विमर्श इस पर भी हो कि हम और आप, किस भारत से विमर्श करें?

मैं अपने पुराने कुलीग से मिला..जो इंडियन एक्सप्रेस में साथ थे..और फिर हिंदुस्तान टाइम्म में भी एडीटर्स रैंक में रहे। दसेक महीने पहले उन्होंने बेवसाइट पर अपनी कंपनी शुरू की थी. जो नए वेंचर्स के लिए एकमुश्त जानकारी देती है. साथ ही भारत के बारे में डेटा उपलब्ध कराती है।

वो अंग्रेजी के पत्रकार हैं..और मैं पांच साल ही रहा अंग्रेजी पत्रकारिता में। बता रहे थे कि रूपर्ट मर्डाक से बात हो रही है, जल्द ही डील हो सकती है। डील यानि सौ करोड़ से ऊपर का मामला है। डील बीच में है, इसी वजह से पत्रकार मित्र और उनकी बेवसाइट का नाम फिलहाल जाहिर नहीं कर रहा हूं। कुछ रोज पहले मैने फेसबुक पर बताया था कि मेरे एक पत्रकार दोस्त की कंटेंट जेनेरेशन की कंपनी को रूपर्ट मर्डार्क ने 150 करोड़ में खरीद लिया। और ये मित्र भी अंग्रेजी के ही पत्रकार हैं।

बताने का मकसद सिर्फ इतना था कि ये हैं अंग्रेजी जगत के पत्रकारों की कारोबारी बुदि्ध विलक्षण है। और आप फेसबुक पर देखिए हिंदी या भाषाई पत्रकारों के पोस्ट…कुछ यूं की गटर इनकी वॉल पर ही आकर खुलती दिखाई देती है, .और कोई वेस्ट मैनेजमेंट का कौशल भी नहीं। तुर्रा यह है कि कई बुढाते पत्रकार भी पैनल डिस्कशन में बैठने के लोभ में कुछेक एंकर टाइप पत्रकारों का यहां यशोगान ही करते रहते हैं। युवा भ्रमित ना हो तो फिर क्या हो भाई..?

मुझे महसूस हुआ कि इन पर ऊर्जा खर्च करना फिजूल है..क्योंकि इनके एजंडे तय हैं। इनके पास भारत के लिए सपना नहीं है..युवाओं की भावी जिंदगी को लेकर विमर्श करने का माद्दा ही नहीं है इनके पास। यह जड़ हैं,, सो मैं सिर्फ संवाद करूं जो चेतन हैं। इनसे विमर्श मेरे और आपके चिंतन को अवरुद्ध करता है। यह मेरे, आपके, समाज और देश के लिए ठीक नहीं है। 

सच यह भारत कई स्तरों पर अपने को तलाश रहा है..कोई आसमान छू भी रहा है..तो कई नाबदान में नहा रहा है। अब यह हम और आप पर हैं कि हम किस भारत के साथ खड़े होते हैं..? आसमान की तलाश में निकलते हैं या फिर नाबदान में गोते मारें..? 

सन 1987 में हाशिमपुरा केस पर जारी बहस में एक सच और भी है। पत्रकारिता का सच। जिस पर फैसला होना बाकी है। जिसको कभी उद्घाटित किया था विभूति नारायण राय ने। जो उस समय गाजियाबाद के एसएसपी थे। यूपी के सूबे में वीर बहादुर सिंह और दिल्ली में राजीव गांधी की काबिज थे। 

तब बुलंदशहर और नोएडा वैगरहा गाजियाबाद के ही हिस्से थे।, विभूति साहब ने मुझे बताया था, “जब मेरठ से आती नहर में लाशों का मिलना शुरु हुआ तो भी पत्रकारिता में सन्नाटा छाया रहा। मीडिया खामोश रहा।” 

विभूति ने नवभारत टाइम्स के पत्रकार अरुण वर्धन को यह सारी सूचनाएं दीं। तब राजेंद्र माथुर साहब नवभारत टाइम्स के संपादक हुआ करते थे। कई दिनों तक नवभारत टाइम्स चुपाई मारे बैठा रहा। 

दरयाफ्त की तो पता चला राजेंद्र माथुर साहब खबर को नहीं छापेंगे। ऐसा विभूति को अरुण वर्धन साहब ने बताया। आखिर इस खबर को चौथी दुनिया ने छापा। तब दुनिया को पता चला कि ना जाने कितनी ही जिंदगियों को यूपी की कुख्यात पीएसी और पुलिस ने मार कर नहर में फेंक दिया था। राजेंद्र माथुर साहब तो नहीं रहे। हां, विभूति और अरुण भाई से बतिया कर सच्चाई को टटोला जा सकता है। अरुण वर्धन मशहूर कथाकार अमरकांत जी के बेटे हैं और विभूति भाई महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं। 

तो पत्रकारिता के धतकरमों की दास्तान पर भी इस बहाने एक सुनवाई होनी चाहिए….। राजेंद्र माथुर साहब पत्रकारिता के बड़े नायक हैं..श्रद्धेय हस्ताक्षर हैं। ना जाने कितने ही अनुगामी इस पोस्ट आहत होंगे…पर मैं क्या करूं..? है कि नहीं..?

सुमंत भट्टाचार्य के फेसबुक वॉल से



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