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टेलीग्राफ पर छापा डालने की हिम्मत क्यों नहीं पड़ती!

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यूसुफ़ किरमानी-

फ़र्क़ देखिए… दैनिक भास्कर है, तो टेलीग्राफ भी है… अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ (कलकत्ता) रोज़ाना मोदी सरकार के ख़िलाफ़ खबर छापता है। इंडियन एक्सप्रेस भी कभी-कभी सरकार विरोधी खबरें छापता है लेकिन सरकार की कभी हिम्मत नहीं हुई कि वो इन पर छापा डलवा सके।
अंग्रेज़ी के बाक़ी अख़बार सरकार के आगे घुटने टेक चुके हैं।

हिन्दी में छपने वाला अख़बार दैनिक भास्कर पिछले एक महीने से मोदी सरकार के ख़िलाफ़ खुलकर खबरें छाप रहा है। उसका नतीजा यह निकला कि देशभर में आज दैनिक भास्कर के मालिकों के घरों और दफ़्तरों पर इनकम टैक्स के छापे पड़ रहे हैं। देखना है कि यह अख़बार कब तक सरकार के सामने तना रहता है।

हालाँकि अतीत में दैनिक भास्कर भी सरकार की चाटुकारिता में रातदिन जुटा रहने लगा तो लोगों ने इस अख़बार को पढ़ना छोड़ दिया। मालिकों ने सर्वे कराया तो तमाम पाठकों ने कहा कि वे सरकारी खबर पढ़ने के लिए पैसा नहीं खर्च कर सकते।
यही हाल बाक़ी अखबारों का भी है। उनकी पाठक संख्या सरकारी खबरों की वजह से गिरी है। हालाँकि तकनीक की वजह से भी अख़बार प्रभावित हुए हैं लेकिन जनता अभी भी सही और तथ्यात्मक खबरें, रिपोर्ट पढ़ना चाहती है। …

…तो अख़बार ज़िन्दा रहेंगे। बचेगी वही शाख जो तूफ़ानों में भी लचकदार होगी। भास्कर पर मोदी सरकार के छापे से बाक़ी पत्रकार और निर्भीक अख़बार नहीं डरने वाले हैं। छोटे शहरों में छोटे अख़बार इन तथाकथित राष्ट्रीय अख़बारों से ज़्यादा बेहतर काम कर रहे हैं।
आप सभी उनकी मदद करें। उन्हें ख़रीदें, चंदा दें। निर्भीक अख़बारों का ज़िन्दा रहना जनता के लिए ज़रूरी है।

टीवी से बेहतर पत्रकारिता अख़बारों में होती रहेगी।

हम लोग अघोषित आपातकाल का मुक़ाबला करते रहेंगे।

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  • ओ भोंसड़ी के, ABP वाले रोज जो गाड़ चाटते है उसके कारण छापा नहीं पड़ता है।

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