आनंद पांडे को दैनिक भास्कर में कल्पेश याग्निक की जगह मिलेगी, हुआ ट्रांसफर

जानकारी मिली है कि दैनिक भास्कर, दिल्ली के संपादक आनंद पांडेय का तबादला भोपाल कर दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि कल्पेश याग्निक के निधन से खाली हुए पद पर आनंद पांडेय को बिठाया जाएगा. दैनिक भास्कर के भोपाल आफिस में नेशनल आइडिएशन न्यूज रूम की कमान आनंद पांडेय को दी जाएगी. Continue reading

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…तो ये है आनंद पांडे की नईदुनिया छोड़ने की वजह!

पत्रकारिता जगत में अभी आनंद पांडे का नईदुनिया से इस्तीफा गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। जिसने भी इस खबर को सुना, चौंक गया। आनंद पांडेय के फ़ोन घनघनने लगे। जो उन्हें सीधे कॉल नहीं कर सकते थे, वो करीबियों से पर्दे के पीछे की कहानी समझने की कोशिश करते रहे। अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। लेकिन हकीकत किसी को पता नहीं कि आखिर इस्तीफा हुआ क्यों? इसके लिए थोड़ा बैक ग्राउंड जानना जरूरी है। नवंबर 2014 में पांडे जी ने दैनिक भास्कर से इस्तीफा दिया था। उस वक़्त वो भास्कर ग्रुप में शिखर पर थे। उनकी तेज तर्रार कार्यशैली के भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल और डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल इतने प्रभावित हुए कि उनका प्रमोशन पर प्रमोशन होता गया। एडिटोरियल से लेकर ब्रांड और अवार्ड organising कमिटी के वो मेंबर बन गए। हर महत्वपूर्ण इवेंट के लिए उनकी राय ली जाने लगी। पांडेजी के बढ़ते कद से ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक तक को अपनी कुर्सी का खतरा महसूस होने लगा।

सुधीरजी ने पांडे जी के काम को देखते हुए उन्हें गुजरात की बड़ी जिम्मेदारी दी। भाषायी प्रॉब्लम के कारण आनंदजी जाना नहीं चाहते थे और खुलकर इस बात को सुधीरजी के समाने रख भी नहीं पा रहे थे। इसी दौरान उन्हें नईदुनिया से आफर आया। एडिटर इन चीफ संजय गुप्ता से 2-3मीटिंग के बाद उन्होंने नईदुनिया जॉइन कर लिया। पद-पैसा दोनों की तरक्की हुई। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि श्रवण गर्ग के कार्यकाल में पहले से ही कमजोर हो चुका नईदुनिया रसातल में जा चुका था। पांडे जी ने challenge स्वीकारा। उन्हें काम करने की पूरी आजादी दी गई। वो भास्कर संस्थान के ही महत्वपूर्ण व्यक्ति मनोज प्रियदर्शी को नईदुनिया लाने में कामयाब रहे।

सीनियर न्यूज़ एडिटर प्रियदर्शी को महत्वपूर्ण सेंट्रल डेस्क (एमपी-सीजी) की जिम्मेदारी उन्होंने दी। शुरुआती विरोध के बाद पांडे जी ने अपनी कार्य योजना को अंजाम देना शुरू किया। नए-नए आईडिया पर काम शुरू हुआ। अखबार चर्चा में आने लगा। चूंकि पांडे और प्रियदर्शी, दोनों भास्कर को बखूबी समझते थे, इसलिए अनेकों बार लोग फ्रंट पेज पढ़कर आश्चर्य में पड़ जाते थे कि भास्कर और नईदुनिया लगभग एक जैसा न्यूज़ कंटेंट और पैकेज कैसे दे रहे हैं? इसके बाद रुमनी घोष के काम से संतुष्ट नहीं होने के कारण सिटी की जिम्मेदारी प्रमोद त्रिवेदी को दी गई। उससे पहले भोपाल का संपादक भी बदल दिया गया और भास्कर के ही सुनील शुक्ला को वहां बैठाया गया। नईदुनिया ने अपने कामों से मुकाम हासिल करना शुरू किया। ‘निःशब्द ‘ वाली तस्वीर हो या रेत-शराब के ठेके जैसी खबरें… सरकार हिलने लगी। जागरण के मालिकों को ये सूट नहीं कर रहा था।

इस बीच संजय शुक्ला ने बतौर सीओओ जॉइन किया। उन्हें भी पांडेजी की तेज-तर्रार कार्यशैली से परेशानी होने लगी। वे खुद की मनमानी नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उन्होंने मालिकों के कान भरने शुरू किए। पांडेजी अखबार को आगे ले जाना चाहते थे। लेकिन संजय शुक्ला के हर बात में टांग अड़ाने से वो इसे अंजाम नहीं दे पा रहे थे। कई कोशिशों के बाद भी रायपुर संपादक का प्रिंट लाइन में नाम नहीं दिया गया। जागरण ग्रुप के संजय गुप्ता ने कई दफे संजय शुक्ला को फटकार लगाई, चेतावनी दी, लेकिन उसके बावजूद वो एडिटोरियल और उनके खिलाफ साजिश करता रहा। लोग कहते हैं कि स्थानीय संपादक आशीष व्यास भी इसमें पर्दे के पीछे शामिल हो गए।

इस बीच अचानक बिना जानकारी दिए जागरण मैनेजमेंट ने वाराणसी यूनिट प्रभारी आलोक मिश्र को रायपुर में राज्य संपादक बनाकर बैठा दिया। तीन ब्यूरो बंद कर दिए गए। पांडेजी जो सोचकर आए थे, उसमें उन्हें निराशा हाथ लगी। काम से ज्यादा सियासत होने लगी। इस बात को संजय गुप्ता भी नहीं समझ सके। इस बीच भास्कर ग्रुप से हर दो-तीन महीने में पांडेजी का बुलावा आने लगा। एमडी हर हाल में चाहते थे कि आनंद पांडे जल्द से जल्द जॉइन करें। चूंकि नईदुनिया और जागरण ग्रुप से उनका नेचर जेल नहीं कर रहा था और सियासत भी तेज हो गई थी, लिहाजा उन्होंने नईदुनिया को छोड़ना ही बेहतर समझा। भास्कर की भी कोशिश है कि नईदुनिया के सिर्फ 4-5 प्रमुख लोगों को वो तोड़े, जिससे इस अखबार का बचा-खुचा अस्त्तित्व भी खत्म हो जाए। इसके लिए वह इन्हें मुँह मांगी कीमत भी देने को तैयार है।

वैसे ये चर्चा आम हो चली है कि पांडे जी के जाने के बाद नईदुनिया सामान्य अखबार बन जायेगा। उनके साथ जुड़े लोगों के साथ ही 2-3 और लोगों के भी नईदुनिया छोड़ने की अफवाह है। इसमें सबसे फायदे में आशीष व्यास हैं, जो लंबे वक्त से बड़ी कुर्सी पर नजर गड़ाए हैं। लोगों का कहना है कि श्रवण गर्ग को हटाने और आनंन्द पांडे का संबंध मैनेजमेंट से बिगाड़ने में उनकी बड़ी भूमिका हैं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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नईदुनिया के समूह संपादक आनंद पाण्डे को माधव राव सप्रे राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार के लिए चुना गया

शख्सियत ऐसी कि पुरस्कार नगण्य हो गए…. नईदुनिया के समूह संपादक आनंद पाण्डे को माधव राव सप्रे राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार के लिए चुना गया। पहले मन हुआ कि मोबाइल लगाऊं और बधाई दूं। फिर थोड़ा रुका और सोचा कि क्या यह पुरस्कार उनके पत्रकारिता के जुनून, ईमानदारी, समर्पण से ज्यादा है? क्या कोई भी पुरस्कार ऐसा है जो उनके समर्पण के बदले दिया जा सके? हाथ नंबर डायल करते-करते रुक गए। मैं राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार के कद की बात नहीं कर रहा हूं। बेशक ऐसा पुरस्कार पाना किसी भी पत्रकार के लिए गर्व की बात है। मैं तो बात कर रहा हूं कि आधुनिक दौर में पत्रकारिता की साख को जिंदा रखने वाले शख्स की, जिससे पुरस्कार खुद गौरान्वित हो जाता है।

जिस शख्स के लिए कैरियर प्रायरिटी पर होता हो लेकिन पत्रकारिता टॉप प्रायरिटी पर। जो समूह संपादक के चैम्बर को गौरान्वित करते हों, लेकिन चैम्बर में घुसने से पहले किसी के मन में भय न होता हो…अपनी बात खुलकर कहने में संकोच न होता हो…खबर की बात पर पुरजोर तरीके से जहां बहस की जा सके…जिनके साथी या तो सकारात्मक हो जाते हों या अपने रास्ते बदल लेते हों…। जिनने आनंद जी को न देखा हो, न जाना हो, शायद उन्हें ये पढ़कर अजीब लगेगा। लेकिन सच्चाई यही है। करियर का 7 साल पुराना किस्सा बताता हूं।

जबलपुर नईदुनिया में कांग्रेस के एक कद्दावर नेता के खिलाफ मेरे पास खबर थी। संपादक आनंद पाण्डे जी थे तो उनसे खबर के बारे में विस्तृत चर्चा हुई। खबर बनाने के बाद मैंने रुटीन कथन के लिए नेताजी को फोन लगाया। नेताजी ने फोन पर कोई जवाब नहीं दिया लेकिन ठीक 15 मिनिट बाद ऑफिस आए और आनंद जी के साथ एक-एक कप चाय पी और चले गए। नेताजी को उम्मीद थी कि आनंद जी से संबंध हैं और विशेष संवाददाता तो उनका जलवा देखकर सहम जाएगा। चूंकि मुझे खबर फाइल करनी थी तो मैंने कथन के लिए फिर एसएमएस किया। नेताजी फिर 5 मिनिट बाद ऑफिस में। कहने लगे कि दो दिन से मैं परेशान हूं। आपका रिपोर्टर टीएण्डसीपी में भी गया और अब भी खबर लगाना चाह रहा है। आनंद जी ने मुझे तत्काल बुलाया और पूछा कि इनकी क्या खबर है?

मैंने बताया कि इनने कालोनी बनाने में जिस जमीन का उपयोग किया है उसमें एक शपथ पत्र मृत बेटे का लगा दिया। कालोनी पूरी अवैध हो गई, इसके बाद भी डुप्लेक्स बेच रहे हैं। नेताजी ने कहा कि साहब मेरी जमीन, मैं कुछ भी करूं, इससे रिपोर्टर या पेपर को क्या मतलब। मैंने बताया कि जो लोग जमीन खरीदेंगे, वो रजिस्ट्री बाद में अवैध हो जाएगी। इसलिए खबर जानी चाहिए। तत्काल आनंद जी ने हाथ उठाकर नेताजी से कहा- देखिए, आप मेरे मित्र हैं, लेकिन अगर खबर है तो जाएगी। और प्रमोद के तर्क और कागज बताते हैं कि खबर जरूर जाना चाहिए। अगर आपका कोई पक्ष है तो आप बताईये।

नेताजी की मुंह देखने लायक था। खबर प्रमुखता से लगी और फॉलोअप भी गया। ऐसे ही जबलपुर के एक लीडिंग अखबार के लिए श्री विवेक तन्खा पिता तुल्य हैं। लेकिन आनंद जी जबलपुर रहने के दौरान विवेक तन्खा जी को सम्मान तो दिया लेकिन शरणागत कभी नहीं हुए। बस यही कार्यशैली पत्रकारिता और पत्रकार के सम्मान की रक्षा कर रही है। आनंद जी के साथ दूसरी पारी में काम करने का मौका मिला। संस्थान भी वही पुराना, नईदुनिया। लेकिन इस बार आनंद जी के तेवर और मिजाज में और भी पैनापन आ चुका है। सकारात्मकता का ग्राफ बढ़ गया है। खैर, एक बार आप भी मिलिए उनसे। पक्का वादा, कुछ तो जरूर सीखेंगे।

प्रमोद त्रिवेदी
सीनियर न्यूज एडीटर
9644391777
9425442579

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नईदुनिया में इन दिनों पौरस के हाथी की भूमिका कौन निभा रहा है?

नईदुनिया, इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद तिवारी ने नईदुनिया को अलविदा कहने के बाद अपने त्यागपत्र के साथ उन्होंने जो पत्र अपने साथियों को वाट्सएप के माध्यम से भेजा है, वह नीचे दिया जा रहा है. अरविंद दो साल से वरिष्ठ विशेष संवाददाता थे. एक साल से सिटी हेड की भूमिका निभा रहे थे.

मित्रों

दिनांक 12 जनवरी से मेरा साथ आपसे छुट जाएगा। मैने आज नईदुनिया को अलविदा कहने का निर्णय ले लिया है। नईदुनिया प्रबंधन को अब शायद मेरी सेवाओं की जरूरत नहीं है। अनुबंध की शर्त के मुताबिक एक माह के नोटिस की सूचना के साथ मैं अपना त्यागपत्र नईदुनिया प्रबंधन को भेज रहा हूं।  मैं आप सब का आभारी हूं की अपने मुझे मेरे करीब 2 साल के कार्यकाल में हर कदम पर पुरा सहयोग व सम्मान दिया। मुझे इस बात का गर्व है कि रिपोर्टर्स व डेस्क की एक बेहतरीन टीम के साथ मैने काम किया और शहर ही नहीं मालवा निमाड अंचल में अखबार को नई उंचाईयां दिलवायी। यह सब आपकी ही बदौलत संभव हो पाया।

नईदुनिया का मेरा यह कार्यकाल मेरे रिपोर्टिंग करियर का भी श्रेष्ठ कार्यकाल रहा है। मैं संस्थान को अलविदा कह रहा हूं पर आपको नहीं। जहां भी मेरी जरूरत हो पुकारे में हाजिर रहुंगा। आपका सुख दुख मेरा होगा। आप सब मजे से काम करो और खुब तरक्की करो पर उन लोगों से सावधान रहो जो अपनी लाईन आगे बढाने और खुद की कमजोरी दबाने के लिए अब पौरस के हाथी की भूमिका निभा रहे।

पुन: आप सभी का आभार ..यदि संभव हुआ तो आपके प्रति कृतज्ञता जताने सोमवार शाम दफ्तर में हाजिर होता हूं। उम्मीद है कि आपका स्नेहभाव बना रहेगा।

आपका अपना ही

अरविंद तिवारी

अरविंद तिवारी के इस पत्र के बाद इंदौर का मीडिया जगत यह मालूम करने में लगा है कि आखिर नईदुनिया में इन दिनों पौरस के हाथी की भूमिका कौन निभा रहा है।

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आनंद पांडे ने कहा सेल्फी मेरी जिद तो रिपोर्टर ने कहा- यह पकड़ो मेरा इस्तीफा

नईदुनिया के एमपी स्टेट हेट आनंद पांडे को एक रिपोर्टर ने आईना दिखा दिया। पांडे ने कुछ दिन पहले रिपोर्टरो को फरमान सुनाया कि वे जहां भी रिपोर्टिंग के लिए जाएं वहां से अपना सेल्फी नईदुनिया के संपादकीय टीम के आफिशियल वाट्सएप ग्रुप पर डालें। उनका यह फरमान सुनकर रिपोर्टर भौचक रह गए थे। पहले दो तीन दिन को कुछ रिपोर्टरों ने इसका पालन किया पर जब मीडिया जगत में इसकी खबर फैलने के बाद उनकी हंसी उड़ने लगी और यह कहा जाने लगा कि क्या आप लोगों पर संपादक को भरोसा नहीं है तो रिपोर्टरों ने सामूहिक रूप से फैसला लेकर सेल्फी डालना बंद कर दिया।

जनवरी के पहले सप्ताह में रिपोर्टरों की फुलकोरम मीटिंग में फिर यह मुद्दा उठा और पांडे ने पूछताछ शुरू की तो रिपोर्टरों ने अपना दर्द बताना शुरू किया। कुछ ने अपनी आपबीती सुनाते हुए जब सरेआम अखबार की हंसी उड़ने की बात कही तो पांडे भड़क गए। रिपोर्टरों ने कहा सर हमारा भी कुछ स्वाभिमान है और हम ऐसा नहीं कर पायेंगे। शहर के पत्रकार और अफसर हमसे चटकारे लेकर कहते हैं कि भैया पहले सेल्फी तो डाल लो ताकि आपके संपादक को भरोसा हो जाए कि आप काम तो कर रहे हो।  इस पर पांडे ने कहा सेल्फी मेरी जिद है और मैं इस मामले में कोई समझौता नहीं करूंगा। आपको हर हालत में सेल्फी डालना ही होगा और जो ऐसा नहीं कर सकता है वह नौकरी छोडक़र चला जाए। पांडे के इस रुख ने रिपोर्टरों को निराश कर दिया।

नईदुनिया के सीनियर रिपोर्टर नवीन यादव ने फुलकोरम में ही फिर से इसका विरोध किया और कहा- सर, यह हमारे आत्मसम्मान के खिलाफ है। शहर में हमारी हंसी उड़ रही है और लोग अखबार को लेकर भी तरह तरह की बातें कर रहे है।  पांडे जब अपने निर्णय पर अडिग रहे और नवीन से कहा कि आप यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो नौकरी छोडक़र चले जाएं क्योंकि मुझे तो वैसे भी 4-5 विकेट गिराना ही है तो यादव ने कहा- ऐसे हालत में मेरे लिए यहां नौकरी करना संभव नहीं है। उन्होंने पांडे से कहा आप अब तो मेरा इस्तीफा ही ले लो। आप जैसे संपादक के साथ काम करना मैरे लिए वैसे भी मुमकिन नहीं है। यादव के इस रुख से पांडे भौचक रह गए।

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पंकज मजपुरिया ‘पीपुल्स समाचार’ से ‘दबंग दुनिया’ सीईओ बनकर आए

‘पीपुल्स समाचार’ के इंदौर संस्करण को लेकर अभी तक कई प्रयोग हो चुके हैं. पिछले दिनों ‘पीपुल्स समाचार’ ने मार्केटिंग के एक प्रयोगधर्मी पंकज मजपुरिया को कमान सौंपी थी. पंकज ने करीब तीन-चार महीने तक उठापटक भी की. ताजा खबर है कि पंकज मजपुरिया ‘पीपुल्स समाचार’ छोड़कर ‘दबंग दुनिया’ में पहुँच गए. उन्हें सीईओ बनाया गया है, जो पहले प्रवीण खारीवाल थे. पंकज मजपुरिया दैनिक भास्कर, नईदुनिया, फ्री प्रेस समेत इंदौर के करीब सभी अख़बारों में अपने प्रयोग कर चुके हैं. देखना है कि ‘दबंग दुनिया’ में वे क्या कमाल कर पाते हैं.

उधर, ‘नईदुनिया’ इंदौर से खबर है कि श्रवण गर्ग की विदाई के बाद वहाँ काम कर रहे लोगों को लगा था कि अब अपमान, तिरस्कार और कथित बौद्धिक दादागिरी का वो दौर ख़त्म हो गया, जो करीब ढाई साल तक चला. पर, ये उनकी ग़लतफ़हमी थी. आनंद पांडे के आने के बाद भी ‘नईदुनिया’ की हालत में कोई ख़ास अंतर नहीं आया. पिछले दिनों हुई एक सिटी मीटिंग में जिस तरह की अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया, उसकी चर्चा प्रेस जगत में हर तरफ है. रिपोटर्स को जाने क्या क्या कहकर संबोधित किया गया और धमकाया गया. उधर, रिपोर्टर्स को फरमान जारी किया गया है कि जो जहां पर रिपोर्टिंग करने जाए, वहाँ से वॉट्सएप्प पर अपनी सेल्फ़ी भेजे ताकि ये पता चले कि जहाँ रिपोर्टर को जाना है, वहां वो गया भी है या नहीं. ज्ञात हो कि श्रवण गर्ग के समय सिटी चीफ रहे अरविंद तिवारी को आनंद पांडे ने साइड-लाइन करके रुमनी घोष को सिटी की कमान सौंपी है. रुमनी के निशाने पर अरविंद तिवारी के करीबी लोग हैं.

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भास्कर ने तीन संपादकों आनंद पांडेय, सुनील शुक्ला और मनोज प्रियदर्शी को ब्लैक लिस्ट किया

दैनिक भास्कर नित नए खेल करने में माहिर है। वरिष्ठ पदों पर कार्यरत तीन पत्रकारों – आनंद पांडे, सुनील शुक्ला, मनोज प्रियदर्शी के इस्तीफों से जबर्दस्त खफा भास्कर प्रबंधन ने एक इनहाउस मेल भेजकर तीनों को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया है। शायद ऐसा, कम से कम हाल के दिनों में तो पहली बार हुआ है कि किसी कर्मचारी के नौकरी छोड़ने से खफा प्रबंधन ने उन्हें ब्लैकलिस्ट किया हो।

आनंद पांडे, रायपुर में पदस्थ थे, और उन्होंने इस्तीफा देकर नई दुनिया का दामन थाम लिया था। शुक्ला ग्वालियर एडिशन के संपादक थे, जबकि मनोज की भी रायपुर में पदस्थापना थी। भास्कर प्रबंधन ने एक मेल, जो कि रायपुर में भी सभी कर्मचारियों को प्राप्त हुआ है, लिखा है कि इन तीनों को तीन-तीन साल के लिए ब्लैक लिस्ट किया जा रहा है। हालांकि ब्लैक लिस्ट किए जाने पर क्या सलूक होगा, इसका खुलासा नहीं है। 

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आनंद पांडे का ओहदा इसलिए सिकुड़ गया!

जब ‘नईदुनिया’ में आनंद पांडे की आमद हुई, तो समझा गया था (और यही सच भी था) कि वे श्रवण गर्ग की जगह लेंगे, यानी चीफ एडीटर होंगे और मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के सभी 6 एडीशन संभालेंगे. लेकिन, बाद में आनंद पांडे को सिर्फ मध्यप्रदेश का ग्रुप एडीटर (वास्तव में स्टेट हेड) बनाया गया. अंदर की ख़बरों के मुताबिक ये फैसला ‘नईदुनिया’ रायपुर के एडीटर रुचिर गर्ग की आपत्ति के कारण किया गया.

जब आनंद पांडे के दोनों स्टेट का हेड बनाए जाने की जानकारी रुचिर गर्ग को मिली तो उन्होंने प्रबंधन के सामने आपत्ति उठाई कि मैं दो साल से जिस आनंद पांडे से ख़बरों को लेकर जंग कर रहा था, उन्हें मैं अपने ऊपर कैसे सहन कर सकता हूँ. ये आपत्ति इसलिए भी जायज थी कि जब आनंद पांडे रायपुर में दैनिक भास्कर के संपादक थे, तब उनका सीधा मुकाबला ‘नईदुनिया’ से ही होता रहा. प्रबंधन को भी बात सही लगी. उन्होंने आनंद पांडे को मध्यप्रदेश के 4 संस्करणों तक सीमित कर दिया और रुचिर गर्ग को छत्तीसगढ़ का स्टेट हेड बना दिया. पांडे की समस्याएं अभी खत्म नहीं हुई है. उनके आने के बाद ‘नईदुनिया’ इंदौर में खेमेबंदी होने लगी है.

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आनंद पांडे ने ‘नईदुनिया’ ज्वाइन किया

‘भड़ास’ ने 17 नवंबर को खबर दी थी कि ‘आनंद पांडे संभालेंगे नईदुनिया को’. ये बात सही निकली. 24 नवंबर को आनंद पांडे ने बतौर चीफ एडीटर ‘नईदुनिया’ ज्वाइन कर लिया. आनंद पांडे के फिर ‘नईदुनिया’ में प्रवेश के पीछे विनय छजलानी का हाथ माना जाता है. ये संभावना इसलिए जाहिर की जा रही है क्योंकि ‘नईदुनिया’ में भले ही जागरण ग्रुप की मिल्कियत है, पर अभी भी विनय छजलानी के पास कुछ हिस्सेदारी है.

श्रवण गर्ग को लाने में भी विनय छजलानी का हाथ था. अब आनंद पांडे को भी किसी खास रणनीति के तहत लाया गया है. आनंद पांडे के आने के बाद उन लोगों पर संकट के बादल छा सकते हैं, जो श्रवण गर्ग की गुड-लिस्ट में थे. पर अभी ऐसी किसी खबर के लिए कुछ दिन इंतजार करना पड़ सकता है.

इंदौर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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