Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

लामा टॉप ट्रेक के दौरान भटके ट्रेवलर को रात में पुलिस टीम ने किया रेस्क्यू! देखें तस्वीरें

Sanjaya Shepherd-

सुरक्षित हूं पूरी तरह से कल रात 10000 फिट की ऊंचाई पर था और रात होने के कारण भटक कर एक ऐसे क्षेत्र में पहुंच गया था जहां बहुत ज्यादा भालू होते हैं। नदी में गिरने के कारण दांये हाथ में बस चोट आयी है। उत्तराखंड पुलिस और स्थानीय लोगों की तीन टीमों ने रात को ही रेस्क्यू कर लिया था। मेरा फोन डैमेज हो चुका है। सभी का शुक्रिया किसी का फ़ोन नहीं उठा पाया।

इजी ट्रेक था, कैलकुलेशन गलत हो गया… डर ने मुझको जिन्दा रखा… इस बार मौसम हिमालय में ट्रेकिंग के अनुकूल नहीं है। जितने भी ट्रेकर्स आ रहे हैं ज्यादातर बिना ट्रेक किये ही वापस चले जा रहे हैं। मेरा मन ट्रेकिंग का नहीं था और मेरी तैयारी भी नहीं थी पर मौसम थोड़ा सही हो गया तो मैंने एक-एक करके एक सप्ताह के भीतर पांच ट्रेक किये और सब ठीक रहा।

गरतांग गली, सत्ताल ट्रेक, सुमेरु पर्वत, पंचमुखी महादेव और अंत में लामा टॉप जहां पर फंसा। हालांकि इन सबसे सबसे आसान ट्रेक यही है। ट्रेक इजी था, कैलकुलेशन गलत हो गया। इस ट्रेक में एक नहीं चार-पांच गलतियां एक साथ हुईं और यही कारण रहा कि सबकुछ फ़ेवर में होते हुए भी मौत के मुंह तक पहुंच गया। एक ऐसी जगह पहुंच गया जो खूंखार जानवरों के लिए जानी जाती है और भालू का बहुत ज्यादा खतरा रहता है।

ट्रेक करने के लिए जो भी तैयारी होती है वह मैंने पूरी की थी पर समय का जो कैलकुलेशन था वह यह था कि सात बजे तक वापस चले जायेंगे। मुझे यह नहीं पता था कि छह बजे के बाद यह जंगल भरे पहाड़ अंधेरे से मुझे ढक लेंगे और मेरा निकलना मुश्किल हो जायेगा।

मैंने तकरीबन तीन बजे लामा टॉप का ट्रेक हर्षिल से शुरू किया जो कि महज़ दो किमी का है पर खड़ी चढ़ाई और संकरा रास्ता होने के नाते समय ज्यादा लग जाता है। मैं आगे बढ़ता रहा, बस आगे बढ़ता रहा, मुझे लगा कि इस ट्रेक पर मेरे जैसे और भी लोग होंगे पर पूरे रास्ते में मुझे एक भी व्यक्ति नहीं मिला।

करीब साढ़े पांच बजे मैं उस पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी यानि कि लामा टॉप पर पहुंच गया। इस जगह पर छह जुलाई को दुनिया भर से लोग दलाईलामा का जन्मदिन मनाने आते हैं और इसको आत्मिक शांति का प्रतीक माना जाता है। मैंने बहुत मुश्किल से ट्रेक किया था और ऊपर पहुंचकर बहुत खुशी हो रही थी।

मुझे लग रहा था कि जब ऊपर चढ़ाई में ढाई घंटे लगे हैं तो उतरने में डेढ़ घंटे लगेंगे और सचमुच इतना ही लगना था। मैंने फोटाग्राफी और वीडियोग्राफी की, कुछ दोस्तों से बात किया और तकरीबन 15 मिनट वहां बैठा रहा। बहुत ही शांत और बहुत ही सकूनदेह जगह है।

मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था।

छह बजे से मैंने लामा ट्रेक से वापसी शुरू की तो सचमुच उतारना आसान लग रहा था पर अचानक से अंधेरा हो गया, मानोंकी अर्धरात्रि का समय हो जबकि उस समय छह बज रहे थे। मैंने फोन की लाइट जलाया और नीचे उतरने लगा पर यह खतरनाक साबित हुआ। मेरा पैर फिसला और गनीमत ये रही कि बड़े से पत्थर से टकरा गया।

अगर पत्थर नहीं होता तो मैं तकरीबन 300 फ़ीट नीचे खाई में चला जाता। पूरी पहाड़ी पर घुप्प अंधेरा और आसपास कोई नहीं। मैंने ईश्वर को याद किया और एक जगह पर पांच मिनट तक शांत बैठ गया। गिरने के कारण मेरे दाएं हाथ में खरोंच आ गई थी और उसमें से खून निकल रहा था।

कुछ देर बाद मैंने फिर से चलना शुरू किया। एक घंटे में तकरीबन नीचे आ गया और जब 600 मीटर बाकि रह गया तो अंधेरे की वजह से रास्ता भटक गया पर मुझे लगा कि सही रास्ते पर हूं। अंधेरा इतना ज्यादा था कि कदम कहां पड़ रहे पता नहीं चल रहा था और एक गलत कदम पड़ा तो सीधे 300 फ़ीट नीचे खाई में पहुंच जाते।

फिर भी चलता रहा और तकरीबन एक किमी चलने के बाद नदी दिखाई दी जो विपरीत दिशा में बह रही थी और तब जाकर मुझे अंदाजा हुआ कि मैं तो रास्ता भटक गया हूं। इधर कैसे आ गया और कदम रुकते-रुकते फिसल गए और सीधे मैं नदी में जा पहुंचा। मेरे जूते भीग गए और मैं इस घटना से पूरी तरह से कांप गया।

लोग कहते हैं कि डरो मत लेकिन सच कहूं तो इस डर ने ही मुझे जिन्दा रखा। मैंने डरकर अपनी जीपीएस लोकेशन सभी को भेज दिया और स्पष्टतौर पर बताया कि मैं फंस चुका हूं और बिना मदद के बाहर नहीं निकल पाऊंगा। मैंने फोन की बैटरी और नेटवर्क देखा तो नेटवर्क पूरा था पर बैटरी सिर्फ 15% रह गई थी।

मैंने एक बार फिर से हिम्मत दिखाई लेकिन अंधेरा इतना ज्यादा था कि कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि कदम कहां पड़ रहे हैं और वहां से निकलना चाहा तो कोई रास्ता ही नहीं मिला। अब मुझे यह पूरा-पूरा अहसास हो गया था कि मैं फंस गया हूं। मैं बार-बार अपने आपसे यही कह रहा था कि हिम्मत नहीं हारनी है, हिम्मत नहीं हारनी है और अपने दिमाग को संतुलित करने की कोशिश कर रहा था।

मुझे नहीं पता था कि कोई बचाने आएगा कि नहीं लेकिन दूसरी तरफ उत्तराखंड पुलिस और उत्तराखंड पर्यटन को मेरी जीपीएस लोकेशन मिल गई थी। हरसिल के थानाध्यक्ष अजय शाह का फोन आया और एक बार उन्होंने कन्फर्म किया कि कहां हूं।

मैंने उन्हें समझाया तो उनके होश उड़ गए क्योंकि यह पूरा क्षेत्र जंगली जानवरों से भरा हुआ है और भालुओं का बहुत ज्यादा खतरा रहता है और वहां 10-15 मिनट भी रहना मतलब की अपनी मौत को नेवता देना।

फिर मुझे यहां के बचाव दल प्रमुख राघवेन्द्र मधु और संदीप भाई का फ़ोन आया। मुझे कहा गया कि वहां से थोड़ा अगल बगल हो जाओ और जब तक हम ना पहुंचे कोई मोमेंट नहीं करना। मैंने अपने मन को बिल्कुल ही स्थिर कर लिया। ठंड बहुत ज्यादा थी। मैंने आग जलाने की कोशिश की लेकिन जली नहीं।

दूसरी तरफ पुलिस और स्थानीय बचाव दल ने तत्परता दिखाई और किसी अनहोनी से पहले पहुंचकर मुझे रेस्क्यू किया। सच कहूं तो मुझे तो अंदाजा भी नहीं था कि मैं किसी खड्ड में गिरा हुआ हूं। तकरीबन 10-12 लोगों के दल ने मुझे बाहर निकाला, उनकी पहली वर्डिंग यह थी कि सर आप घबड़ाना मत जरूरत पड़ी तो हम आपको दिल्ली तक सुरक्षित पहुंचाएंगे।

हरसिल में मुझे मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं और मेडिकल ऑब्जेर्वशन में कुछ देर रखने के पश्चात मुझे मेरे होमस्टे तक पहुंचाया गया। मैंने अपना फोन ऑन करने की कोशिश की तो ऑन नहीं हुआ। शायद गिरने के कारण वह डैमेज हो गया था।

फिर मैंने खाना खाया और हल्दी दूध पीकर सो गया।

[ उत्तराखंड पुलिस, उत्तराखंड पर्यटन, ऊत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन और विशेषतौर पर मधु भाई, संदीप भाई, हरीश जी और यहां के थानाध्यक्ष अजय शाह और आप सबका जो फोन कॉल्स और सोशल मीडिया के जरिये हर पल साथ होने का भरोसा दिया। मेरी बात को दूसरे लोगों तक पहुंचाया। आप सबका बहुत- बहुत धन्यवाद और खूब सारा प्यार।]

आप सबने मेरे डर को मुस्कराहट में बदल दिया।

देखें वीडियो- Sanjay rescue video


संबंधित पोस्ट-

Rajesh Mittal-

संजय शेफर्ड अब सुरक्षित हैं। उनका मोबाइल अभी खराब है। हर्षिल के बचाव दल प्रमुख हरीश कुमार तनेजा के अनुसारः

हर्षिल लामा टेकरी घूमने गए एक ट्रेवलर व स्वतंत्र पत्रकार गोरखपुर निवासी हाल दिल्ली संजय शेफर्ड जो कि रास्ता भटकने से ककोड़ा गाड़ नाले में 3 km ऊपर चले गए और फिसल कर नदी के किनारे फस गए अपने मोबाइल से लोकेशन उन्होंने संदीप रावत को भेजी संदीप रावत और मै दोनों उनको ढूंढने ककोड़ा नाले में गए ! साथ ही हमने कॉन्स्टेबल कुलदीप तोमर को इस घटना की सूचना दी ! कुलदीप तोमर और थाना प्रभारी श्री अजय शाह भी मौके पर पहुचे ! कच्चे रास्ते से 50 मीटर संजय नीचे नदी के किनारे थे ! उनकी मोबाइल की लाइट से उनतक मै नीचे उतरा और उनको कच्चे रास्ते पर लाया वहाँ से S O साहब उनको व उनके समान को लेकर चले तब तक पुलिस की बैकअप टीम भी आ गयी थी उनको सुरक्षित हर्षिल लाया गया और उनकी पट्टी करवाई गई !

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन