सहारा में उपेंद्र जी की तूती बोला करती थी!

-विकास मिश्र-

उपेंद्र सर चले गए। करीब 23-24 साल से एक बड़े भाई, एक अभिभावक के रूप में उनकी जो छाया हमारे ऊपर बनी थी, आज वो भी सिर से उठ गई। पत्रकारिता में मैंने उपेंद्र मिश्र जी से ज्यादा निर्भीक, जुझारू, ईमानदार और उदार शख्सियत नहीं देखी। बेहद साधरण तरीके से रहने वाले असाधारण इंसान थे। 1980 के नारायणपुर कांड को ‘आज’ अखबार में उजागर करने वाली टीम के अगुवा वही थे, जिस पर यूपी की बनारसी दास और केंद्र की इंदिरा गांधी की सरकार हिल गई थी।

उपेंद्र मिश्र

राष्ट्रीय सहारा के संस्थापकों में से एक थे उपेंद्र जी। सुब्रत राय के बेहद करीबी। माधव कांत मिश्र सहारा के संपादक थे। उपेंद्र जी अक्सर कुरता-पजामा और चप्पल पहने रहते थे। एक गमछा भी कंधे पर रहता था। सहारा में आए तो पैंट शर्ट अनिवार्य रूप से पहनने लगे। दफ्तर में एक दिन जूता पहनकर पहुंचे। माधवकांत जी ने कुछ लोगों को बुलाया, बोले-अरे देखो उपेद्र जी आज जूता पहने हुए हैं। उपेंद्र जी बोले-क्या करूं, आज अखबार छोटा था, उसमें चप्पल से ही काम चल जाता था।’ उनके इस तंज पर माधवकांत जी मुस्कुराकर रह गए।

सहारा में उपेंद्र जी की तूती बोला करती थी, तमाम लोगों को उन्होंने नौकरियां दी थीं, जो इन दिनों अलग अलग संस्थानों में उच्च पदों पर हैं। एक रोज अखबार के न्यूजरूम में सुब्रत राय के भाई जयब्रत राय पहुंच गए। उन्होंने दो पत्रकारों की किसी बात पर क्लास लगा दी। उपेंद्र जी जब शाम को दफ्तर पहुंचे तो उन्हें वो दोनों पत्रकार मुंह लटकाए मिले। उपेंद्र जी को पता चला तो उन्होंने सुब्रत राय को फोन किया, बोले- ‘जयब्रत राय को माफी मांगनी होगी।’ बात बढ़ गई, उपेंद्र जी समझौते के मूड में नहीं थे। जयब्रत राय को वापस आकर उन दोनों पत्रकारों से माफी मांगनी पड़ी, लेकिन इसके बाद उपेंद्र जी मैनेजमेंट की नजरों में चढ़ गए। चढ़ क्या गये, निशाने पर आ गए।

कुछ ही दिनों बाद सहारा के रिसर्च विंग में उपेंद्र जी का ट्रांसफर कर दिया गया। वहां से उन्होंने वो टीम बनाई, जिसने हस्तक्षेप जैसा साप्ताहिक परिशिष्ट निकाला। वैसा परिशिष्ट दूसरा कोई भी अखबार कभी निकाल नहीं पाया। हम लोग उस वक्त इलाहाबाद में पढ़ते थे। रविवार का राष्ट्रीय सहारा अनिवार्य रूप से हम सभी छात्रों के पास आता था।

1996 में मेरी मुलाकात हुई थी उपेद्र जी से। तब मैं विचार मीमांसा पत्रिका का यूपी ब्यूरो चीफ था। उपेद्र जी के पास उस समय अमृत प्रभात के पुनर्प्रकाशन का प्रोजेक्ट था। वे चाहते थे कि मैं उसमें चीफ सब एडिटर के रूप में ज्वाइन करूं। उससे बहुत पहले वो राष्ट्रीय सहारा से अपना पिंड छुड़ा चुके थे और कुबेर टाइम्स के प्रोजेक्ट में धोखा खा चुके थे। उनके बेहद अपने ने उन्हें धोखा देकर वो प्रोजेक्ट हासिल कर लिया था।

उपेंद्र मिश्र (दाहिने से दूसरे), लेखक विकास मिश्र (एकदम बाएं), शील शुक्ला (बाएं से दूसरे) और बृजेश शुक्ला (एकदम दाएं)

1997 की शुरुआत में ही विचार मीमांसा पत्रिका बंद हो गई थी। कुछ ही महीनों बाद संघर्ष के दिन शुरू हो गए, संघर्षों ने उपेंद्र जी और मुझे एक साथ जोड़ा। फिर तो संघर्षशील लोगों की टीम जुड़ गई। सिर्फ मैं ही था, जिसके पास नौकरी के नाम पर कुछ था, लेकिन तनख्वाह की गारंटी नहीं थी।

अमृत प्रभात शुरू होने का मुहूर्त नहीं आया था। इस बीच मेरे पास मध्य प्रदेश की पहली इंटरनेट आधारित न्यूज एजेंसी एक्सप्रेस मीडिया सर्विस के यूपी ब्यूरो चीफ पद का ऑफर आया। मैंने ज्वाइन किया, उपेंद्र जी को संपादकीय सलाहकार के रूप में ज्वाइन करवाया। दो महीने भी ठीक से नहीं बीते थे कि एक दिन उसके प्रधान संपादक महोदय रात में शराब पीकर दफ्तर में आ गए। उपेंद्र जी भड़क गए। जमकर लताड़ लगाई, बोले कि हिम्मत कैसे हुई शराब पीकर आने की। अगले दिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया, मैं क्या करता, मैंने भी इस्तीफा दे दिया।

फिर तो लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया के सामने गुप्ता की दुकान ही हम लोगों के अड्डे में शुमार हो गई। रोज शाम को वहीं जमावड़ा होता, उपेंद्र जी, मेरे मित्र शील जी Sheel Shukla, ज्ञान प्रकाश और तो चार और लोग। वहां भविष्य की प्लानिंग होती, चाय का दौर चलता।

एक फाइनेंस कंपनी थी, अमोली ग्रुप। उसके मालिक थे मिश्रा जी। उनकी पीवीसी पाइप की फैक्ट्री थी, सरकारी सप्लाई थी। बोले कि उनका पैसा फंसा है सरकार के पास, अगर निकल आए तो वो खुद एक्सप्रेस मीडिया सर्विस की तर्ज पर प्राइम मीडिया सर्विस लांच कर देंगे। यानी ईमएमएस की जगह पीएमएस। उपेंद्र जी ने हमारे करामाती साथी ज्ञान प्रकाश Gyan Swami को लगा दिया। उस वक्त करीब 1 करोड़ रुपये का बकाया ज्ञान ने सरकार से निकलवा लिया, लेकिन मिश्रा जी कन्नी काट गए, वो प्रोजेक्ट भी फेल।

इसी दौरान यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के एक बहुत करीबी ने अखबार निकालने के लिए कमर कसी। हमने नाम भी रजिस्टर्ड करवा लिया-विश्व बाजार पत्रिका। टीम भी बन गई । बात आगे बढ़ी। उपेंद्र जी ने साफ कह दिया था- ‘आप निवेश करेंगे, उसके बाद न्यूज रूम में दखल नहीं देंगे।’ जो मालिकान थे, उन्होंने कहा-70 लाख रुपये से ज्यादा हम इन्वेस्ट नहीं करेंगे। उपेंद्र जी बोले-इतने में काम नहीं चलेगा। कुछ ऐसा हुआ कि उपेद्र जी प्रोजेक्ट से पीछे हट गए, बोले-पतित है, इसके साथ मेरी नहीं बनेगी।

2000 में मैंने अमर उजाला, मेरठ में ज्वाइन कर लिया। उसके डेढ़ साल बाद दैनिक जागरण। जागरण के डायरेक्टर देवेश गुप्ता जी से मेरी ट्यूनिंग बहुत अच्छी थी। तब शशि शेखर जी ने अमर उजाला के संपादक के तौर पर ज्वाइन किया था। मैंने देवेश जी से उपेंद्र जी की बात की। उन्होंने मुलाकात के लिए हामी भर दी। तारीख तय हुई। उपेंद्र जी नहीं आए। मैंने पूछा तो बोले-‘मैं आया तो इस ग्रुप में मालिकान को भी दिक्कत होगी और मुझे भी।’

उपेंद्र जी ने मथुरा के कल्पतरु ग्रुप के अखबार कल्पतरु टाइम्स की शुरुआत करवाई। बाद में वो भी बंद हो गया। कई अखबारों के वो सलाहकार रहे, लेकिन नौकरी नहीं की। जब तक जिए, अपनी शर्तों पर जिए। फटेहाली मंजूर थी, लेकिन समझौता नहीं।
उपेंद्र जी मुझे बहुत मानते थे, लेकिन क्लास भी दो चार बार उन्होंने तगड़ी वाली लगाई है। लखनऊ में हम लोग यदा कदा भांग भी खा लेते थे। एक दिन उपेंद्र जी ने मुझे डपट दिया, बोले-भांग और पत्रकारिता में दूर-दूर तक रिश्ता नहीं हो सकता। या तो भांग छोड़िए या पत्रकारिता। फिर मैंने भांग ही छोड़ी। बहुत उदार थे उपेंद्र सर। खुद की तंगहाली में भी दूसरों की मदद से पीछे नहीं हटते थे। दूसरों की मदद करने और दूसरे के लिए मदद मांगने में वे कोई संकोच नहीं करते थे।

चाय के बहुत शौकीन थे उपेंद्र सर। दिन भर में 30-40 कप चाय भी पी सकते थे। उनके घर पर कोई आता था तो हर घंटे चाय का ऑर्डर भाभी जी को दे देते थे। मेरे घर भी आते थे तो संकोच नहीं करते थे, बोलते थे-जरा चाय बनवाइए। भाभी जी ने उपेंद्र सर के साथ बहुत कुछ झेला, लेकिन हर हाल में उनका साथ दिया। उनकी बेटी और दो बेटों के रास्ते में भी बहुत बाधाएं आईं, लेकिन पिता से उन्हें जीवट मिला। बेटी गुड़िया ‘जी हिंदुस्तान’ न्यूज चैनल में काम करती है। उसे बहुत मानते थे उपेंद्र जी।

उपेंद्र सर के दो दशक से ज्यादा के साथ को एक पोस्ट में समेट पाना बहुत मुश्किल है। इन दिनों वे गोरखपुर में रह रहे थे। परसों रात तक अच्छे भले थे। कल तड़के उन्हें दिल का दौरा पड़ा। घर वाले अस्पताल लेकर भागे, तो अस्पताल वालों ने कोरोना का बहाना बनाकर भर्ती नहीं किया। दो-तीन अस्पतालों में यही हाल रहा। जिससे सोर्स था, उतनी सुबह उसका फोन नहीं उठा। उपेद्र सर को इतने इंतजार की आदत नहीं थी। वे दुनिया को अलविदा कह गए।

ईश्वर उपेंद्र जी की आत्मा को शांति दे, उन्हें अपने चरणों में स्थान दे। भाभी जी, गुड़िया और उनके दोनों बेटों को दुखों का ये भार वहन करने की क्षमता भी दे।

(इस पोस्ट को मैं जान बूझकर अपने दो भाइयों Shalabh Mani Tripathi और Rahees Singh Rahees Singh को टैग कर रहा हूं। दोनों ही यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के सलाहकार हैं। उपेंद्र जी तो जीते जी कोई मदद नहीं लेते, लेकिन अगर यूपी सरकार उनके परिवार को कोई मदद पहुंचा सके तो ये उनके प्रति हम सब पत्रकारों की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।)

आजतक न्यूज़ चैनल में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से।

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