हर महिला रिपोर्टर श्वेता, अंजना या रूबिका नहीं होती, शुभ्रा भी होती है!

नवेद शिकोह-

घुन के साथ गेहूं भी पिस रहे… पहले बिकाऊ पत्रकार गेहूं में घुन के बराबर थे। अब घुन ही घुन हैं, घुनों के ढेर में कुछ ही गेहूं बचे हैं। इस बीच जनता के गुस्से की चक्की में बेइमान घुनों के साथ ईमानदार गेहूं भी पिसे जा रहे हैं।

आम जनता को मीडिया के बिक जाने का शक नहीं यक़ीन हो गया है। यक़ीन की ये लाठी अब बड़े-बड़े पत्रकारों को दौड़ा रही है। टीवी जर्नलिस्ट घेरे जा रहे हैं। बड़े-बड़े ब्रॉन्ड चैनलों की आईडी लिए पब्लिक के बीच पंहुची खूबसूरत लड़कियों को भी गो बैक गोदी मीडिया..गो बैक गोदी मीडिया.. नारों के साथ उल्टे पैरों वापस किया जा रहा है।

दरअसल अर्नब गोस्वामी,अंजना ओम कश्यप, सुधीर चौधरी, रूबिका लियाक़त, अमीश देवगन, श्वेता, रजत शर्मा, चित्रा त्रिपाठी, दीपक चौरसिया, सुमित अवस्थी और रोहित सरदाना जैसे तमाम टीवी एंकर्स के ख्याल और इरदों को लोगों ने मीडिया का चेहरा मान लिया है। ये लोग बड़ी टीआरपी वाले ब्रांड न्यूज़ चैनलों के प्राइम टाइम एंकर हैं।आम जन को लगता है कि यही एजेंडा तय करते हैं। यही जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता का दौर खत्म कर सरकारों के भोपू का काम करते हैं। यही गोदी मीडिया हैं। इनके चैनलों की आईडी देखकर अक्सर आंदोलनकारी भड़क जाते हैं। गुस्सा इतना है कि कभी कभी घुन के साथ गेहूं भी पिस जाते हैं। जनमानस को हर महिला टीवी रिपोर्टर में चिप वाली के नाम से जाने वाली श्वेता, अंजना, रूबिका या चित्रा नज़र आती हैं।

ये कम लोग जानते हैं कि सीप के गंदे मांस के अंदर बेशकीमती मोती भी हैं। गुदड़ी में भी कुछ लाल बचे हैं। शुभ्रा सुमन जैसी देश की तमाम बेटियां और बेटे पत्रकारिता की लाज बचाये हैं। भले ही वो टॉप टैन की टीआरपी वाले मीडिया प्लेटफार्म मे नहीं है पर वो जितना संभव हो पाता है जनता के हक़ के लिए पत्रकारिता का हथियार लेकर लड़ते हैं। समाज को तोड़ने के बजाय जोड़ने का काम करते हैं। प्रायोजित झूठ के बजाय धुंध में खोये सच को सामने लाते हैं। ये विपक्ष के प्रायोजित एजेंडे या सत्ता की चाटूकारिता के बजाय जनसरोकारों वाली रिपोर्टिग करके सिसकती पत्रकारिता के मूल उद्देश्यों को आक्सीजन दे रहे हैं।

शुभ्रा भी ऐसे नायाब और दुर्लभ पत्रकारों में शामिल है। उनकी पत्रकारिता की तीसरी आंख अंतिम पंक्ति में बैठे समाज के दुख-दर्द को पहले देखती है। शुभ्रा इन दिनों किसानों की आवाज और उनके दर्द को सत्तानशीनों तक पंहुचाने का जायज़ फर्ज निभा रही हैं। लेकिन दुर्भाग्य कि इस महिला जर्नलिस्ट को भी घेर कर किसानों ने गो बैक गोदी मीडिया… के नारे लगाना शुरु कर दिया। ऐसा अक्सर होता है।

मुझे याद है कि लखनऊ की चर्चित जर्नलिस्ट काविश सीएए के विरुद्ध आंदोलनकारियों के दर्द और जज्बातों को सकारात्मक नियत से कवर कर रही थीं लेकिन इस रिपोर्टिंग के दौरान उनकी खून-पसीने की कमाई का मंहगा कैमरा चकनाचूर कर दिया गया। आम जनता और आंदोलनकारियों को लगने लगा है कि मीडिया उनके खिलाफ है और सरकार के लिए काम करती है। ऐसे जनतंत्र का जोश और आक्रोश ईमानदार और बेइमानी मीडिया को नहीं पहचान पाता है।

हर चमकती हुई चीज़ सोना नहीं होती, पान की पीक से सनी नाली में पड़ी गंदी सिगरेट की डिब्बी की पन्नी भी चमकती है। हाथों में ए के 47 तानने वाला हर शख्स आतंकवादी ही नहीं होता, सरहदों पर खड़ा देश का सैनिक भी एके 47 लेकर खड़ा होता है। हर बाबा आसाराम बापू नहीं होता।

ऐसे ही हर महिला रिपोर्टर श्वेता, अंजना या रूबिका नहीं होती। शुभ्रा भी होती है।

  • नवेद शिकोह
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