‘सूफी मिशन पर घाटी में बवाल’ शीर्षक खबर कहीं दिखी?

महाराष्ट्र चुनाव में कश्मीर और हमारे अखबारों से कश्मीर गायब! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल महाराष्ट्र में अपने चुनावी भाषण में कश्मीर की चर्चा की और आज ज्यादातर अखबारों ने उसके “हिम्मत है तो कश्मीर में अनुच्छेद-370 की वापसी का वादा करे विपक्ष” की चुनौती को प्रमुखता दी है। दैनिक जागरण ने उपशीर्षक लगाया है, ललकार – महाराष्ट्र में पीएम ने कहा, जम्मू-कश्मीर जमीन का टुकड़ा नहीं, भारत का मस्तक। भारत के मस्तक का क्या हाल है? इसकी रिपोर्टिंग कैसे होती रही है और पांच अगस्त के बाद से कितनी, कैसे हुई है। इसे हमारे अखबार नहीं बता रहे और ना आप जानते हैं। और शायद मतलब भी नहीं रखते हैं। पहले तो आज की खबर के शीर्षक की बात करूं। फिर बताता हूं कि मस्तक की कौन सी खबर अखबारों ने छोड़ दी है। द टेलीग्राफ को छोड़कर मैं जो भी अखबार देखता हूं सबमें यह खबर पहले पन्ने पर लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया भी अपवाद है।

हिन्दुस्तान टाइम्स सबसे आगे है। उसने लिखा है, हम जम्मू और कश्मीर की 40 साल पुरानी समस्या चार महीने में ठीक कर देंगे। उपशीर्षक में वही अनुच्छेद 370 को फिर से बहाल करने की चुनौती। ठीक है कि प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर है और जो कहा है वह लीड जैसी खबर भी हो सकती है। पर सवाल उठता है कि नोटबंदी के बाद 50 दिनों में सपनों का भारत मिलना था उसका क्या हुआ? अगर उसे भूल गए तो चार महीने के इस दावे को भी भूल जाएंगे? हालांकि चार महीने का यह दावा वैसे भी हवा-हवाई ही है। चार महीने कबसे? 5 अगस्त से क्यों नहीं। और अगर 5 अगस्त से ही चार महीने कहना है तो जो ढाई महीने बाकी रह गए हैं वही कहा जाना चाहिए। अगर 5 अगस्त से नहीं तो इतने दिन पूरे कश्मीर को कैद रखने का क्या मतलब? और सिर्फ कह देने से चार महीने या कोई योजना, रणनीति अथवा कार्यक्रम है? इसके बिना कैसी खबर और किसके लिए? ऐसी खबर को लीड बनाने का मतलब?

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में छापा है और सूचना है कि विस्तार अंदर के पन्ने पर है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को और फैला दिया है। पांच कॉलम में दो लाइन का इसका शीर्षक हिन्दुस्तान टाइम्स के उपशीर्षक को भी समेट लेता है और इसके साथ राजनाथ सिंह की भी खबर है, अनुच्छेद 370 तो पिछले कार्यकाल में ही खत्म हो गया होता। पर किसी कारण और घटना से ऐसा नहीं हो पाया। राजनाथ सिंह ने हरियाणा की रैली में यह दावा किया और अखबार ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि घटना पुलवामा की थी। इंडियन एक्सप्रेस ने प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री का पूरा भाषण छापा है जो पहले पेज से शुरू होकर दूसरे पेज पर खत्म होता है।

हिन्दी अखबारों का प्रदर्शन ना तो इंडियन एक्सप्रेस से कम है और ना बेहतर है। दैनिक भास्कर थोड़ा अलग है। उसने राहुल गांधी की बातों को भी साथ-साथ छापा है और दोनों की रैलियों को लगभग समान महत्व दिया। प्रधानमंत्री का चुनावी भाषण सरकारी घोषणा नहीं हो सकती है इसलिए उसे वैसी प्रमुखता नहीं मिलनी चाहिए जैसी किसी खबर या हार्डन्यूज को मिलती है। आज यह खबर आम अखबारों में जैसे छपी है उससे ज्यादा महत्व अगर पार्टी के मुखपत्र को देना हो तो वह इंडियन एक्सप्रेस से बेहतर क्या कर सकता है? शायद इतना ही कि पूरी खबर पहले ही पन्ने पर रखता, टर्न अगले पन्ने पर नहीं ले जाता। आजकल की पत्रकारिता बदल गई है। हिन्दी अखबारों की चर्चा करूं तो दोहराव के अलावा कुछ खास नहीं होना है इसलिए बता रहा हूं कि हिन्दी के अखबारों ने कौन सी खबर पहले पन्ने पर नहीं ली है। यह खबर टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। शीर्षक है, “सूफी मिशन पर घाटी में बवाल”।

श्रीनगर डेटलाइन से मुजफ्फर रैना की इस खबर में बताया गया है कि स्पष्ट रूप से कश्मीरियों को शांत करने के मिशन पर आए सूफी मौलवियों के एक समूह के साथ यहां हजरतबल में शनिवार को धक्का-मुक्की हुई और भारत विरोधी नारे लगाए गए। प्रदर्शनकारियों को शक था कि सरकार कश्मीरियों को बांटने के लिए सूफी कार्ड खेल रही है। अखबार ने लिखा है कि मशहूर धार्मिक स्थल पर सूफी मौलियों के साथ यह व्यवहार कश्मीरियों के गुस्से का संकेत है। जमीनी हकीकत का आकलन करने के लिए ऑल इंडिया सूफी सजदानिशीन कौंसिल के मौलवी अजमेर शरीफ दरगाह के मुख्य मौलवी के उत्तराधिकारी सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती के नेतृत्व में तीन दिन के दौरे पर हैं। प्रतिनिधिमंडल के 17 सदस्य भिन्न मशहूर मसजिदों से आए हैं और इनमें निजामुद्दीन भी शामिल है।

पांच अगस्त के बाद किसी अन्य शहर से आया यह संभवतः पहला प्रतिनिधिमंडल है जिसकी मेजबानी राज्य सरकार कर रही है। इसे भारी सुरक्षा तो दी ही गई है आम लोगों से संपर्क करने की इजाजत भी है। आप जानते हैं कि पूर्व में सरकार ने कई प्रमुख नागरिकों और प्रतिनिधिमंडल को वापस भेज दिया है जबकि कुछ अन्य को घाटी में आने की इजाजत अदालत के हस्तक्षेप पर मिली है। चश्मदीदों के हवाले अखबार ने लिखा है कि सैकड़ों श्रद्धालुओं ने मौलवियों के हजरतबल दौरे का विरोध करने के लिए नारे लगाए। विरोधियों ने उनका घेराव किया पर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया। ये लोग वहां दोपहर की नमाज के समय पहुंचे थे और नमाज भी अदा की। एक बुजुर्ग नागरिक ने अखबार से कहा कि इसके बाद उनकी उपस्थिति से लोग नाराज हो गए क्योंकि उन्होंने भगवा परिधान पहन रखे थे। लोगों को लगा कि उन्हें भारत सरकार ने भेजा है। बड़े, बूढ़े, पुलिस और महिलाएं नारे लगाने में शामिल हो गए और थोड़ी देर के लिए तो मुझे लगा कि मेरा दिल बैठ जाएगा।

अखबार ने प्रतिनिधिमंडल के नेता का भी पक्ष लिया है और लिखा है कि उनके अनुसार वहां (हजरतबल में) रहते वहां कुछ नहीं हुआ, बाद में हुआ होगा। हालांकि उनके प्रवक्ता दीपक शर्मा ने कहा कि उनका प्रतिनिधिमंडल काफी बड़ा है और कुछ लोग बाकी के मुकाबले पहले निकल गए थे और उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ लोगों ने नारे सुने थे। …. चिश्ती ने कहा कि उनका मकसद कश्मीरयों का राष्ट्रीय मुख्यधारा में एकीकरण है और वे कश्मीर में सूफियत को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि मौलवियों ने भगवा परिधान पहन रखे थे क्योंकि इस रंग का संबंध सूफी इस्लाम से है। कश्मीर भारत का मस्तक है – यह तो सही है पर मस्तक की खबर नहीं छापने या छिपाने का क्या मतलब? क्या यह सामान्य खबर है?

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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Posted by Bhadas4media on Wednesday, October 2, 2019
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