मैं खुद भी संपादक रहते हुए उसी बोरे का आलू था, किसे दोष दूं! : संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

दो हज़ार के नोट में अ-लज्जा के चिप… रात के नौ बजते थे, मामा आवाज़ लगाते थे। “संजय, कहां हो? न्यूज़ का समय हो गया है।”

ये मेरा रोज़ का काम था कि रात नौ बजे दूरदर्शन पर आने वाली खबर को ध्यान से सुनूं और एक डायरी में सामाजिक, राजनैतिक गतिविधियों को नोट करूं। बाद में मामा उन पर मेरे साथ चर्चा करते थे। मामा मध्य प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी थे और ज़ाहिर है कि उनका सपना था कि उनका भांजा यूपीएससी की परीक्षा पास करे और सिविल सर्विस में चुना जाए। बीए में भले मेरा विषय अर्थशास्त्र और इतिहास था लेकिन एमए अर्थशास्त्र की जगह इतिहास से करने के पीछे का मकसद साफ था कि मामा की नज़र में सिविल सर्विस की तैयारी में इतिहास अधिक कारगर विषय था।

ये अलग बात थी कि मेरा मन सरकारी नौकरी करने का बिल्कुल नहीं था। पर पढ़ाई तो करनी ही थी।

आज बात हो रही है न्यूज चैनल और न्यूज की। मैं न्यूज़ सुन कर नोट बनाता था और वो यूपीएससी में जेनरल नॉलेज का एक दस्तावेज माना जाता था। इसके अलावा अखबार में छपी खबरें भी आखिरी सच मानी जाती थीं।

आज मैं अखबार की कहानी नहीं सुनाने जा रहा हूं। समय गवाह है कि अखबारों ने खुद का किस कदर बेड़ा गर्क किया है। पर सबसे बुरा हुआ और बुरा किया टीवी न्यूज़ चैनलों ने। टीवी न्यूज़ चैनलों में प्राइवेटाइजेशन की मांग हुई और सरकार ने बहुत समझदारी से टीवी न्यूज़ चैनल का बहुत सा शेयर प्राइवेट कंपनियों को थमा दिया। जाहिर है दूरदर्शन पर आरोप था कि वो तो सरकारी भोंपू है। पर प्राइवेट न्यूज चैनलों ने क्या किया?

जब तक सिर्फ दूरदर्शन था, टीआरपी का नाम भी हमने नहीं सुना था। पर जैसे ही प्राइवेट धंधेबाज इस बिजनेस में घुसे, टीआरपी नामक बकासुर सामने आकर खड़ा हो गया। मेरी कमीज उसकी कमीज से अधिक सफेद क्यों? सफेदी की चमकार।

किसी ने सोचने की जहमत नहीं उठाई कि ‘चमकार’ कोई शब्द ही नहीं। पर ‘पार्टनर’ ने बोल दिया तो वो शब्द हो गया। मैं तो प्राइवेट टीवी न्यूज़ चैनल के शैशव काल में ही इस धंधे में घुस गया था इसलिए मुझे तो सच मालूम था कि यहां न्यूज़ का निर्माण कैसे होता है। मूल में क्या है?

मूल में था बकासुर यानी टीआरपी।

दूरदर्शन में जो भी लोग नौकरी करने जाते थे उनकी एक परीक्षा होती थी। पर यहां मामला अलग था। मालिक ने एक ‘संपादक’ रख लिया, फिर उस संपादक को मातहत जो पंसद आया, उसने उसे रख लिया। क्योंकि टीवी जिस दौर में आया था, उस दौर में अखबार के संपादक ही बड़े संपादक होते थे। तो मालिकों ने शुरुआती दौर में दोयम दर्जे के संपादकों को टीवी में संपादक बनाया। अधिक पैसा और टीवी पर दिखने का चस्का शुरु में किसी की समझ में नहीं आया, पर सरकारी भोंपू से लोग उबे हुए थे तो बाजार में जो पहले मिला, वही चल गया। क्योंकि प्राइवेट चैनेलों में शुरुआती संपादक दोयम दर्जे के थे तो उन्होंने अपने मातहत के रूप में भी दोयम दर्जे के लोगों को नौकरी देनी शुरु कर दी। अब क्योंकि टीवी में पत्रकारिता तकनीक पर आधारित अधिक थी, तो वही दोयम दर्जे के लोग छाने लगे। और देखते-देखते पत्रकारिता जगत के सिरमौर बनने लगे। भाषा, व्याकरण दर किनार कर, चेहरों को तवज्जो दिया जाने लगा। कॉलेज से निकलीं सुंदरियां रिपोर्टर और पत्रकार कहलाने लगीं। एक पंथ कई काज।

ना राजनीति की समझ और न सामाजिक सरोकार। शुरू में ही लोगों को मज़ा आ गया। सलमा सुल्तान और मंजरी जोशी की जगह ताज़ा सौंदर्य स्टुडियो के भीतर संपादक को और स्क्रीन पर दर्शकों को लहालोट कराने लगा। और सरकार प्रसन्न थी कि खोज-खबर, पोल-खोल से पिंड छूटा। हालांकि शुरू में कुछ पोल खोल के चक्कर में नेता लोग फंसे भी, पर बहुत सतही स्तर पर। जल्दी ही विज्ञापन का तीर मालिकों को ठंडा कर गया। और फिर नाग-नागिन, यमराज-गजराज, बिना ड्राइवर की कार, कुंजीलाल का ज़माना चल पड़ा। कई नए चैनल मशरूम (कुकुरमुत्ता) की तरह उगने लगे। बिल्डर, ब्रोकर, नेता सब मीडिया मालिक बनने लगे॥ संसाधन कम थे, तो नए ढंग की खबरें आनी शुरू हुईं। एलियन ले उड़ा गाय। आसमान में दिख गए साईं बाबा।
मुझे लगता है कि आपको पूरी बात पता है। फिर मैं ये सब क्यों बता रहा हूं?

बात ये है कि अमिताभ बच्चन ने कौन बनेगा करोड़पति के नए एपिसोड के लिए जो पहला प्रोमो पेश किया है, उसमें हमारी अ-लज्जा छिपी है। उन्होंने दो हज़ार के नोट में चिप लगे होने की बात का भरपूर मज़ाक उड़ाया है। सामने बैठी प्रतियोगी दावा कर रही है कि जीपीएस चिप वाला नोट है दो हज़ार का। जाहिर है अमिताभ बच्चन कहते हैं कि ये गलत जवाब है तो महिला कहती है कि लेकिन टीवी न्यूज चैनल पर तो यही बताया गया था। फिर आगे की कहानी आपको पता ही है कि अमिताभ बच्चन कहते हैं कि गलत खबर पर यकीन करने से नुकसान आपका है।
आखिर खबरें गलत क्यों और कैसे होने लगीं?

अमेरिका में रहने के दौरान मैंने बीबीसी लंदन में नौकरी के लिए एक इंटरव्यू दिया था।

इंटरव्यू में पूछा गया था कि अगर आप शिफ्ट इंचार्ज हैं और रात में खबर आए कि भारत पाकिस्तान में युद्ध शुरू हो गया है तो आप क्या करेंगे?

मैंने कहा था कि खबर चला दूंगा।

इंटरव्यू बोर्ड के लोगों ने कहा था कि आप ‘इंडियन मीडिया’ के ढंग से सोच रहे हैं। बीबीसी का नियम है कि खबर चलने में चाहे जितनी देर हो जाए, पर बिना पूरी जांच के खबर नहीं चल सकती है। कायदे से आपको कहना चाहिए था कि मैं तुरंत मीटिंग बुलाऊंगा। खबर की सत्यता का पता लगाऊंगा, फिर खबर चलाऊंगा। ये इंडिया में होता है कि जो खबर मिले, उसे पहले चला दीजिए। कोई टोके तो माफी मांग लीजिए। या चुप्पी साध लीजिए। पर बीबीसी की विश्वसनीयता है। हम ‘जल्दी’ के चक्कर में लोगों के ‘भरोसे’ का सौदा नहीं करते हैं।

मैं मन ही मन उनके जवाब से शर्मिंदा हो रहा था। कितनी बड़ी बात वो कह रहे थे।

हम सचमुच भारत में इसी दम पर उछलने को तैयार रहते हैं कि फलां चैनल से दस सेकेंड पहले हमने ये खबर चलाई है। दो हज़ार के नोट में जीपीएस चिप होने की खबर भी उसी जल्दबाजी का नतीजा थी।

दुर्भाग्य ये कि चलाने वालों के माथे पर शिकन तक नहीं आई कि इतनी बड़ी मूर्खता हमने की।

“हें हें हें…। चल गया तो क्या हो गया?”

नौकरी जानी नहीं थी। मालिकों पर फर्क पड़ना नहीं था। मालिक को चाहिए टीआरपी। और सच बात ये है कि ये किसी एक चैनल की कहानी नहीं, हर चैनल का हाल यही था, है। मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि मैं खुद भी संपादक रहते हुए उसी बोरे का आलू था। किसे दोष दूं?

मेरे पाप का फल इतना ही था कि मैंने अपने बेटे से कभी नहीं कहा कि बेटा, तुम रात नौ बजे न्यूज चैनल देखना। अपने ही किए पर मुझे भरोसा नहीं था। एक ऐसा दौर भी था जब लगने लगा था कि हम सब किसी दवा की कंपनी में नकली दवाएं बनाते हैं। बस चिंता इस बात की थी कि कहीं हमारे परिवार के किसी सदस्य को हमारी बनाई दवा गलती से न खानी पड़ जाए।

हमने जो बोया, उसे अब काटने का समय आ गया है। हमने पूरी पीढ़ी गंवार और नकारा बना दी है। जैसे बड़े-बड़े नेता अपने बच्चों को इंगलिश मीडियम स्कूल में पढ़ाते हैं और जनता के बच्चों के हिंदी मीडियम में पढ़ने को देश भक्ति ठहराते हैं, उसी तरह हमने लोगों के बच्चों को ख़ूब ‘गंदी बात’ दिखलाई और अपने बच्चों को टीवी देखने से मना कर दिया। उसे हमने आईआईटी में पढ़ाया। उसे हमने माइक्रोसाफ्ट, गूगल में नौकरी के लिए उकसाया।

कौन बनेगा करोड़पति की उस प्रतियोगी के दिमाग में हमने भैंस का गोबर भर दिया (गाय का तो पवित्र होता है) कि दो हज़ार के नोट में जीपीएस चिप है।

बात वहीं थोड़े न रुकी। ऐसी खबरें देने वाले दिन रात तरक्की करते चले गए। लोगों का भरोसा सच से उठता चला गया। पर विकल्प क्या है?

फिल्म ‘बेताब’ में जब सनी देवल अमृता सिंह को पकड़ कर अपने फार्म हाउस में ले आते हैं तो उसके सामने सूखी रोटी या कुछ ऐसा ही खाना रखते हैं। अमृता सिंह भड़कती हैं कि ऐसा खाना हम नहीं खाते हैं। बहुत चलताऊ डॉयलाग था जिसमें सनी देवल कहते हैं ,

”खाना है तो ये यही खाना है। नहीं खाना है तो यही खाना है।”

सच यही है। आपको देखना है तो यही खबरें हैं। नहीं देखना है तो यही खबरें हैं। मर्जी आपकी।

फिलहाल मजाक हमारी बिरादरी का उड़ा है। अमिताभ बच्चन जी ने उड़ाया है। हम यही सोच कर खुश हैं कि बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ। इसी बहाने फिर चर्चा में आई वो खबर… “दो हज़ार के नोट में जीपीएस चिप है। जिसके पास होगा, सरकार की टीम पहुंच कर उसे धर दबोचेगी।”

आज दो हज़ार के नोट चिप समेत काला धन में बदल कर गायब हैं। न सरकार पहुंची, न सरकार के सिपाही।

आप हमारा क्या कर लेंगे? हमीं है संपादक, हमीं है रिपोर्टर, हमीं है एंकर। हमें जो अच्छा लगेगा हम करेंगे। हम चाहें तो दंगा करा दें, हम चाहें तो कौन बनेगा करोड़पति वाली महिला को हरवा दें। अब तो है हमसे हर खुशी आपकी। हम पे मरना है ज़िंदगी आपकी…।

(अ-लज्जा कोई शब्द नहीं है। पर क्योंकि शब्द हमारे औजार हैं तो हमारी मर्जी हमने उसे गढ़ लिया है)

लेखक संजय सिन्हा लंबे समय तक आजतक ग्रुप के चैनलों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे हैं. संजय फेसबुक पर प्रतिदिन एक कहानी लिखते हैं जिसके भारी मात्रा में फालोवर हैं. संजय ने प्रभाष जोशी जी के जमाने वाले जनसत्ता में लंबे समय तक काम किया हुआ है.

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