जब किसी के हृदय में धर्म का विचार उठता है तो वह सीधे समाधि में ही नही डूब जाता है!

स्वामी आनंद देव-

सनातन धर्म के चार पड़ाव हैं–

कर्मकांड–धार्मिकता की शुरुआत कर्मकांड से ही होती है,यह धर्म की प्राथमिक पाठशाला है। जब किसी के हृदय में धर्म का विचार उठता है तो वह सीधे समाधि में ही नही डूब जाता है। पहले तो वह मंदिर,तीर्थ आदि जाता है,मूर्तिपूजा करता है,गंगा स्नान करता है,दैवीय उपासना करता है। कावंड़ यात्रा इसी पाठशाला का अंग है,हर साधक आज जो किसी ऊंचाई पर है,सब इस पड़ाव से गुजरते हैं।कांवड़ यात्रा सही है,चौमासे के माह में जब काम धाम भी कम रहता है,यह युवा पीढ़ी गांव में ऊर्जा को व्यर्थ गंवाती है,सही कि कांवड़ लेने चले जाती है,अच्छा है नाच है,उत्सव है,श्रद्धा है और सबसे बढ़कर धर्म की प्राथमिक पाठशाला में प्रवेश है। आध्यात्मिक जागरण की शुरुआत है।यहां तक 25% यात्रा है।अब इसके बाद दूसरा चरण है.

शास्त्रतः–पहले चरण पर ही लाखों लोग रुक जाते हैं लेकिन कुछ लोगों के मन मे जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि हम कृष्ण के भक्त हैं,शिव की भक्ति कर रहे हैं तो इन्होंने अपनी पुस्तक में कहा क्या है? फिर साधक शिव सूत्र पढ़ता है,गीता का अध्ययन करता है लेकिन इस पड़ाव पर भी हजारों लोग अटक जाते हैं। वह जीवन भर शास्त्र ही पढ़ते रहते हैं।यहां तक 50% यात्रा है। अगला पड़ाव है–

गुरुतः–बिभिन्न मतों और शास्त्रों का अध्ययन किया,अब मन में तमाम प्रश्न और जिज्ञासाओं का जन्म हुआ ? अब विचार उठा कि कोई सत्य का जानने बाला मिले जिसने केवल शास्त्र ही न पढ़े हों बल्कि उसने शास्त्रों में जो लिखा है उसको जाना भी हो,अब सत्संग और गुरु की खोज की शुरुआत होती है। अब यह 75% यात्रा हुई लेकिन 75% लोग भी भी यही तक अटकते हैं। अब गुरु के पूजापाठ में ही अटक जाते हैं और भूल जाते हैं कि गुरु से किस उद्देश्य से जुड़े थे ? गुरु द्वार है,परमात्मा में प्रवेश के लिए लेकिन कुछ लोग द्वार पर ही रुक जाते हैं।

अनुभूति–अब साधना के द्वार खुलते हैं,गुरु के मार्गदर्शन में साधक अनुभूति को प्राप्त होता है। पहले आत्मा को मानता था,अब आत्मा को जानता है।पहले ईश्वर पर विश्वास करता था,अब ईश्वरता को उपलब्ध होता है। अगर पहले चरण को प्राथमिक कहें तो दूसरे और तीसरे चरण को माध्यमिक और चौथे चरण को विश्वविद्यालय में प्रवेश कहा जा सकता है। विश्वविद्यालय में पढ़ने बाला हर व्यक्ति कभी न कभी प्राथमिक में भी पढ़ा होता है।

चारों पड़ाव हर युग मे थे,अपनी समझ,साधना,प्यास और पात्रता के अनुसार लोग चारों चरणों मे पाये जाते हैं। कुछ जल्दी विकास करके आगे बढ़ जाते हैं और कुछ जन्मों एक ही पड़ाव पर रुके रहते हैं।गलत कोई भी नही है,गलती है रुक जाना,पड़ाव को मंजिल समझ लेना, इसीलिए बुद्धों, संतो को करुणावश कर्मकांडों पर कटाक्ष और आलोचना करनी पड़ती है। इसके लिए भगवान बुद्ध ने कहा है—

चैरेवेति चैरेवेति अर्थात चलते रहो ,चलते रहो–



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One comment on “जब किसी के हृदय में धर्म का विचार उठता है तो वह सीधे समाधि में ही नही डूब जाता है!”

  • आशीष says:

    जब तक तुम नियत रहते हो तब तक ही तुम चलते हो,एक बार अनंत हो जाओगे तो फिर चलना असंभव होगा….@आशीष
    जनहित बचाओ सभा

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