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यूएनआई एजीएम से रवीन्द्र कुमार को लौटना पड़ा उल्टे पांव

देश में स्वस्थ और निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने तथा समाचार सम्प्रेषण के क्षेत्र में किसी एक एजेंसी के एकाधिकार समाप्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) पिछले कुछ वर्षों से अपने ही कुछ शेयरधारकों की ‘गिद्धदृष्टि’ का शिकार बनी हुई है। 30 दिसम्बर को कंपनी की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) में एक बार फिर स्टेट्समैन के रवीन्द्रकुमार के नेतृत्व में इन शेयरधारकों ने येन-केन-प्रकारेण इस संवाद समिति पर नियंत्रण हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन उनके कुत्सित इरादे धराशायी हो गये।

देश में स्वस्थ और निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने तथा समाचार सम्प्रेषण के क्षेत्र में किसी एक एजेंसी के एकाधिकार समाप्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) पिछले कुछ वर्षों से अपने ही कुछ शेयरधारकों की ‘गिद्धदृष्टि’ का शिकार बनी हुई है। 30 दिसम्बर को कंपनी की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) में एक बार फिर स्टेट्समैन के रवीन्द्रकुमार के नेतृत्व में इन शेयरधारकों ने येन-केन-प्रकारेण इस संवाद समिति पर नियंत्रण हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन उनके कुत्सित इरादे धराशायी हो गये।

दरअसल 30 दिसम्बर को हुई एजीएम में रवीन्द्र कुमार के प्रयास से शेयरधारक अपने ‘कुत्सित एजेंडे’ के साथ पहुंच तो गये, लेकिन ऐसा समझा जाता है कि दो शेयरधारकों के प्रतिनिधियों के पास कंपनी कानून के प्रावधानों के अनुरूप वैध दस्तावेज नहीं होने के कारण इनकी योजनाओं पर पानी फिर गया। एक कंपनी के प्रतिनिधि के पास जहां कई साल पुराना ऑथरिटी लेटर था, वहीं एक दूसरी कंपनी के प्रतिनिधि के पास उचित प्राधिकार पत्र नहीं था। एजीएममें किसी प्रतिनिधि को हिस्सा लेने के लिए नवीनतम प्राधिकार पत्र जरूरी होता है। प्राधिकार दस्तावेज उचित प्रारूप के तहत नहीं होने के कारण कंपनी सेक्रेट्री ने इन दो कंपनियों के प्रतिनिधियों को बैठक में हिस्सा लेने से मना कर दिया। जोड़-तोड़ का प्रयास नाकाम होता देख रवीन्द्र कुमार बैठक से लौट गये। उन्होंने अपने समर्थकों को भी अपने साथ ले लिया।

इन शेयरधारकों के उदासीन रवैये से परेशान और अपने भविष्य को लेकर चिंतित यूएनआई कर्मचारी भी बड़ी संख्या में वाईएमसीए परिसर में मौजूद थे, जिन्होंने इन शेयरधारकों के खिलाफ नारेबाजी की। इन कर्मचारियों के हाथों में ‘रवीन्द्र कुमार हाय हाय’, ‘नरेश मोहन हाय-हाय’ और ‘कर्मचारियों के बकाये का भुगतान जल्द करो’ जैसे नारे लिखी तख्तियां भी थीं।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष तीन मार्च को हुई एजीएम में भी रवीन्द्र कुमार ने बंद पड़े पब्लिकेशन अमृत बाजार पत्रिका के वोटों के जरिये कर्मचारियों के हित में कार्य कर रहे मौजूदा प्रबंधन को हटाने का प्रयास किया था, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सके थे। यूएनआई के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के अनुसार इसके शेयरधारक कोई व्यक्ति न होकर पब्लिकेशन हैं। अमृत बाजार पत्रिका का प्रकाशन लंबे समय से बंद हो चुका है, ऐसी स्थिति में वह एजीएम में वोट करने का अधिकारी नहीं था।

यूएनआई के कर्मचारियों की मानें तो इस संस्था की मौजूदा स्थिति के जिम्मेदार कुछ शेयरधारक ही हैं, जो न तो इस एजेंसी की सर्विस लेते हैं, न ही एक पैसे का कोई निवेश करना चाहते हैं, परन्तु इनकी ‘गिद्धदृष्टि’ इसकी बेशकीमती जमीन पर लंबे समय से है। तत्कालीन कार्यकारी निदेशक नरेश मोहन के कार्यकाल में गलत तरीके से यूएनआई के शेयर जी समूह की मीडियावेस्ट कंपनी को महज 32 करोड़ रुपये में बेच दी गयी थी। इस खरीद-बिक्री में रवीन्द्र कुमार की भूमिका भी संदिग्ध थी। वह समय-समय पर इसकी परिसम्पत्तियों पर कब्जा करने के उद्देश्य से पहुंच जाते हैं।

कुछ वर्ष पूर्व रवीन्द्र कुमार यूएनआई को मरा हुआ सांप बताते थे, वही आज फिर से गलत इरादों से सक्रिय हैं और ऐसा समझा जाता है कि इसके पीछे यूएनआई की प्रस्तावित बिल्डिंग में हिस्सेदारी प्रमुख कारण है। मजे की बात है कि रवीन्द्र कुमार पर इस संवाद समिति ने अपना लाखों रुपये बकाया होने का दावा किया है और इसी कारण मौजूदा बोर्ड ने निदेशक मंडल की पिछले दिनों हुई बैठक में उनके मनोयन को निलंबित रखने का फैसला भी किया था। यूएनआई के कर्मचारियों के साथ खड़ा होने वाले शेयरधारकों में आनंद बाजार पत्रिका (एबीपी), नवभारत , मणिपाल प्रिंटर्स जैसे समूह शामिल हैं। एबीपी ने इससे पहले भी संवाद समिति को बचाने का प्रयास किया था और उदयन भट्टाचार्य को वाइस प्रेसिडेंट नियुक्त किया था। उस दौरान कंपनी ने रफ्तार पकड़नी शुरू की थी, लेकिन निहित स्वार्थ वाले शेयरधारकों के इशारे पर तत्कालीन यूनियन के कुछ पदाधिकारियों ने तंग करके श्री भट्टाचार्य को संस्थान छोड़ने पर मजबूर कर दिया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूएनआई के कर्मचारियों का 80 करोड रुपये कंपनी पर बकाया है, लेकिन कुछ शेयरधारकों को छोड़कर अन्य सभी इसके रिवाइवल के लिए कोई योजना नहीं बना रहे हैं। कर्मचारियों का दावा है कि उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है और यदि यूएनआई आज भी मैदान में डटी है तो वह सिर्फ अपने कर्मचारियों के बल पर, जिनके 27 महीनों के वेतन के अलावा अन्य लाभ भी लंबे समय से फ्रीज हो चुके हैं। वर्ष 2000 में यूएनआई के पास 28 करोड़ रुपये की सरप्लस राशि थी, जिसे तत्कालीन प्रबंधन (नरेश मोहन) ने तहस-नहस कर दी। एजेंसी के एक विश्वस्त सूत्र ने बताया कि मौजूदा प्रबंधन विभिन्न योजनाओं पर काम कर रहा है, जिसे ये निहित स्वार्थ बाधित करना चाहते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा प्रबंधन के हाथों में कर्मचारियों के हित संरक्षित रहेंगे।

Regards
UNI Workers’ Union
[email protected]

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