिस्ट्रार का पत्र मिला कि मैं ‘जाँच’ पूरी होने तक वर्धा छोड़कर बाहर कहीं न जाऊँ। इस बीच अपनी माँ को डॉक्टर से दिखाने के लिए मेरा घर जाना जरूरी था, पर मैं नहीं जा पाया। पिछले चार महीनों में एक दर्जन से ज्यादा कॉलेज – विश्वविद्यालयों में सेमीनार में वक्ता के तौर पर आमंत्रण के बावजूद मुझे कहीं जाने की इजाज़त नहीं थी। जाँच समिति में बुलाने के लिए पहले मुझे किसी कर्मचारी के हाथ पत्र भेजा जाता, फिर उसी पत्र को ईमेल किया जाता, फिर समिति की अध्यक्ष मुझे एसएमएस करके सूचित करतीं, फिर फोन करके बतातीं कि मुझे समिति के समक्ष ‘हाज़िर’ होना है। यह फोन कभी सुबह आता, जब मैं सोया रहता या फिर रात में या फिर तब, जब मैं स्कूटी चला रहा होता या फिर किसी मंच पर प्रबोधन भाषण दे रहा होता। समिति में उपस्थित रहने का पत्र जब मैं कक्षा में पढ़ा रहा होता तो दरवाज़ा नॉक करके रिसीव कराया जाता। हद तो तब हो गई जब रिफ्रेशर कोर्स के दौरान चल रही कक्षा के अंदर ही एक बार कर्मचारी ने समिति का पत्र लाकर मुझे थमा दिया। यह सब मेरे ऊपर मुझे अपराधी साबित करने की अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की घटिया हरकत थी। (अकारण नहीं है कि इस समय विवि के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र मनोविज्ञान के ही प्रोफेसर हैं और यह सब उनकी शह के बिना नहीं हो सकता।) इस बीच कक्षाएँ लेने, खुद का लिखने-पढ़ने, सामाजिक गतिविधियों में शिरकत करने, अपने ऊपर बन रही एक फिल्म के लिए समय देने तथा इसी में घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए मैंने जाँच समिति में ‘हाज़िर’ होकर उसके पत्रों का लगातार जवाब भी दिया। निश्चित रूप से इस अनावश्यक कार्य में मेरी ऊर्जा और मेरा समय दोनों व्यर्थ नष्ट हुआ। वह भी उस मामले में, जिसमें हाईकोर्ट से मैं दोषरहित करार दिया जा चुका हूँ…’

डॉ. सुनील के पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक व्यक्ति ने लिखा था- ‘शिक्षा और मनुष्य विरोधी लोग और क्या करेंगे? दारुण सत्य तो यह है कि पढ़े-लिखे जुझारू इंसान ख़त्म नहीं किये जा सकते. यह तो हमारी जिद है कि तब भी बचे रहेंगे. संस्थानों में मारने का यही तरीका है.’

एक अन्य व्यक्ति का कमेन्ट था, ’सर,परिस्थितियां परेशान करने वाली जरुर होती हैं लेकिन हमें धैर्य, मानसिक संतुलन ठीक रखते हुए, दुश्मन की हर चाल को असफल करना है. मैं एक सामान्य टीजीटी अध्यापक हूँ. लेकिन दो साल पहले पूरे जिले स्तर तक का शिक्षा विभाग मेरे पीछे पड़ गया था. लेकिन पूरा गाँव व समाज ने मेरा साथ दिया और जिला शिक्षा अधिकारी तक को समाज ने बहुत बेईज्ज़त किया, तब जा कर पीछा छूटा.’

एक और कमेन्ट यह था, ’मेरा अनुभव रहा है कि कार्यस्थल पर एससी/एसटी को और कुछ हद तक ओबीसी के लोगों को प्रताड़ित किया जाता है जबकि अपर कास्ट के लोगों की बड़ी-बड़ी गलतियों तक को नजरंदाज कर दिया जाता है. पता नहीं किस चक्की का आटा खाते हैं.’

खैर! उसके बाद डॉ.रतनलाल और सुनील कुमार ‘सुमन’ ने अपने-अपने दुखद अनुभव को लेकर कई पोस्ट डाले.इससे रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद सोशल मीडिया में उच्च शिक्षण संस्थाओं में भेद-भाव का मामला फिर भारी चर्चा का विषय बना. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का यह कमेन्ट काफी महत्वपूर्ण है-‘शैक्षणिक संस्थानों में जातीय भेदभाव होना और उनके साथ जातीय स्तर पर उत्पीड़न होना निंदनीय है.’ बहरहाल रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद डॉ. रतनलाल और सुनील कुमार के मामले के जरिये देश-विदेश में यह संदेश बहुत प्रभावी तरीके से गया कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित छात्रों के साथ शिक्षकों के साथ भी घनघोर जातीय भेदभाव होता है. डॉ.रतनलाल और सुनील कुमार ‘सुमन’ के साथ श्रद्धानंद कॉलेज के आरक्षित वर्ग के शिक्षकों के मामले ने आँख में अंगुली कर दिखा दिया कि वहां सिर्फ दलित छात्र ही नहीं, सम्पूर्ण अरक्षित वर्ग (एससी-एसटी-ओबीसी) के छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षक भी जातिगत भेदभाव के बुरी तरह शिकार हैं और इसके चलते वहां वंचित जातियों के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के लिए ऐसा उपयुक्त माहौल नहीं है, जिसमें वे अध्ययन-अध्यापन का कार्य तनाव-मुक्त हो कर कर सकें.तो यह बेहद कटु सचाई है कि एससी/एसटी के छात्र-छात्रा और शिक्षक भले ही जातिगत भेदभाव के अतिरिक्त शिकार हों, किन्तु ओबीसी वर्ग की स्थिति भी सुखद नहीं है.

अभी रोहित वेमुला पर जिस किताब को लाने की तैयारियों में जुटा हूँ, उसमें दो दर्जन के करीब विद्वानों का यही निष्कर्ष उभर कर आया है कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में सब कुछ ठीकठाक नहीं है.वहां बहिष्कार का माहौल बनाने वाली स्थितियां हैं, जिसे न झेल पाने के कारण वंचित वर्गों के कुछ लोग आत्महत्या कर लेते हैं तो कुछ बीच में पढने-पढ़ाने का काम छोड़ कर पलायन कर जाते हैं.यही कारण है कि रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के विरोध में जो लाखों लोग सडकों पर उतरे उनमें अधिकांश के हाथों में ऐसी तख्तियां थीं जिन पर लिखा था, ’सवर्ण शिक्षकों के वर्चस्व के कारण हमारे विश्वविद्यालय बहुजन स्टूडेंट्स के कत्लगाह बन गए हैं.’ यह अनायास नहीं है कि इस किताब में एक विद्वान ने यह टिपण्णी कर डाली है, ’उच्च शिक्षण संस्थानों में उच्च जाति के विरोध में अनवरत जारी संघर्ष का नाम है, रोहित वेमुला’.

जो हो रोहित वेमुला की मौत के बाद शैक्षणिक परिसरों में फैला भेदभाव पहली बार जरुर पर्वत समान विराट मुद्दा जरुर बना ,पर पहले भी इसे लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही और इससे पार पाने के लिए ढेरों समितियां/आयोग गठित हुए.बावजूद इसके भेदभाव पूर्ववत जारी है तो इसलिए कि समितियों / आयोगों में छाये लोगों ने भारत में जातीय पूर्वाग्रह के पृष्ठ में क्रियाशील धार्मिक और सांस्कृतिक कारकों को उतना गुरुत्व  नहीं दिया, जितना दिया जाना चाहिए.जबकि जातीय एवं धार्मिक पहचान को पूर्वाग्रह का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्धारक मानते हुए इस पर भरपूर ध्यान दिया जाना आवश्यक था. संस्कृति विशेष की अपनी सांस्कृतिक मान्यताएं होती हैं जिनसे अधिक अलग होना व्यक्ति या समूह के लिए संभव नहीं होता. भारत में अधिकांश जनसंख्या हिन्दुओं की है जिनके धर्म,संस्कृति एवं दर्शन को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है.वस्तुतः तीन मौलिक बातों को लेकर हिन्दुओं की मनोवृत्तियां संसार के अन्य समाजों की मनोवृतियों से भिन्न है. ये हैं-1-वर्ग तथा जाति का विचार, 2-समावेशन का विचार तथा 3-आत्मा-परमात्मा तथा पुनर्जन्म का विचार. भारतीयों के लिए इन तीनों विचारों का बहुत अधिक महत्व है. अतः हिन्दू धर्म के सुनियोजित आनुभविक अध्ययनों के सहारे शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्ग,विशेषकर दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार को बेहतर तरीके से समझा एवं नियंत्रित किया जा सकता था. परन्तु भेदभाद के दूरीकरण के लिए बनी समितियों में शामिल लोगों ने पाश्चात्य शोधकर्ताओं का अन्धानुकरण करते हुए या इच्छाकृत रूप से हिन्दू धर्म-संस्कृति जनित पूर्वाग्रह व भेदभाव के कारकों की अनदेखी किया जिससे इसके नियंत्रण का कारगर उपाय न हो सका. अगर शैक्षणिक परिसरों में फैले भेदभाव के पृष्ठ हिन्दू धर्म-संस्कृति की क्रियाशीलता को समझने का उन्होंने गंभीर प्रयास किया होता तो इसके लिए प्रधान रूप से जिम्मेवार उस ब्राहमण वर्ग का चेहरा साफ़ नजर आता जिसका सदियों से लेकर आज तक शिक्षा-तंत्र पर प्रायः एकाधिकार है;जो अध्ययन-अध्यापन पर सम्पूर्ण नियंत्रण अपना दैविक –अधिकार समझता है;जो अपने सिवाय बाकि सामाजिक समूहों के अध्ययन-अध्यापन  के विरुद्ध अवरोध खड़ा करना धर्म का कार्य समझता है.  

जी हां! विश्व में यह एक मात्र ब्राह्मण समुदाय है जो शिक्षा पर एकाधिकार रखना अपना दैविक-अधिकार समझता है.हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा अध्ययन-अध्यापन के दैविक –अधिकार से पुष्ट होने के चलते शिक्षा-व्यवस्था पर सम्पूर्ण एकाधिकार की चाह इसके रग-रग में समाई हुई है.वैसे तो इस निहायत ही क्षुद्र-संख्यक समुदाय का देश के शासन-प्रशासन, मीडिया, पौरोहित्य इत्यादि सहित शक्ति के अधिकांश स्रोतों पर ही दबदबा है,पर शिक्षा के क्षेत्र में इसका एकाधिकार इसलिए ज्यादा घातक है क्योंकि यह समुदाय तमाम अ-ब्राह्मणों को ही शिक्षा का अनाधिकारी समझने के लिए अभिशप्त है.किन्तु इसने क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ इत्यादि को तो किसी तरह झेलने की मानसिकता विकसित कर ली है, पर दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यंकों एवं महिलाओं के प्रति उदार होना, अभी बाकी है. हालांकि अपवाद रूप से कुछ ब्राह्मण गुरुजन अवश्य ही धर्म-शास्त्रों से निर्मित सोच से मुक्त हो गए हैं, पर अधिकांश के लिए यह हिमालय लांघने जैसा कार्य है.भारी खेद के साथ कहना पड़ता है कि हजारों साल से द्रोणाचार्य की भूमिका में सब समय अवतरित होते रहने वाले दैविक-अधिकारी वर्ग की आज़ाद भारत के शिक्षा-तंत्र पर भयावह उपस्थिति, इस देश के हुक्मरानों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कभी विचलित नहीं की. संभवतः इसीलिए ही शिक्षा-जगत में भेदभाव के खात्मे के लिए बनी समितियां ब्राह्मणों के बहुजन शिक्षा-विरोधी चरित्र की अनदेखी कर गयीं,जो कि नहीं करना चाहिए था. अंततः शिक्षा-सुधार के सबसे बड़े नायक जोतीराव फुले से तो उन्हें कुछ प्रेरणा लेना ही चाहिए था.कारण, गुलाम भारत में जोतीराव फुले ने ब्राह्मणों के  बहुजन शिक्षा-विरोधी चरित्र को समझने का आधार  पूरी तरह सुलभ करा  दिया था.

फुले ने हंटर आयोग सहित अन्य कई अंग्रेज अधिकारियों को प्रतिवेदन दे कर इस सत्य से अवगत कराया कि ब्राह्मण किस तरह निम्न जातियों के शिक्षा के विरुद्ध अवरोध खड़ा करने में सर्वदा तत्पर रहते हैं.इस विषय में उन्होंने ‘शिक्षा-विभाग के ब्राह्मण अध्यापक’ नामक एक खास पंवाडा लिखकर उसे जून 1869 के ‘सत्यदीपिका’के अंक में छपवाया था.उसमें उन्होंने अंग्रेजों के समय के शुद्रातिशूद्रों की शिक्षा का ह्रदय-विदारक चित्र स्पष्ट करते हुए कहा था- ‘शूद्र किसानों से सरकार प्रतिवर्ष फण्ड इकठ्ठा करती है. पैसा शूद्रों का, लेकिन उनकी शिक्षा के बहुत बुरे हाल हैं. पाठशाला में दूसरों के बच्चे पढ़ते हैं. माली, कुनबी खेतों में मेहनत करके लगान भरते हैं, लेकिन उन्हें शरीर ढकने के लिए लंगोटी भी नहीं मिलती. जिनकी पढने की उम्र है, शूद्रों के ऐसे बच्चे जानवरों की रखवाली करते हैं. उन्हें पहनने के लिए जूते-चप्पल तक नहीं मिलते.अपने बच्चों को पढ़ाने का समय ही नहीं मिलता. इसलिए उनके पिता दुखी होते हैं और ईश्वर को दोष देते हैं.अंग्रेज शिक्षा देने की बात कहकर जनता को लूटते हैं और पाठशाला में ब्राह्मण अध्यापकों को ही भेजते हैं.यह ब्राह्मण शिक्षक कुलकर्णींयों की सहायता से बच्चे भर्ती करते हैं, उनकी संख्या रिपोर्ट में लिखते हैं.महारों के बच्चों को पढ़ाने में अपमान माननेवाले ब्राह्मण शिक्षक ब्रिटिश लोगों से हाथ मिलाते हैं.

ब्राह्मण शिक्षक ब्रह्मा का महत्व विद्यार्थियों को बतलाते हैं. दूसरे धर्मों की निंदा करते करते हैं और शूद्र बच्चों को अपना झूठा धर्म पढ़ाते हैं.ऐसे कपटी लोगों को अध्यापक बनाया जाता है.अपनी जाति  के बच्चों से गलती हुई तो उन्हें प्रेम से समझाया जाता है,लेकिन दूसरी जाति के बच्चों से गलती हुई तो उन्हें छड़ी से पीटा जाता है,उनका जोर से कान मरोड़ा जाता है.शूद्र बच्चों को मार-मार कर पाठशाला छोड़ने के लिए विवश किया जाता है.ब्राह्मण अध्यापकों के पक्षपाती व्यवहार के कारण शूद्र तथा अतिशूद्र बच्चों में शिक्षा के प्रति लगाव जाग्रत नहीं हुआ.ब्राह्मण शिक्षक शूद्रों को ठीक से पढ़ाते नहीं,क्योंकि उन्हें शिक्षा का अधिकार ही नहीं है, ऐसा ब्राह्मणों का धर्म बतलाता है.वे शूद्रों से द्वेष करते हैं.अतः पाठशाला में विद्यार्थियों में अंतर न करनेवाले तथा मानवतावादी शिक्षकों की भर्ती करनी चाहिए.हम ब्राह्मणों को कबतक फण्ड देते रहेंगे.-(जोतीराव फुले का सामाजिक दर्शन,डॉ.सरोज आगलावे,पृष्ठ-135-36)’.सिर्फ फुले ही नहीं उनके ज़माने के भूरि-भूरि दस्तावेज यह गवाही देते हैं कि वंचित बहुजनों की शिक्षा के प्रति ब्राह्मणों के उग्र-विरोध को देखते हुए ही बड़े-बड़े अंग्रेज अधिकारी निम्न जातियों के शिक्षा को उचित प्रोत्साहन देने से अपने कदम पीछे खींच लिए थे.

जातिगत भेदभाव के मूल में हिन्दू धर्म-शास्त्रों  की क्रियाशीलता को देखते हुए बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर को यह लिखने कोई द्विधा नहीं हुई कि हिन्दू दलितों पर जो अत्याचार करते हैं उसकी प्रेरणा उनके धर्म शास्त्र ही देते हैं;धर्म-शास्त्रों में आस्था के कारण ही दलितों को तरह-तरह से सताने में उन्हें कोई विवेक-दंश नहीं होता.इसी आधार पर दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि शिक्षा जगत पर हावी ब्राह्मण अगर शुद्रातिशूद्रों के समक्ष तरह-तरह का अवरोध खड़ा करते हैं तो उसके मूल में वे हिन्दू धर्म-शास्त्र ही हैं,जो एक ओर ब्राह्मणों को तो अध्ययन-अध्यापन का दैविक-अधिकारी और दूसरी ओर गैर-ब्राह्मणों,विशेषकर शुद्रातिशूद्रों को दैविक-अनाधिकारी घोषित करते हैं.इस क्रूर सचाई को दृष्टिगत रखते हुए आजाद भारत में जरुरत थी शिक्षा तंत्र पर हावी दैविक- अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को ध्वस्त करने की ताकि हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत किये गए वंचित बहुजन को अध्ययन –अध्यापन का उचित माहौल मिलता.लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि जिन काबिल लोगों पर वंचितों को पढने-पढ़ाने का वाजिब माहौल मुहैया कराने की जिम्मेवारी थी,वे खुद स्व-जाति/वर्ण-हित के हाथों विवश होकर दैविक –अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को तोड़ने लायक कोई नक्शा पेश नहीं कर सके.फलतः आज जो उच्च शिक्षण-संस्थान रोहित वेमुलाओं के लिए कत्लगाह बन चुके हैं ,वहां वीसी,विभिन्न विषयों के विभागाध्यक्ष,रजिस्ट्रार इत्यादि के रूप में दैविक-अधिकारी वर्ग ही अनाकोंडा की भांति कुंडली मारकर बैठा हुआ है.ऐसे दैविक-अधिकारी वर्ग के चलते ही शिक्षालयों में बहुजन छात्र एवं शिक्षक घुट-घुट कर समय काटने के लिए विवश हैं.ऐसे वातावरण में किसी रोहित वेमुला का कार्ल सेगन बनना ; किसी डॉ.सुनील कुमार को अपनी सृजनात्मकता को निखारना और किसी डॉ.रतनलाल को सामाजिक न्याय की लड़ाई को तुंग पर पहुचाना,हिमालय लांघने जैसा काम है.

इस विकट स्थिति में शिक्षा के दैविक-अनाधिकारियों को अध्ययन-अध्यापन का उपयुक्त माहौल सुलभ कराने और रोहित वेमुलाओं को त्रासदपूर्ण अंत से उबारने के लिए मैंने ‘शैक्षणिक परिसरों में पसरा भेदभाव..’पुस्तक में विद्वानों के समक्ष साक्षात्कार के लिए सात प्रश्न रखें,जिन पर 13 विद्वानों का मूल्यवान सुझाव मिला.उन सात प्रश्नों में आखरी सवाल दैविक-अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को तोड़ने से संबंधित था,जिसमें मैंने कहा था- ‘ऐसे में राष्ट्र यदि शिक्षा के अनाधिकारियों को शिक्षालयों में अध्ययन-अध्यापन का उपयुक्त वातावरण सुलभ कराना चाहता है तो ब्राह्मण वर्चस्व को ध्वस्त करने के उपाय पर विचार करना होगा.मेरे ख्याल से इसके लिए शिक्षा के तमाम अनाधिकारी वर्गों को शिक्षालयों में विविधता-नीति लागू करने की मांग उठाने के साथ ही विश्व मनाबधिकार संगठन के समक्ष गुहार लगानी चाहिए.बहरहाल आप बताये शिक्षा के दैविक-अधिकार संपन्न वर्ग से शिक्षालयों को मुक्त करने का आपके पास क्या उपाय है?भारी खुशी की बात है कि दैविक-अधिकारी वर्ग के एकाधिकार से उच्च-शिक्षण संस्थाओं को मुक्त कराने के लिए एजुकेशन डाइवर्सिटी के विचार को ही अधिकांश विद्वानों का समर्थन मिला.इस विषय में डॉ.विजय कुमार त्रिशरण का सुझाव विशेष महत्वपूर्ण है.उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा है-

‘भारत में जाति एक सचाई है.सवर्णों के मानस में जातिभेद का जहर कूंट-कूंट कर भरा है.एक भीख मांगने वाले ब्राह्मण से लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के चेयर पर विराजमान सवर्ण भी जातिवादी सोच से पीड़ित है.ऐसी बात नहीं कि सवर्ण हिन्दू निर्दयी हैं तथा उनके दिल में प्रेम-प्रीती नहीं है,उनमें ये सारी बातें हैं,परन्तु यह सब उनकी जाति तक ही सीमित है.दूसरी तरफ समस्त शैक्षणिक संस्थानों पर ब्राह्मणी वर्चस्व है.देश के प्रायः सारे कुलपति ब्राह्मण हैं.इसका मूल कारण है कि पूर्व बुद्धकाल से ही ब्राह्मणों ने बहुजनों को शिक्षा से वंचित कर शिक्षा पर अपना दैविय अधिकार स्थापित कर लिया है.वर्तमान में शिक्षण संस्थानों पर ब्राह्मणों का एकाधिकार महज मेरिट के कारण नहीं,बल्कि विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं,अन्तर्वीक्षाओं तथा महत्वपूर्ण उच्च पदों  पर अपनी जाति के प्रति पक्षपातपूर्ण मार्किंग एवं  अपनी ही जाति के लोगों को आगे बढाने की प्रवृति के कारण है.यही करण है कि सर्वोच्च लब्धप्रतिष्ठित विद्यावाचस्पति उपाधिधारी ब्राह्मण-सवर्ण प्राध्यापक तक पिछड़े और दलित विद्यार्थियों के प्रति जातिय भेदभाव करते हैं,उन्हें संतापित करते हैं,उनको कम अंक देते हैं ,डिस्टिंक्शन नहीं देते देते हैं,उनके मनोनुकूल शोध का विषय चयन नहीं करने देते,उनके शोध में अड़ंगा पैदा करते हैं,उनको उपाधि देने में बाधा बनते हैं,उनके स्कॉलरशीप रोक देते हैं तथा उन्हें डॉ.आंबेडकर का सिद्धांत अपनाने पर समाजविरोधी करार देते हैं.तकनीकी विद्यालयों में तो सवर्ण शिक्षक दलित छात्रों को दो-दो बैच फेल कर हतोत्साहित कर देते हैं.इस प्रकार दलित विद्यार्थियों को कई प्रकार से टॉर्चर कर उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर कर देते हैं,जैसा कि रोहित वेमुला के साथ हुआ.रोहित की तरह और भी कितने दलित विद्यार्थी हैं जो शूली पर चढ़ चुके हैं.इससे निजात दिलाने का सर्वोत्तम उपाय शिक्षण संस्थानों में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करवाने की लड़ाई लड़ना है.’

वास्तव में शिक्षालयों में व्याप्त भेदभाव को ख़त्म करने में एजुकेशन डाइवर्सिटी से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता.एजुकेशन डाइवर्सिटी का मतलब शिक्षण संस्थानों के प्रवेश,अध्यापन व संचालन में विभिन्न सामाजिक समूहों का संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व.एजुकेशन डाइवर्सिटी के जरिये दुनिया के  लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों में शिक्षा पर समूह विशेष के वर्चस्व को शेष कर सभी सामाजिक समूहों को अध्ययन-अध्यापन का न्यायोचित अवसर सुलभ कराया गया है.डाइवर्सिटी अर्थात विविधता नीति के जरिये ही तमाम सभ्यतर देशों में शिक्षा का प्रजातान्त्रिकरण मुमकिन हो पाया है. अमेरिका में भूरि-भूरि नोबेल विजेता देने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेकर नासा जैसे सर्वाधिक हाई प्रोफाइल संस्थान तक में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू कर वहां के तमाम वंचित समूहों और महिलाओं को अध्ययन-अध्यापन का अवसर मुहैया कराया गया है.शिक्षण जगत में लागू डाइवर्सिटी के चलते ही अमेरिका में कल्पना चावला सहित ढेरों भारतीयों  को प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर मय्यसर हुआ और आगे भी होता रहेगा.         

भारत में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करने का मतलब छोटे-बड़े सभी स्कूल,कालेजों,विश्वविद्यालयों और हाई प्रोफाइल शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश,अध्ययन और संचालन में अवसरों का बंटवारा भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूहों-सवर्ण,ओबीसी,एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों-के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में कराना है .शैक्षणिक गतिविधियों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के वाजिब प्रतिबिम्बन से विविधतामय भारत के सभी सामाजिक समूहों को शिक्षा का पर्याप्त अवसर मिलेगा .इसके फलस्वरूप जहां एक ओर शिक्षा के दैविक अधिकारी अपने संख्यानुपात पर सिमटने के लिए बाध्य होंगे वहीँ दूसरी ओर उनके हिस्से का अतिरिक्त (सरप्लस)अवसर वंचित जातियों में बंटने का रास्ता खुल जायेगा.शिक्षालयों में विविधता अर्थात डाइवर्सिटी नीति न लागू होने के कारण ही 10-15 प्रतिशत जातिवादी सवर्णों,विशेषकर ब्राह्मणों का वीसी,विभागाध्यक्ष,रजिस्ट्रार इत्यादि के रूप में भयावह वर्चस्व स्थापित हुआ है.यह वर्चस्व ही रोहित वेमुलाओं-रतनलालों और सुनीलों को अध्यन-अध्यापन का खुशनुमा माहौल देने में एवरेस्ट बना हुआ है.रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद विरोध-प्रदर्शन की जो लहरें उठीं ,उसका लक्ष्य सवर्ण-वर्चस्व को ध्वस्त कर शिक्षा के बहिष्कृतों को अध्ययन-अध्यापन का उचित माहौल सुलभ कराना था?क्या रोहित के समर्थक उस लक्ष्य में जरा भी कामयाब हो पाए हैं ?अगर नहीं तो रोहित वेमुला को इंसाफ दिलाने के इच्छुक लोग शिक्षालयों में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करवाने में सर्वशक्ति लगायें.

देश के हुक्मरानों के लिए भी एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करना समय की मांग बनती जा रही है.कारण, शिक्षालयों के घुटन भरे माहौल ने रोहित के लोगों में अलगाव की भावना पैदा करना शुरू कर दिया है,ऐसा मेरे द्वारा लिए गए साक्षात्कार से विदित होता है.अपने साक्षात्कार में एजुकेशन डाइवर्सिटी का सुझाव देने वाले डॉ.त्रिशरण ने लिखा है ,’यदि एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू नहीं होती है तो ‘सेपरेट बहुजन यूनिवर्सिटी’की स्थापना दलित विद्यार्थियों के शैक्षणिक शोषण-मुक्ति का स्थाई समाधान है.गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहेब ने हिन्दुओं के आतंक से अछूतों को स्थाई निजात दिलाने के लिए ‘सेपरेट सेटलमेंट’ की मांग उठाई थी.आज के सन्दर्भ में यह मांग यदि अनुपयुक्त लगती है तो ‘पृथक बहुजन यूनिवर्सिटी’की स्थापना समय की मांग है.वर्तमान में शिक्षण संस्थानों में मनुवादियों ने दलितों के विरुद्ध जैसा जातिगत द्वेषपूर्ण माहौल तैयार कर रखा  है,वैसी स्थिति में पृथक बहुजन यूनिवर्सिटी की मांग समीचीन है.इस यूनिवर्सिटी में दलित विद्यार्थियों के लिए शिक्षण, प्रशासन, प्राध्यापक, हॉस्टल, पुस्तकालय ,कॉलेज परिसर आदि सब कुछ अलग व्यवस्था हो.ऐसा करने से देश और दलित दोनों का विकास होगा .निरंतर शोषण की स्थिति व्यक्ति में कभी-कभी 1967 में अमेरिकी श्वेत-अश्वेत के बीच हुए खूनी टकराव के तर्ज पर क्रांति की जवाला पैदा कर देती है जिसमें  शोषणकर्ता की शक्ति स्वाहा हो जाती है.ऐसी स्थिति न आये ,इसके पूर्व ही कोई मुकम्मल उपाय ढूंढ लिया जाय तो देश और देशवासियों के लिए बेहतर होगा.’

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या ने बहुजन बुद्धिजीवियों को डॉ.त्रिशरण की भांति ही अलग राह अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है,इसकी झलक सुप्रसिद्ध बहुजन लेखक बुद्ध शरण हंस के साक्षात्कार में दिखी है. उन्होंने लिखा है-‘ ब्राह्मण,सवर्णों वाली सारी शिक्षण संस्थाएं बहुजन विद्यार्थियों के लिए कत्लगाह बनी हुई हैं.क्योंकि हिन्दू धर्मशास्त्र अपने आप में बहुजनों के क़त्लशास्त्र हैं..बहुजनों को विदेशागत ब्राह्मणों की शिक्षण संस्थानों में सिरे से खारिज कर देने का निर्णय लेना होगा.बहुजन समाज के आम नागरिक ,विद्यार्थी,मुखिया,सरपंच,विधायक ,सांसद सबको मिलकर यह आरोप लगाना होगा कि शिक्षण संस्थाओं में वे सब मिलकर जातिगत भेदभाव फैलाते हैं ,विद्यार्थियों की परोक्ष-अपरोक्ष हत्या करवाते हैं.इस कारण शिक्षण संस्थाओं से उन्हें स्थाई रूप से निष्काषित किया जाता है.उनकी जगह बहुजनों के काबिल लोगों को भर्ती करके एक नया किन्तु जरुरी इतिहास बनायेंगे.

ऐसा करने से न्यायालय दीवार खड़ी करेगी.न्यायालय को विधानसभा और संसद में कानून बनाकर रोकना होगा.न्यायालय में बैठे न्यायाधीश सबके सब ब्राह्मण-सवर्ण हैं.देश भर के बहुजन सांसद न्यायालयों से लिखित में पूछें कि भारतीय संविधान के किस धरा के अंतर्गत देश भर के मात्र दो ढाई सौ ब्राह्मण सवर्ण परिवार के लोग ही न्यायाधीश बनते रहे हैं.इस आरोप को सिद्ध करने में आज के सारे के सारे उच्च न्यायाधीश जेल की सजा भुगतने की स्थिति में आ जायेंगे या वे स्वतः देश की जनता से क्षमा मांगते हुए पद त्याग करेंगे.ऐसा होने पर मीडिया गृह-युद्ध होने का हल्ला मचाएगा.देश भर में बहुजन पुलिस तंत्र में भरे पड़े हैं.वे किस काम के बहुजन हैं और किस दिन के लिए बहुजन हैं.सख्ती से ब्राह्मण-सवर्ण को शांत करने का आदेश मिलते ही सारा शोर-शराबा बंद हो जायेगा.इतना और ऐसा होने पर लोकतंत्र के साथ बहुजन तंत्र इस देश में कायम हो जायेगा..शिक्षण संस्थाओं में गैर-जिम्मेवार ब्राह्मणों,सवर्णों को गेट आउट कर उनकी जगह काबिल बहुजनों की नियुक्ति का अभियान चलाकर ही हम विदेशागत ब्राह्मणों-सवर्णों के दबदबे से शिक्षालयों को मुक्त और समृद्ध कर सकते हैं.बहुजन समाज में हर स्तर पर योग्य लोग पैदा हो चुके हैं.उन्हें सिर्फ अवसर मिलना चाहिए.’

डॉ.त्रिशरण और हंस साहब से ही मिलती-जुलती राय देते हुए गाजीपुर के प्रोफ़ेसर डॉ.केके प्रियदर्शी ने कहा है-‘शिक्षालयों को शिक्षा के दैविक –अधिकारी वर्ग से निजात दिलाना है तो बहुत जरुरी ,पर कोई रास्ता नहीं दिख रहा है.उपाय एक ही नजर आता है कि वंचित जातियों के लिए अलग से शिक्षालय स्थापित किये जायें .वहां इन्ही जातियों के लोग अध्ययन और अध्यापन करें.बिना इसके हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत लोगों को पढने-पढ़ाने का सही माहौल नसीब नहीं हो सकता.’

डॉ.त्रिशरण, बुद्ध शरण हंस, डॉ.प्रियदर्शी इत्यादि का उपरोक्त साक्षात्कार निश्चय ही शिक्षा के दैविक-अधिकारियों के लिए सुखद संकेत का सूचक नहीं है.जिन्होंने हजारों साल से दलित-पिछड़ों को शिक्षा से बहिष्कृत करके रखा, उन्हें खुद वंचित –बहुजन ही अलग-थलग करने का मन बना रहा है.और यदि मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग ऐसा करने का ठान लिए तो,भारत के दैविक-अधिकारी वर्ग की स्थिति दक्षिण अफ्रीका के गोरों जैसी हो सकती है,जहां मूलनिवासी कालों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दिया है कि वहा की शक्ति के स्रोतों पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये गोरे अब पलायन करना शुरू कर दिए हैं.दुनिया भर के वर्चस्ववादी समूहों का दुखद हस्र देखते हुए भारत के हुक्मरानों को अंततः अबिलम्ब एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करने का मन बना लेना चाहिए.

लेखक एच.एल.दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उनसे संपर्क hl.dusadh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.



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