वरिष्ठ पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ला की कनाडा डायरी!

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला अपनी पत्नी के साथ कनाडा अपनी बिटिया के पास गए हुए हैं। वहाँ के जीवन, माहौल, कल्चर पर शंभू जी लगातार लिख रहे हैं। पेश है कुछ अंश-

कनाडा में कमाई भले रोज़ की 150 डॉलर की हो या 500 डॉलर की मगर बचत में ज़ीरो। हमारे पड़ोस में एक परिवार रहता है। पत्नी कोई काम करती है और पति हाउस हसबैंड। तीन बच्चे हैं। हर वीकेंड पर वे ग्रैंड पार्टी करते हैं। दोस्तों के साथ अपने लॉन में खाते-पीते डांस करते हैं। फ़ुल मस्ती। पर किसी से पूछिये, बैंक में कितना पैसा है तो ठन-ठन गोपाल। हमारे देश में काम वाली तक ने बताया था, कि उसने अपनी झुग्गी के एक बाँस में कई हज़ार रुपए जोड़ कर रखे थे किंतु नोटबंदी आई और सारा पैसा मिट्टी हो गया। यही कारण है, कि यहाँ लोग बच्चों को आठवीं तक फ़्री शिक्षा दिलाने के बाद उन्हें हिल्ले लगा देते हैं। 18 वर्ष होने पर लड़का हो लड़की स्वयं अपने माँ-बाप का घर छोड़ देते हैं। अलबत्ता बच्चे के सेटल होने तक नज़र रखते हैं। बच्चों को ऊँची शिक्षा सिर्फ़ भारतीय और चीनी प्रवासी दिलाते हैं। उनके यहाँ तो तीन पीढ़ियाँ एक ही मकान में रहती मिल जाती हैं।
यहाँ तीन बच्चे तो हर किसी के होते हैं। प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के भी हैं। याद कीजिए जब वे कुछ वर्ष पहले इंडिया में ताज़महल देखने गए थे तो एक बच्चे को कंधे पर बिठाये थे और एक को काँख में सहेजे थे। एक बेटी उनकी अंगुली पकड़ कर चल रही थी। पत्नी साथ में चल रही थीं। इस देश में बच्चे देश की सम्पत्ति माने जाते हैं। आप बच्चों को ज़ोर से डाँट नहीं सकते और एक भी थप्पड़ जड़ा तो पुलिस बच्चों को ले जाएगी। फिर आप क़समें खाते रहो कि भविष्य में बच्चों को नहीं घुड़केंगे। इसके बावजूद इंडियन और चाइनीज़ माँ-बाप नज़र बचा कर बच्चों को घुड़क देते हैं। हाँ, 13 से कम उम्र के बच्चों को घर पर अकेले नहीं छोड़ सकते हैं। किसी पड़ोसी ने शिकायत कर दी तो आपको जेल भी हो सकती है। इसीलिए जहां दोनों लोग लगे हों वहाँ बच्चे डे-केयर में रखे जाते हैं। बच्चों को खेलने की छूट दें पर अपनी नज़र से ओझल न होने दें। बच्चों को ख़तरा एकदम नहीं पर माँ-बाप को हैं।
(कनाडा के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा की यह तस्वीर गूगल से साभार)


आठ दिन हो गए कनाडा आए। यहाँ असंख्य दोस्त मैंने बना लिये हैं। उनमें यहाँ बसे हिंदी भाषी उत्तर भारतीय हैं। हिंदी में कोरे दक्षिण भारत के हैं। संस्कृत के विद्वान हैं। सिंहल देश से हैं, चीन व पाकिस्तान से हैं और गोरे भी हैं। यही कारण है, मुझे कोई होम सिकनेस नहीं फ़ील हो रही है। कुछ बहुत अंग्रेज़ी बोलना सीख गया हूँ और यही गति रही तो चार महीने बाद मैं अंग्रेज़ी में भाषण-पटु भी हो जाऊँगा। बाक़ी हिंदी, पंजाबी, उर्दू एवं संस्कृत तो बाँच ही लेता हूँ। टोरंटो की कांसुलेट जनरल और ओटवा स्थित भारत के उच्चायुक्त से भी १५ अगस्त तक मिल लूँगा। यहाँ के प्रधानमंत्री श्री जस्टिन ट्रूडो बहुत लिबरल, सहज और ग्रासरूट आदमी हैं। हमारे मित्र उनसे भी मेरी मुलाक़ात करवा देंगे। इसीलिए मैंने कहा था, सबसे बात करो तो अपना दुःख-दर्द भूल जाओगे। मनुष्य हो इसलिए खुल कर बिंदास हो कर जीना सीखो। कनाडा आए हो तो कनाडा को एंजॉय करो। यहाँ भारत को लाद कर मत घूमो। यहाँ सब बराबर हैं। कोई आपका धर्म, मज़हब या आपकी जाति पूछे तो डाँट कर कहो- how you dare! वह बिल में घुस जाएगा। निकलो बाहर अपने बिल से दुनिया आपका इंतज़ार कर रही है।

मलकिनी जो हिंदुस्तान में 100 मीटर चलने में पीड़ा से विह्वल हो जाती थीं और टू BHK फ़्लैट तक सीमित रहते थीं। आज मिनिमम दो किमी चलती हैं और उन घुमावदार सीढ़ियों पर चढ़ लेती हैं, जिनके बारे में पाँच वर्ष का नाती करवा लाल भी कहता है- नानी यू डोंट डू दैट!


महँगाई जितनी भारत में है उतनी ही कनाडा में भी। पेट्रोल पौने दो डॉलर का एक लीटर है अर्थात् क़रीब 112 रुपए का। डीज़ल 1.86 डॉलर का प्रति लीटर है यानी पेट्रोल से अधिक। खाना-पीना भी पर्याप्त महँगा है और पब्लिक कन्वेयन्स भी कोई भारत से कम नहीं। यहाँ टैक्स इंडिया से अधिक हैं। लेकिन स्वास्थ्य और आठवीं तक शिक्षा मुफ़्त है। इसके बाद बहुत महँगी। यही कारण है कि अधिकतर कनाडाई बच्चे आठवीं के बाद पढ़ नहीं पाते। सिर्फ़ चीनी व भारतीय लोग ही अपने बच्चों को पढ़ाते हैं। लेकिन आदमी के श्रम का महत्त्व इतना अधिक है कि आप अपने नौकर से, सफ़ाई कर्मी से भी अबे-तबे नहीं कर सकते। इसीलिए जो कनाडा आया वह यहीं का होकर रह गया। कनाडा में बसे भारतीय व चीनी।

चित्र में पेट्रोल की क़ीमत शो करता एक रेट चार्ट, गोरों के देश में परंपरागत धार्मिक पहचान को स्पष्ट करता एक निहंग सिख, भारतीयों के शानदार मकान व गाड़ियाँ। एक दूरस्थ गाँव में चीनी खेतिहर मज़दूरों ने हमें भेंट की सब्ज़ी। जबकि वे अंग्रेज़ी का एक शब्द नहीं जानते। पर प्यार की भाषा को शब्द नहीं मनोभाव व्यक्त करना आना चाहिए।


मैं टोरंटो के पब्लिक प्लेस पर कुर्ता-पायजामा पहन कर विचरण करता हूँ। इस वज़ह से मेरी पहचान फ़ौरन स्पष्ट हो जाती है। पाकिस्तानियों का ध्यान मेरी तरफ़ अधिक खिंचता है। भारतीयों और बांग्लादेशियों का भी। इस कारण मुझे भाषा की क़िल्लत नहीं होती। और मैं स्वयं सभी से संवाद कर लेता हूँ। चाहे वह ब्लैक हो या गोरा अथवा ब्राउन मेरा सभी से डायलॉग है। शायद इसीलिए मैं आने वाले चार महीनों तक बोर नहीं होना है। फिर जब दिल्ली आऊँगा तब पराली की लपटें होंगी और AQI भी 500 के आसपास होगा। इसलिए मैं आते ही समुद्र तटीय किसी क्षेत्र में चला जाऊँगा।


आज लेक अंटारियो गए। बीच पर भीड़ बहुत थी। हम एक बेंच पर बैठ गए। मेरी बग़ल में हिजाब लगाए एक युवती बैठी थी। मैंने पूछा, कहाँ से हो बिटिया? बोली, पाकिस्तान के लाहौर से। मैंने कहा फिर तो पड़ोसी हो। आज मुस्लिम का नव वर्ष भी है मगर बिना यह जाने कि ये शिया हैं या सुन्नी, इनको मुबारकवाद कैसे दी जाए! मैंने कुछ झिझकते हुए कहा, आप लोग शिया हो या सुन्नी। वह भी थोड़ा झिझकी, सोचा होगा हाय अल्ला! पाकिस्तान से हज़ारों किमी दूर भी शिया-सुन्नी। ख़ैर, वह बोली- हम लोग सुन्नी हैं। मैंने कहा, कि हैपी न्यू ईयर। वह खुश हुई बोली थैंक्स। उसके पति आ गए। तो मैंने हैंड शेक किया और हैप्पी न्यू ईयर बोला। दोस्ती हो गई। तब उसकी पत्नी ने बताया कि उसका नाम हिना है। एक वर्ष से वे यहाँ हैं, पत्नी हाउस वाइफ़ है और पति पढ़ रहा है। खर्चा-पानी कैसे चलता है तो बोली, मेरी दोनों बेटियाँ यहीं पैदा हुई हैं, इसलिए इनके भरण-पोषण के लिए वज़ीफ़ा मिलता है और कुछ लाहौर से लेकर आए हैं। दरअसल उनका PR पुराना है। इसलिए बेटियाँ जब होने को हुईं तो दम्पति कनाडा आ गए। बाई बर्थ बेटियाँ कनाडा की नागरिक हो गईं। मियाँ-बीवी भी एक न एक दिन नागरिक हो ही जाएँगे। फिर वे धीरे से बोले, चलो, पाकिस्तान के निज़ाम से छुट्टी मिली। पति को पुलाव पसंद है और पत्नी को बिरयानी। इसलिए कभी-कभी खटक जाती है।


यहाँ मेहनती आदमी की कमाई ख़ूब है। लेकिन खर्च भी कम नहीं। आलीशान गाड़ी और उतने ही भव्य आवास। केस्को, वालमार्ट, होमडिपो में अंधाधुंध ख़रीदारी होती है और अगर सेल लगी हो तो टूट पड़ते हैं। ज़रूरत से अधिक ख़रीद लेते हैं और फिर बर्बाद करते हैं। उपभोक्तावाद यहाँ चरम पर है। मज़दूर और मालिक सबके पास गाड़ी। कोई किसी से हेय नहीं। मज़दूर अपने मालिक को कोई सलाम नहीं करता न सर बोलता है। वह उसे जॉन या स्मिथ के नाम से बुलाएगा। अगर यहाँ एक अनजाने व्यक्ति ने भी आपको गुड मॉर्निंग कहा हो तो उसके जवाब में मुस्करा कर आप उसे मॉर्निंग कहेंगे। न कहना एक अवमानना है। अंग्रेज़ी यहाँ कोई सम्मानित भाषा नहीं है। सम्मान फ़्रेंच बोलने वालों को मिलता है। अंग्रेज़ी बोलने वालों को लोफ़र या लंपट समझा जाता है। बल्कि क्युबेक में अगर आपने अपने साइन बोर्ड में अंग्रेज़ी ऊपर रखी, फ़्रेंच नीचे तो आप पर जुर्माना ठोका जा सकता है। वहाँ अंग्रेज़ी से आपका काम नहीं चलेगा। अलबत्ता हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला गुजराती तमिल, तेलुगू को एक सम्मानित भाषा है।


अगर आपके दाँत में दर्द हो या चश्मा टूट जाए तो फिर आपको भारत भागना होगा। ऐसा नहीं कि यहाँ डेंटिस्ट न हों। ख़ूब हैं पर उनकी फ़ीस इतनी अधिक है कि दाँत का दर्द भूल जाएँगे। कोई भी मेडिकल बीमा दाँत को कवर नहीं करता और न सरकारी अस्पताल। क्योंकि दाँत को स्वास्थ्य से नहीं काज़्मेटिक से जोड़ा गया है। दाँत के डॉक्टर को यहाँ डॉक्टर नहीं डेंटिस्ट या कारीगर कहा जाता है। यही हाल चश्मे का है। यूँ भारत में भी BDS या MDS को अन्य डॉक्टर नीची निगाह से देखते हैं पर कमाई वहाँ भी इनकी ख़ूब है और यहाँ भी।


विटबी (Whitby) ग्रेटर टोरंटो का एक उपनगर है। यहाँ तीन पब्लिक लाइब्रेरी हैं। आज मैं यहाँ की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में गया जो डंडसा रोड की हेनरी स्ट्रीट में है। दिल्ली या कोलकाता में इतनी विशाल और भव्य लाइब्रेरी मैंने नहीं देखी। बहुत सारी पुस्तकें लीं। हिंदी सेक्शन में भी कई मुझे किताबें दिखीं। वहाँ से मैंने श्री Tejendra Sharma की दस प्रतिनिधि कहानियाँ उठाई। पहली कहानी तो वहीं बैठ कर पढ़ गया। पसंद आई और मैं वह पुस्तक घर ले आया। अब आराम से पढ़ूँगा। रामचंद्र गुहा की गांधी और शशि थरूर की किताबें भी लाया हूँ। वहाँ मुझे बालक, वृद्ध, युवा, वनिता सब दिखे और दिखीं। अस्सी वर्ष से अधिक उम्र की एक महिला अपनी लम्बी सी कार ख़ुद ड्राइव कर आईं और कार पार्क कर स्टिक उठाई और लाइब्रेरी के मुहारे आ गईं। मैंने उनसे कहा, कि मैम आपकी गाड़ी खुली हुई हैं। बोलीं डोंट वरी यहाँ चोरी नहीं होती। सुन कर मैं सन्न रह गया।


यहाँ सबसे बड़ी समस्या पाछा धोने की है। गोरे तो पाछा में पोंछा मार कर काम चलाते हैं और ब्लैक भी। लेकिन बेचारे ब्राउन क्या करें! श्रीलंकाई और चायनीज भी पोंछ-पाछ कर छुट्टी पा जाते हैं। पर भारतीय व पाकिस्तानियों में तगड़े से धोने की परंपरा है। अब क्या करें! मग्घे से पानी लें तो छलकेगा और पानी की निकासी सिर्फ़ बाथ टब से है। इसलिए पहले मग्घे से धोओ और फिर कमोड पर छलका पानी टॉयलेट पेपर से पोंछो। दूसरे यहाँ थ्री बेडरूम वाले घरों में भी टॉयलेट सिर्फ़ एक होती है। मगर बच्चों ने मेरे आने के पूर्व ऐसा घर लिया जिसमें दो टॉयलेट हैं और फिर कमोड में जेट भी लगवाए गए। जेट लगाने के लिए सामान एक इंडियन स्टोर से लाए और जो प्लंबर लगाने आया, वह पाकिस्तानी था। न धोने के कारण गोरों में पाइल्स आम है और स्टमक कैंसर भी। इसलिए धोते रहो!


सुबह सैर को निकले तो क़रीब चार किमी गए और आए। कुल डेढ़ घंटे लगे। पूरा वॉकिंग ट्रैक लम्बवत चला गया है। आगे भी है पर मैंने इतना ही किया। दोनों तरफ़ दूर-दूर तक हरियाली। लोग मिलते हैं अधिकांश गोरे। सब एक-दूसरे को गुड मॉर्निंग या हाथ हिला कर विश करते हैं। मैं भी सब को करता रहा। बीच-बीच में साउथ एशिया के लोग भी मिले। पर उनके साथ संकोच रहता है। कोई चार किमी बाद एक बड़ा-सा मैदान मिला। उसमें एक हिंदुस्तानी महिला सलवार-सूट पहने टहल रही थीं, मैंने उनको नमस्ते किया तो वे शर्मा गईं। कुछ देर बाद दो लोग हिंदी में बातचीत करते हुए क़रीब आए तो मुझे देख कर ठिठके फिर बोले गुड मॉर्निंग। मैंने भी मॉर्निंग कहा और वे चले गए। मैं पास की बेंच पर बैठ गया। दस मिनट बाद वे उस मैदान का चक्कर काट कर फिर आए तो मैंने हाथ जोड़े और कहा- नमस्कार। उन्होंने भी हाथ जोड़ कर अभिवादन किया। मैंने कहा, आज हिंदी सुनने को मिली। फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। सरदार जी का नाम था मोहन सिंह था और मोने सज्जन थे पवन मल्होत्रा। दोनों अपने बच्चों से मिलने दिल्ली से आए हुए हैं। मल्होत्रा जी कल चले जाएँगे लेकिन सरदार जी के पास तो PR है, वे रुकेंगे। उन्होंने बताया कि आपकी तरफ़ गोरे ज़्यादा हैं। इधर आया करिए सब अपने लोग हैं। बातचीत के दौरान उन लोगों ने बताया कि देखो जी पैसा तो अपने देश में भी ख़ूब मिलता है। सुविधाएँ भी हैं पर दिल्ली में साँस लेना मुश्किल है इसीलिए बच्चे यहाँ से जाना नहीं चाहते। यहाँ अगर AQI तीन पहुँच जाए तो येलो एलर्ट जारी हो जाता है, अपने यहाँ 300 तक नॉर्मल समझा जाता है। वॉकिंग ट्रैक छह फ़िट चौड़ा है और फिर दोनों तरफ़ आधा-आधा मील तक घास के मैदान। ख़ूब पेड़ और ट्रैक भी तारकोल का, जिसमें कुशन ख़ूब मिलता है। यहाँ दाएँ चलते हैं और गाड़ियाँ भी लेफ़्ट हैण्ड ड्राइव हैं। इसलिए सड़क पार करते हुए पहले बाएँ देखें फिर दाएँ। यहाँ पैदल चलने वाले के अधिकार अधिक हैं। सड़क पार करते समय आपने हाथ दिया तो गाड़ी रुक जाएगी। गाड़ी यहाँ अगर किसी को टच भी कर गई तो लाखों का जुर्माना है। ओवर स्पीडिंग पर 10000 डॉलर का मिनिमम जुर्माना। यानी 6.5 लाख रुपए। शराब पीकर गाड़ी चलाई तो जुर्माना के साथ-साथ लाइसेंस भी निरस्त। क़ानून सख़्त हैं और लोग पालन भी करते हैं।


कनाडा में श्रम का महत्त्व है। यहाँ हैंडी मैन बहुत महँगे हैं। हैंडी मैन अर्थात् राज-मिस्त्री का काम करने वाले, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, मैकेनिक, साफ़ सफ़ाई करने वाले, माली, मोची, दर्ज़ी आदि। एक गड्ढा खोदने वाला भी 500 डॉलर रोज़ कमाता है। इसीलिए हर आदमी यहाँ अपनी कार ख़ुद ड्राइव करता है और घर की साफ़-सफ़ाई से लेकर पेड़-पौधों की देखभाल तक। बड़े-बड़े लेखक, कवि और पत्रकार व संपादक तथा प्रोफ़ेसर ट्रक लेकर होम डिपो जाते हैं और लकड़ी ला कर घर पर ही मेज़ कुर्सी बना लेते हैं। इसीलिए उनके पास फेसबुक के लिए समय नहीं होता। यहाँ लोग सोशल मीडिया पर या फ़ालतू में गैदरिंग कर मानसिक दीवालिया नहीं होते। उनका ज्ञान, उनके नैतिक मूल्य और सामाजिक आचरण उनके श्रम से निकले होते हैं।हमारे घर के सामने के घर में मज़दूरी कर रहे चीनी महाशय निकले और अपनी इस टोयोटा कार में बैठ कर चल दिए। इसे कहते हैं “श्रमेव जयते!”


कनाडा में श्रम के महत्त्व वाली मेरी पोस्ट से बहुत लोगों को मिर्ची लगी। कुछ लोगों ने कहा, कि वे पहली बार विदेश गए हैं, इसलिए वहाँ की आर्थिक स्थिति पर लट्टू हैं। कुछ ने कहा बुकनूँ फाँकने वाले की औक़ात भला क्या है! यानी जितने मुँह उतनी बातें! उन्हें मिर्ची लगनी भी चाहिए, आख़िर बौद्धिक जुगाली करने वाले समाजवाद का लेक्चर तो देंगे पर सदैव यह सोचेंगे, कि उनके हिस्से का श्रम कोई और करे। यही ब्राह्मणवाद, मनुवाद या श्रेष्ठतावाद है। अंग्रेजों ने भारत में जो ज़मींदारी का स्वरूप बदला, उसके चलते स्वयं के हिस्से का श्रम दूसरों से बेगारी के रूप में क़राया जाने लगा। आज भी भारत में मज़दूरों की स्थिति कितनी ख़राब है और सदैव उनको हीन नज़र से देखा जाता है। मेरे पिता एक अकुशल मज़दूर थे और उन्हें घर चलाने के लिए मिल की मज़दूरी से मिल रहा वेतन नाकाफ़ी था। वे गली-गली जाकर साइकिल से साबुन बेचते थे। मैंने भी अख़बारों में क़लम की मज़दूरी की। कभी भी अख़बार के वेतन से घर चलाना पर्याप्त नहीं हुआ इसलिए इतर काम भी करने पड़ने पड़ते रहे। चाहे वह फ़्री-लांस लेखन हो या अनुवाद का काम। भारत के एलीट वर्ग के बीच अपनी कोई पैठ नहीं रही। लेकिन यहाँ जब मैं देखता हूँ कि मज़दूरों को कोई ओछी निगाह से नहीं देखता तो सुखद आश्चर्य होता है। मज़दूर यहाँ राष्ट्राध्यक्ष बन सकता है। इसके विपरीत भारत में श्रम को हीन माना गया और उसके चलते ब्राह्मण और शूद्र का भाव आया। यह भेदभाव यहाँ नहीं है। क्योंकि पश्चिम में श्रमिकों ने राज्य को लोकतांत्रिक बनवाया। एलीट वर्ग के हाथ में केंद्रित सत्ता प्रतिष्ठानों को विकेंद्रित किया। चाहे वे पूँजीवादी देश हों या समाजवादी। लेकिन मेरी उस पोस्ट से अपने देश में परंपरागत लेफ़्ट और राइट सोच रखने वाले लोगों को इसलिए भी बुरा लगा क्योंकि मैंने लिखा था, एक मज़दूर यहाँ 500 डॉलर रोज कमा लेता है। और उसके पास भी महँगी कारें तथा बंगले हैं। फ़ौरन लोग उछलने लगे और मेरी लानत-मलामत करते हुए जवाब दिया, वहाँ मज़दूरी के रेट 15 डॉलर घंटा है, तो वह कैसे 500 डॉलर रोज क़मा सकता है। भाई मेरे यहाँ न्यूनतम मज़दूरी इतनी है, लेकिन मज़दूर में यदि कोई कौशल है तो वह 50 से 100 डॉलर प्रति घंटे घंटे की मज़दूरी यहाँ लेता है। दिन भर में 500 डॉलर कमा लेना उसके लिए सहज है।


रोज़ नहाना और डेली शेविंग यहाँ फ़ालतू के काम हैं। ईश्वर के लिए भी सप्ताह में एक दिन निर्धारित है। संडे को चर्च जाएँ और कन्फ़ेस कर लें। यहाँ किसी कामरेड का जनेऊ नहीं टूटता न ही व्यक्ति यहाँ भगवान का चाकर होता है!


आए तो अपन कैटल क्लास से ही हैं। बिजिनेस क्लास शशि थरूर जैसे पॉलटिक्स को बिजिनेस बनाने वालों को मुबारक। इस कैटल क्लास जैसा मज़ा, आत्मीयता और प्यार पहले किसी फ़्लाइट में नहीं मिला। पर्सर सारे गोरे और पैसेंजर सारे काले। किंतु इन काले और पिंड वाले पैसेंजरों में ग़ज़ब की एकता दिखी तथा पारस्परिक सहयोग भी। पिंड वाले पटियाले और अमरितसरिया बोली बोल रहे थे तो बिहार के पैसेंजर भोजपुरी, मगही और मैथिल। बीच में हम कुछ कानपुर, लखनऊ के थे जो बइठी हिंदी को खड़ी बोली बताते हैं। मैंने इन पैसेंजरों को नाम दिया- BPL अर्थात् बिहार, पंजाब व लखनऊ। हमारी सुबह जो कनाडा की रात थी, पिंडवालियां हवाई जहाज़ के अंदर ही गुरुबानी का पाठ करने लगीं। बिहार वाले हनुमान चालीसा का और लखनऊ- कानपुर वाले मुँह सिये बैठे रहे। एक जैनी वेज भोजन की डिमांड करने वाले “नमो अरिहंतानं!” भजने लगे। पीछे बैठे एक मुस्लिम ने जानमाज़ बिछा कर कई बार नमाज़ पढ़ी। सब ने एक पंगत में खाया और बारी-बारी से एक ही संडास में निर्गत हुए। जैनी का तकिया गिरा तो मैंने उठाया और मेरी पानी की बोतल बिहारी बाबू लाये। पिंड वाली जब एप्पल सूप लेने गईं तो ट्रे में हम दोनों के लिए भी ले आईं। कोई अंग्रेज़ी नहीं बोल रहा था और सब पर्सर को पंजाबी, उर्दू और मगही में निर्देश दे रहे थे। न भारत में आईजीआई एयरपोर्ट पर इमीग्रेशन वालों ने निरर्थक सवाल किए न टोरंटो के पीयरसन एयरपोर्ट में कोई पूछताछ हुई। दोनों जगह पाँच मिनट में ही सब कुछ हो गया। टोरंटो में हिंदी और पंजाबी बोलने में सक्षम मदद अधिकारी ने हेल्प की। सामान ख़ुद ट्रॉली में रखा और EXIT से बाहर आ गए। नातिन कनाडेश्वरी और नाती करवालाल अपने माँ-पिता के साथ गेट पर ही मिल गए और ऐसा चिपटे कि सबकी हिलक बंध गई।


टोरंटो सकुशल आ गया हूँ और उम्मीद है कि 15-16 घंटे की दिल्ली से सीधी उड़ान के हैंग-ओवर से जल्दी ही उबर जाऊँ। मेरी इच्छा है कि भारत से बाहर रह रहे भारत के लोग भारत को कैसा महसूस करते हैं, यह समझने का प्रयास करूँ। निश्चय ही यह देश वातावरण के प्रदूषण से मुक्त है और काफ़ी हद तक राजनीतिक प्रदूषण से भी। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यहाँ सरकार का काम टैक्स लेना और टैक्स के पैसों से जन-हितकारी काम भी करना है। यहाँ के राजनीतिक जनता के बीच सामाजिक प्रदूषण भी नहीं फैलाते। कर अपवंचना एक अपराध है। अभी तक का मेरा अनुभव रहा कि लोग मिलनसार हैं और आत्मीय भी। अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, पंजाबी, गुजराती, उर्दू-हिंदी, चीनी बोलने वाले पर्याप्त हैं इसलिए भाषा की जड़ता कम है। धीरे-धीरे और कुछ भी पता चलेगा, वैसे-वैसे मैं आपको बताता रहूँगा। फेसबुक लाइव भी फिर से शुरू करूँगा और अपने यू-ट्यूब शम्भुकेतीर की कड़ियाँ भी जोड़ूँगा।



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