पत्रकारों की नौकरी का हो बीमा

किसानों की फसल और पत्रकारों की नौकरी का बीमा किया जाना बहुत जरूरी है। किसान अन्‍न पैदा कर पूरे देश का पेट भरता है तो पत्रकार अपने विचारों से लोगों की जिज्ञासा की भूख शांत करता है। लोग भोजन से पहले अखबार पढ़ते हैं, लेकिन अखबारों से पत्रकार लुप्‍त होते जा रहे हैं। यह लालाओं की साजिश है। ताकि वे किसानों की संपदा हड़प सकें और किसी को पता भी न चले।

आज हालत यह है कि किसानों की फसल बर्बाद हो गई है और पत्रकारों के साथ तरह तरह के अत्‍याचार किए जा रहे हैं। वह पत्रकार भी उसी किसान के घर से आता है। यह तबका साजिश का शिकार है और संपूर्ण व्‍यवस्‍था में मरघट की शांति है। सब ससुरे चुप हैं-क्‍या नेता, क्‍या अधिकारी, क्‍या पुलिस, क्‍या प्रशासन। यहां तक कि रेल को रंगीन बनाने का ख्‍वाब देखने वाले अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी।

अरे भइया यह तबका बर्बाद हो जाएगा तो आपकी बुलेट रेल की सवारी कौन करेगा। खुद ही चलाओ रेल और खुद ही सवारी करो। किसान के बेटे की हालत तो वही है-रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे—–अगिया लागै साहेब जरि जाय रे——मजाक नहीं——गुड़गांव में मारुति कंपनी का साहेब जल चुका है——अब अखबारों के दफ्तर में कौन साहेब जलेगा—-अंदाजा लगाते रहें। अत्‍याचारों की इंतहा हो गई है—कुछ भी हो सकता है।

श्रीकांत सिंह के एफबी वॉल से

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