9 /11 अमरीका की दुखती रग है, तालिबान ने बड़ी ग़लती कर दी है यह तारीख़ चुन कर!

शम्भूनाथ शुक्ला-

सुबह से टीवी पर न्यूज़ चैनल देख रहा हूँ। Tata Sky पर DD के बाद ABP फिर NDTV, आज तक, Zee, India TV, न्यूज़-24, रिपब्लिक भारत, इंडिया न्यूज़, न्यूज़ नेशन, TV9 भारतवर्ष, टाइम्स नाऊ नवभारत है। आमतौर पर मैं NDTV, आज तक, Zee, TV9 व टाइम्स नाऊ नवभारत ही देखता हूँ।

पर आज सब देखे।

तब पता चला कि सुदर्शन टीवी, टोटल न्यूज़, APN, इंडिया Voice, NEWS 11, News 1 India, हिंदी ख़बर, भारत समाचार, न्यूज़ इंडिया 24/7, खबरें अभी तक, सहारा समय, नेटवर्क10 , जनतंत्र TV, PRIME न्यूज़ीलैंड, Lok Sabha TV व RSTV तथा news X, India Ahead, SD India, Al Jazeera, Channel News Asia, France 24, TV 5 Monde Asia, DW, Australia Tv, Russia TV आदि भी लगे हुए हैं। पर मैंने कभी देखे ही नहीं।

आज सारे चैनल देखने के बाद मुझे लगा कि आज तक कटवा देना चाहिए। क्योंकि यह चैनल गोदी ही नहीं भयानक रूप से अमेरिका परस्त है। इसे अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार से इस बात पर आपत्ति है कि वहाँ का मंत्रिमंडल 9/11 को शपथ क्यों ले? और अब देखो अमेरिका से डर गए तालिबानी और शपथ टाल दी। अब क्या आज तक से मुहूर्त निकलवा कर वह अपनी सरकार का गठन करे। यहाँ तक कि वह छींके और पादे तो भी आज तक से पूछे।


दयानंद पांडेय-

घबराइए नहीं , अभी यही अमरीका थूकेगा और यही तालिबान चाटेगा। तालिबान को बचाने का कोई चारा चीन के पास भी नहीं होगा। पाकिस्तान तो वैसे ही टुकड़खोर है। जिधर हड्डी देखेगा , कुत्तों की तरह दौड़ेगा। अमरीका के पास सामरिक खजाना ही नहीं , आर्थिक खजाना भी है। अमरीका जैसे काबुल हवाई अड्डे पर खड़े फाइटर प्लेन इस कदर कबाड़ बना गया है कि उस के पंखों पर तालिबान झूला झूल रहे हैं। ठीक वैसे ही अमरीका अफगानिस्तान की आर्थिक नाकेबंदी भी कर गया है।

महीना , पंद्रह दिन में इस का भयानक असर दिखने लगेगा। दस , पांच दिन पाकिस्तान खिला-पिला देगा , अपने रुपए भी दिखा देगा। फिर उस के बाद ? अफगानिस्तान ही नहीं , पाकिस्तान खुद कंगाल देश है। चीन फोकट में कुछ करता नहीं। कोई नहीं करता। अफगानिस्तान के लोग भूखे मरेंगे और तालिबान को मारेंगे। गली-गली , सड़क-सड़क यही होगा। अफगानिस्तान में ऐसा गृह युद्ध होगा कि लोग सीरिया की बर्बादी भूल जाएंगे। बहुत मुमकिन है पाकिस्तान में भी गृह युद्ध हो जाए।

बस जब तक एक भी अमरीकी नागरिक है , अफगानिस्तान में तब तक ही तालिबान की खैर है। फिर अमरीका इन को वाशिंगटन से बैठे-बैठे ही छलनी-छलनी कर देगा। और वो कहते हैं न कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता है। तो पाकिस्तान भी अमरीका का थूका हुआ चाटेगा। अभी कल 9 / 11 को तालिबान की सरकार को शपथ तो ले लेने दीजिए। आटे-दाल का भाव मालूम पड़ जाएगा।

9 / 11 अमरीका की दुखती रग है। तालिबान ने बड़ी ग़लती कर दी है , यह तारीख़ चुन कर। आप पूछेंगे , फिर भारत ? तो जानिए कि अब की बंदूक़ भारत की है और कंधा अमरीका का। नरेंद्र मोदी को आप क्या समझते हैं ? नहीं समझते तो अब से समझ लीजिए। नरेंद्र मोदी को कांग्रेसियों , कम्युनिस्टों के चश्मे से देखना बंद कर दीजिए। सब कुछ फैंटास्टिक लगेगा और दिखेगा भी।


अच्छा है कि अफगानिस्तान में तालिबान के लोग हिप्पोक्रेट नहीं हैं। पाखंड भरी बात नहीं कर रहे। मुंह में राम , बग़ल में छुरी वाली बात नहीं कर रहे। सीधे-सीध शरिया की बात कर रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई की जगह सीधे गोली बंदूक़ की बात कर रहे हैं। जब कि भारत में लोग कहना चाहते हैं शरिया बचाओ पर बोलते हैं , संविधान बचाओ। चलाते गोली , बंदूक़ और बम ही हैं पर संघ की आड़ ले कर। जैसे संविधान की आड़ ले कर शरिया की बात। इसी लिए कुछ लोग इन्हें बहुत आदर और प्यार से शांति दूत कहते हैं।

भारत में शांति दूत लोग पढ़-लिख कर भी वही हिंसा , वही बम , बंदूक़ और आगजनी का कारोबार करते हैं जो व्यापार तालिबान लोग बिना पढ़े-लिखे करते हैं। स्त्रियों के साथ सुलूक़ भी दोनों का एक है। बकौल कुरआन स्त्रियों को पुरुषों की खेती मानते हैं। बिना हिजाब के कटा हुआ तरबूज हैं औरतें इन की निग़ाह में। सो आदतें , लत और मक़सद दोनों ही के एक हैं। शांति दूत हों या तालिबान। मंज़िल भी एक ही है – ज़न्नत। ज़न्नत में बहत्तर हूरों की तमन्ना।


अफगानिस्तान की यह परदेदारी वाली तस्वीर फ़ेसबुक पर घूम रही है। सोचा कि मैं भी घुमा दूं। पर यह बताते हुए कि यह स्थिति अफगानिस्तान में तालिबान की है ज़रुर पर भारत में भी ऐसी तस्वीरें और मंज़र आम रहे हैं। अली सरदार ज़ाफ़री ने कुछ शायरों के जीवन पर लघु फ़िल्में बनाई हैं। फ़िराक़ , जिगर , मजाज़ , जोश आदि पर। मजाज़ लखनवी की फ़िल्म में एक दृश्य है कि वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कुछ छात्राओं को अपना कलाम सुना रहे हैं। और सामने उन के छात्राएं नहीं , बल्कि ब्लैक बोर्ड है। ब्लैक बोर्ड के पीछे दूसरी क्लास है जिस में छात्राएं बैठी हैं और मजाज़ का कलाम बड़ी तल्लीनता से सुन रही हैं। ग़ौरतलब है कि मजाज़ लखनवी भी तब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिर्सिटी के छात्र हैं और छात्राओं की बहुत फरमाइश पर उन्हें अपना कलाम सुना रहे हैं। तब यह सब है।

अलग बात है कि मजाज़ भले ब्लैक बोर्ड को अपना कलाम सुना रहे हैं पर लाख परदेदारी के उन का कलाम सुन रही एक छात्रा न सिर्फ़ उन की फैन बन जाती है बल्कि बाद में दिल्ली में एक डाक्टर से विवाहित होने के बावजूद उन की असल ज़िंदगी में आहिस्ता से दाख़िल हो जाती है। न सिर्फ़ दाख़िल हो जाती है , मजाज़ को दीवाना बना देती है। मजाज़ की ज़िंदगी बन जाती है। पैसे वाली औरत है। रईसाना ठाट-बाट से रहती है। दिल्ली के अपने घर बुलाने लगती है। उन के साथ मुंबई के होटल में भी रह जाती है। बाद में मजाज़ की बर्बादी का सबब भी बन जाती है। मजाज़ घनघोर शराबी बन जाते हैं। कुछ शराब , कुछ उस औरत का ग़म मजाज़ को मौत की राह पार खड़ा कर देती है। और लखनऊ में सर्दियों की एक रात खुली छत पर मयकशी के बाद सो जाते हैं। फिर अगली सुबह उन की मृत देह मिलती है।

कहने का सबब यह कि औरतों के शबाब के जिस क़यामत से बचने के लिए यह परदेदारी का पहरा लगाया जाता है , बिना हिजाब के औरत को कटा हुआ तरबूज बताया जाता है , शरिया की तलवार के दम पर , उस का आख़िर हासिल क्या है ? मजाज़ की दर्दनाक मौत ? एक मजाज़ लखनवी ही क्यों , जाने कितने मजाज़ ऐसी दर्दनाक मौत बसर कर चुके हैं। बताता चलूं कि मजाज़ लखनवी न सिर्फ आला दर्जे के शायर हैं बल्कि उन के पिता तब के समय तहसीलदार रहे थे सो बड़े नाज़ से पालन-पोषण हुआ था। शानो-शौकत से रहते थे। आकाशवाणी में शानदार नौकरी भी मिली थी मजाज़ को। इतना ही नहीं , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ लखनवी का ही लिखा है। इन दिनों तालिबान और संघ की तुलना पर विवाद में घिरे जावेद अख़्तर इन्हीं मजाज़ लखनवी के भांजे हैं। लेकिन जावेद अख़्तर जिस गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं , मजाज़ लखनवी ऐसे न थे। मजाज़ लखनवी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ने के बावजूद लीगी नहीं थे। मर्द आदमी थे। हिजाब , वुजाब की ऐसी तैसी करते हुए लिखते भी थे :

तिरे माथे पे ये आंचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था।

मजाज़ का पूरा नाम था – असरार-उल-हक़ मजाज़।

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