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सुख-दुख

संघ को शिमला के पत्रकारों के सर्वोच्च संगठन में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए थी!

कृष्ण भानु-

यह डूब मरने का समय है। उनके लिए, जिन्होंने फर्जी मतदान के विरुद्ध न लड़ाई लड़ी और न ही विरोध किया…और उन सत्तालोलुप “पत्रकारों” के लिए भी, जो फर्जी मतदान का षडयंत्र रचकर प्रेस क्लब शिमला को ‘हाइजेक’ करने में कामयाब रहे। राज्य सरकार के एक मंत्री ने तो प्रेस क्लब के चुनावों में दखल करके अपनी जड़ें खोखली कर दीं।

कोई समझदार राजनेता पत्रकारों के झमेले में नहीं पड़ता, लेकिन ये पड़ गए। आरएसएस का नाम भी बहुत उछला। यदि यह सत्य है, जिसकी सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया सकता, तो यह दुःसाहस संघ की छवि को बट्टा लगाता है। संघ को शिमला के पत्रकारों के सर्वोच्च संगठन में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए थी। मंत्री तो छह महीने बाद “गयो” समझो।

पिछले कल करीब सवा सौ से अधिक रहस्यमयी युवा, जिनकी उम्र 20 से 25 के बीच थी, जब क्लब में मतदान करने पहुंचे तो देखकर शिमला के पत्रकार दंग रह गए। उन्हें इससे पहले किसी ने नहीं देखा था और न ही उनका पत्रकारिता से दूर-पार का कोई रिश्ता-नाता था। पता चला कि उनमें से अधिकतर यूनिवर्सिटी के छात्र हैं। असली पत्रकार विरोध इसलिए नहीं कर सके, क्योंकि उन छात्रों के नाम मतदाता सूची में दर्ज थे और मतदान पुलिस के पहरे में चल रहा था।

फिर भी विरोध होना चाहिए था। समाज का यह चौथा स्तम्भ पिछले कल अपनी रक्षा नहीं कर सका तो दूसरों की रक्षा ख़ाक करेगा ? भीरू और खुदगर्ज पत्रकारों की भीड़ खड़ी हो गई है शिमला में। तभी तो कह रहा हूँ कि यह डूब मरने का समय है। फर्जी मतदान कराने वालों के साथ-साथ उन पत्रकारों के लिए भी जिन्होंने इसका विरोध नहीं किया। कड़ा विरोध होना चाहिए था। कोई फांसी नहीं लग जाती। पत्रकारों की 37 वर्ष पुरानी इस संस्था को बचाने के लिए सूली पर चढ़ना पड़ जाता तो चढ़ लेना चाहिए था।

फिर कहूंगा और बार-बार कहूंगा कि यह डूब मरने का समय हैI शिमला की अश्वनी खड्ड में यदि पानी कम है तो तत्तापानी या सुन्नी की घाटियों से कोलडैम (झील) में कूदकर डूब मरो दुष्टों! या चुल्लू भर पानी में नाक डुबोकर मर जाओ। साहस नहीं है तो मुझे कहो, मैं झील की ओर धक्का दे दूं ?

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