बनारस के दो वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों के किस्से!

बद्री प्रसाद सिंह-

बनारसी कप्तान! आज आपको वाराणसी के दो वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के किस्से सुनाता हूँ जो मुझे पुलिस अधीक्षक नगर वाराणसी के पद पर रहते सुनाया गया था।

बाबा भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी काशी में कभी पं. कमलापति त्रिपाठी का जमाना था जिनकी खड़ाऊं के सहारे बहू जी के नाम से जग विख्यात श्रीमती चंद्रा त्रिपाठी जी राज करती थी। उन्ही दिनों वहां एक व्यवहार कुशल वी.के.जैन नामक ssp नियुक्त थे जिन्होने मना करना सीखा ही नहीं था। पुलिस भर्ती चल रही थी।एक दिन बहू जी ने फोन पर एक लड़के की पुलिस भर्ती हेतु सिफारिश की। जैन साहब ने आर.आई. के पास भेजने को कह कर आर.आई. को बता दिया।

अगले दिन बहू जी ने फोन कर बताया कि उनके उम्मीदवार को आर.आई. ने भगा दिया। जैन साहब क्षमा मांगते हुये आर.आई. को नालायक बताते हुए उसे पुनः भेजने को कहा तथा आर.आई. को बुलाकर पूछा तो आर.आई. ने बताया कि उस लड़के का सीना नाप में कम पाया गया था।

जैन साहब ने कहा कि उसकी भर्ती का नाटक कर उसे पुरानी वर्दी देकर पुलिस कट बाल कटा कर रंगरूटी का प्रशिक्षण प्रारंभ करा दें। तनख्वाह गोपनीय सेवा फंड से प्रतिमाह उनसे ले लिया करें।वह लड़का सिपाही में भर्ती उसी तरह कर लिया गया और उसकी ट्रेनिंग होने लगी व वेतन भी सेक्रेट सर्विस फंड से प्रति माह मिलने लगा।

3-4 महीने बाद जैन साहब का स्थानांतरण होगया और उनकी जगह राधेश्याम शर्मा जी नये वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नियुक्त हुए। पहली तारीख को आर.आई. उस रंगरूट का वेतन माँगने शर्मा जी के पास गए और पूछने पर पूरी दास्तान बयां कर दी।शर्मा जी स्पष्ट वादी थे। उन्होंने आर.आई. को तत्काल उस लड़के को निकाल बाहर करने का निर्देश दिया। वह लड़का निकाले जाने के बाद रोता हुआ बहूजी के पास पहुंचा तो बहूजी ने शर्मा जी से आर.आई. की शिकायत की तब शर्मा जी ने असलियत बताकर समझा दिया कि शारीरिक माप में वह अनुपयुक्त था और उसकी कोई मदद संभव नहीं है।

काशी में रात भर चहलपहल बनी रहती है और कहा जाता है कि शिव के गण रातभर विचरण करते रहते हैं। एक स्थानीय विधायक जी ssp शर्मा जी को प्रायः देर रात फोन करते थे। शर्मा जी रात शीध्र सोकर प्रातः उठकर पूजापाठ करते थे और देर रात जगने से उनकी आदत में व्यतिक्रम होने लगा।

माननीय को सीधे मना भी नहीं करना चाहते थे सो उन्होंने नयी हिकमत अमल में लाई। उन्होंने फोन ड्यूटी को समझा दिया कि देर रात विधायक जी का फोन आने पर वह बता दे कि ssp इलाके में रात्रि गस्त पर गए हैं, आने पर बता दिया जाएगा। शर्मा जी भोर चार बजे जगने पर फोन ड्यूटी से जिले की खैरियत पूछते, यदि विधायक जी का फोन होता तो तुरंत फोन मिलवाकर बात करते।

3-4 बार की वार्ता के बाद एक दिन मा.विधायक जी ssp शर्मा जी के पास आकर शिकायती लहजे में बोले कि जनता की समस्याओं में उलझे रहने के कारण वह रात में देर से सोते हैं और वह प्रातः ही फोन करके उन्हें उठा देते हैं।

शर्मा जी इसी मौके की ताक में थे। छूटते ही बोले कि वह भी दिन भर की झंझट झेलते थक कर शीध्र सोते हैं और प्रातः पूजापाठ के लिए उठते हैं, देर रात फोन पर जगाने से वह भी परेशान होते हैं। विधायक जी भी समझ गए कि किसी गुरूघंटाल से पाला पड़ा है और उन्होंने देर रात्रि फोन करना बंद कर दिया।

उक्त दोनों ही अधिकारी अपनी सेवा के सफल अधिकारी रहे हैं।जैन साहब तो मेरे डी.जी.पी.रहे थे लेकिन शर्मा जी के अधीन सेवा करने का सौभाग्य नहीं मिला, वह जनपद बदायूं के दातागंज के रहने वाले थे जहां 1997 में मैं पुलिस अधीक्षक नियुक्त रहा था।बदायूं तब बहुत पिछड़ा तथा खुराफाती था। अब दोनों ही अधिकारी नहीं रहे, दोनों को विनम्र श्रद्धांजलि।



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