गुप्ताजी दोनों तरफ मलाई चाट रहे हैं!

सत्येंद्र पीएस-

शेखर गुप्ता भी अजीब हैं। एक लेख में ललकारते हैं कि नरेंद्र मोदी को यह तय करना है कि उन्हें मनमोहन सिंह बनना है या दृढ़ रहना है। मोदी को वह डराते हैं कि अन्ना आंदोलन को लेकर मनमोहन ने सख्त रवैया नहीं अपनाया, इसलिए उनकी सरकार चली गई। मोदी को कृषि कानून को लेकर दृढ़ता दिखानी चाहिए।

जब मोदी की चमचागीरी में जब नीति आयोग के उपाध्यक्ष यही बात कहते हैं कि अब मजबूत सरकार है और वह बोल्ड फैसले ले रही है, भारत में टू मच डेमोक्रेसी है जिसके कारण हर बोल्ड सुझावों का विरोध होता है, तब शेखर गुप्ता अमिताभ कांत पर टूट पड़ते हैं कि यह कहने का क्या मतलब?

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