योगी का नौकरशाही पर अंधविश्वास कहीं विधानसभा चुनाव में भट्ठा न बिठा दे!

अजय कुमार, लखनऊ

लखनऊ, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ब्यूरोक्रेसी यानी नौकरशाही के प्रति हद से ज्यादा झुकाव योगी कैबिनेट के मंत्रियों, पार्टी के जनप्रतिनिधियों/नेताओं/कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहा है। यह नाराजगी तब से जारी है जब से योगी ने कार्यभार संभाला है, लेकिन चुनाव की तारीखें नजदीक आने के साथ-साथ कोरोना महामारी के समय जनता की मदद करने में असहाय नजर आ रहे जनप्रतिनिधियों का सरकार के खिलाफ खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। नाराज पार्टी के नेताओं का कहना है कि ब्यूरोक्रेसी का काम शासन -प्रशासन एवं लॉ एंड आर्डर संभालना है, न कि सरकार चलाना।

‘सरकार’ भी नौकरशाह चलाएंगे तो फिर चुनाव ही क्यों होते हैं? क्यों चुने जाते हैं जनप्रतिनिधि? आखिर जनता का सामना तो जनप्रतिनिधियों को ही करना होता है। जनता के चुने गए नुमांइदों की बात में दम लगता है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश-प्रदेश में विकास को गति देने के लिए नौकरशाही और राजनितिक दलों, दोनों को ही संतुलन बनाकर रखने की आवश्यकता होती है क्योंकि जहाँ पर इनके रिश्तों में सामंजस्य नहीं रहता वहां अवश्य ही विरोधाभास होता है, जिसका प्रभाव सेवाओं पर पड़ता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि नौकरशाहों तथा राजनितिक दलों को जहाँ पर भी संभव हो वहां एक दूसरे को सहयोग देना चाहिए क्योंकि दोनों ही जनता के प्रति जवाबदेही होती हैं। दोनों का ही ‘धर्म’ जनता की सेवा करना होता है।

रही बात नौकरशाहों के सरकार चलाने की तो, यह नौकरशाही नहीं तय करती है कि वह सरकार चलाएगी, इसके लिए काफी हद तक सरकार का मुखिया जिम्मेदार होता है। इसीलिए तो कहा जाता है कि योगी जी जिस नौकरशाही को अपनी अपनी ताकत समझते हैं, उसी नौकरशाही को योगी से पहले के मुख्यमंत्रियो ने कभी सिर पर नही चढ़ाया। मायावती ब्यूरोक्रेसी को ‘जूते की नोंक पर’ रखती थीं। नौकरशाह पूर्व मुख्यमंत्री का नाम सुनते ही कांपने लगते थे। इसीलिए जब योगी और मायावती सरकाार की कार्यशैली और नौकरशाही पर सरकार की पकड़ की तुलना की जाती है तो योगी काफी पीछे नजर आते हैं।

मायावती में एक और खास बात थी, वह योगी की तरह ज्यादा दौड़-भाग नहीं करती थीं, बल्कि वह अपने कार्यालय में बैठे-बैठे पूरे प्रदेश का फीडबैक लेती थीं। अधिकारियों को यह पता रहता था कि मुख्यमंत्री के पास पूरे प्रदेश की खबर रहती थी। जिलों में मौजूद बसपा के तमाम नेता और कार्यकर्ता बसपा नेत्री के लिए खुफिया तंत्र की तरह काम करते थे। इसीलिए किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह माया को बरगला या उनके हुकुम की नाफरमानी करने की सोच भी सके।

बसपा तो बसपा विपक्षी नेता भी यह कहने में संकोच नहीं करते हैं कि मायावती की ब्यूरोक्रेसी पर जर्बदस्त पकड़ थी। मायावती में एक और खासियत यह थी कि उन्हें नौकरशाही को जो भी आदेश देना होता था, वह बंद कमरे में देती थीं, हां उनके आदेश की यदि अधिकारी अवहेलना करते थे तो सबसे सामने वह नौकरशाहों की क्लास लेने में भी नहीं हिचकिचाती थीं। इसलिए अधिकारी, मायावती के आदेश को ‘पत्थर की लकीर’ मानकर काम करते थे। मायावती और योगी सरकार की नौकरशाही पर कितनी पकड़ है इसकी बानगी कई बार देखी जा चुकी है।

कल्पना कीजिए की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह यदि मायावती मुख्यमंत्री रहते यह आदेश देतीं कि सभी नौकरशाह सीयूजी मोबाइल के जरिए उनसे और मुख्यमंत्री कार्यालय से सीधे सम्पर्क में रहेंगे तो किसी नौकरशाह या पुलिस अधिकारी की हिम्मत हो सकती थी कि वह आदेश की अवहेलना कर देता, लेकिन योगी राज की नौकरशाही सीएम का कितना आदेश मानती है यह जानने के लिए जब नौकरशाहों को सीयूजी पर फोन मिलाया गया तो आधे से अधिक नौकरशाहों से बात नहीं हो सकी। किसी ने सीयूजी उठाना जरूरी नहीं समझा तो किसी के पीआरओ ने फोन उठाया। सीयूजी पर मुख्यमंत्री कार्यालय से किसी विषय पर स्पष्टीकरण मांगा जाता है तो वह बार-बार रिमांइडर करने के बाद भी स्पष्टीकरण नहीं मिलता हैं। अधिकांश जिलों के जिलाधिकारी और एसएसपी/एसपी मुख्यमंत्री के आदेश की इस तरह अवहेलना करने से इसलिए भी नहीं डरते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि सीएम उन्हीं पर पूरी तरह से आश्रित हैं। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर उन्हें भरोसा है नही। जबकि माया राज में सीयूजी की घंटी बजते ही नौकरशाह सीट से खड़े होकर जय हिन्द-जय हिन्द करने लगते थे।

मायावती राज में ही अयोध्या पर हाईकोर्ट का फैसला आया था, फैसले से पहले सब बहुत सहमें हुए थे,लेकिन माया ने लॉ एंड आर्डर इस तरह संभाला की पत्ता भी नहीं खड़क पाया। सच्चाई यही है कि 2012 के विधान सभा चुनाव में मायावती को एक तरफ उनका भ्रष्टाचार ले डूबा तो दूसरी ओर नौकरशाह भी नहीं चाहते थे कि फिर से बहनजी की सरकार बने। उस समय के हालात में यह तय था कि यदि बसपा सरकार जाएगी तो समाजवादी पार्टी की ही सत्ता में वापसी होगी और सपा राज में नौकरशाह को खुली झूठ रहती थी। इसी लिए तो पूर्ववर्ती मायावती सरकार में डरी सहमी रहने वाली नौकरशाही अखिलेश सरकार में आजादी मिलते ही इतनी स्वच्छंद हो गयी कि उसकी चाल ही बिगड़ गई। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को एक बार आईएएस वीक में कहना पड़ गया था, ‘अगर वह सम्मान देना जानते हैं तो सजा देना भी आता है।’

पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी अक्सर कहा करते थे कि ब्यूरोक्रेसी सरकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचते ही नहीं देते हैं।

बसपा सुप्रीमों मायावती के अलावा यदि कोई ब्यूरोक्रेसी पर अपने हिसाब से नकेल डाल पाया तो वह थे भाजपा नेता कल्याण सिंह। कल्याण सिंह सरकार का पहला कार्यकाल इस हिसाब से काफी यादगार रहा था। कल्याण सिंह कहा करते थे कि ब्यूरोक्रेसी बेलगाम घोड़े की तरह है। नेता रूपी घुड़सवार की रान में जितनी ताकत होगी, वह ‘घोड़े’को उतनी फुर्ती से नियंत्रित कर लेता है, लेकिन हकीकत यह भी है कि दोबारा सत्ता में आने के बाद कल्याण सिंह ने भी ब्यूरोक्रेसी के बीच अपनी हनक खो दी थी।

बात योगी की कि जाए तो पार्टी नेताओं को किनारे करके ब्यूरोक्रेसी को हद से ज्यादा महत्व दिए जाने की वजह से पार्टी का आलाकमान भी चिंतित है। योगी का अपनी ब्यूरोक्रेसी पर विश्वास का यह आलम है कि इसके आगे वह मोदी की सोच को भी तरजीह नहीं देते हैं। इसी लिए तो मोदी की इच्छा के अनुरूप जब गुजरात के तेजतर्रार आईएएस अरविंद शर्मा को इस्तीफा दिलाकर उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बनाया गया तो राजनैतिक पंडितों ने कहना शुरू कर दिया कि अरविंद को यूपी की बेलगाम नौकरशाही को नियंत्रित करने के लिए भेजा गया है। अरविंद के डिप्टी सीएम तक बनाए जाने की चर्चा होने लगी, परंतु योगी ने उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना तो दूर एक अदद घर तक नहीं मुहैया कराया। जबकि जो मकान अरविंद को आवंटित किया गया था, वह खाली पड़ा था। योगी की इसी जिद्द के चलते आलाकमान को लगने लगा है कि यही हाल रहा तो आठ-दस महीने बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

कोरोना महामारी के चलते वैसे ही जनता योगी सरकार से नाराज चल रही है। ऐसे में यदि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी नाराज होकर घरों में बैठ गए तो बीजेपी के लिए मिशन-2022 को पूरा करना मुश्किल हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी के बलिया से विधायक सुरेंद्र सिंह का बयान यह बताने के लिए काफी है कि पार्टी में योगी को लेकर नाराजगी किस हद तक बढ़ती जा रही है। श्री सिंह ने कोरोना प्रबंधन में बदइंतजामी को लेकर योगी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि नौकरशाही के जरिये कोविड पर नियंत्रण का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रयोग असफल रहा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में यह व्यवस्था की कमी ही माना जाएगा कि भाजपा के मंत्री व विधायक कोविड का शिकार हो रहे हैं तथा उन्हें समुचित चिकित्सा सुविधा तक नहीं मिल पा रही है। विधायक ने कहा कि व्यवस्था जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि केंद्रित होनी चाहिए न कि नौकरशाही केंद्रित लेकिन मुझे दुख है कि देश व सूबे में भाजपा की सरकार होते हुए भाजपा के मंत्री व विधायक दवा के अभाव में मर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के बरेली जिले के नवाबगंज विधानसभा क्षेत्र से सदस्य केसर सिंह, लखनऊ पश्चिम के विधायक सुरेश कुमार श्रीवास्तव, औरैया सदर के विधायक रमेश चंद्र दिवाकर की कोविड संक्रमण से मौत हो गई थी। योगी सरकार की कार्यप्रणाली पर एक के बाद एक उनके ही सिपहसालार उंगलियां उठा रहे हैं। कोई विधायक खुलेआम बयानबाजी कर रहा है तो कोई ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है। ऐसा नहीं है कि किसी एक विधायक ने अपनी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाया हो, भाजपा सांसद और विधायक लगातार कोविड से निबटने में अपनी पार्टी की सरकार की खामियों को उजागर कर रहे हैं और अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों से तीखे सवाल पूछ रहे हैं। नाराज नेताओं का कहना है कि उनके मतदाता जब अस्पताल में बेड या ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए उनके पास आते हैं तो वे उनकी कुछ मदद नहीं कर पाते। कई भाजपा कार्यकर्ता कोविड के कारण जान गंवा चुके हैं लेकिन सत्तारूढ़ दल के सांसद और विधायक असहाय होकर देखते रह गए। संकट के समय उनके मतदाताओं को जब उनकी मदद की जरूरत होती है तो वे उनके पास नहीं होते. नौकरशाही सुनती नहीं है। ऐसे में किस मुंह से हम चुनाव में जनता से वोट मांगने जाएंगे।

पार्टी के नेताओं का योगी सरकार से नाराजगी की एक वजह यह भी है कि कोविड महामारी की दूसरी लहर में शहर में दहशत फैलाने के बाद कोरोना गांवों को भी अपनी चपेट में ले रहा है और इससे निबटने में योगी सरकार जिस तरह लड़खड़ा रही है उसके कारण भाजपा के सांसद और विधायक महसूस करने लगे हैं कि वे मोदी-योगी के सिपाही भले हों लेकिन मतदाता उन्हें इसी आधार पर आंकेंगे कि जब उन्हें अपने प्रतिनिधियों की सबसे ज्यादा जरूरत थी तब वे क्या कर रहे थे. और जब उम्मीदवार की जीतने की क्षमता का सवाल हो, तब कोई भी दल और भाजपा सबसे ज्यादा, इस मामले में कोई समझौता नहीं कर सकती, भले ही वर्तमान प्रतिनिधि का टिकट क्यों न काटना पड़े. यही वजह है कि भाजपा के सांसद और विधायक जब यह देख रहे हैं कि मतदाता जरूरत के समय अपने प्रतिनिधियों को सहायता के लिए मौजूद नहीं होने के कारण नाराज हो रहे हैं, तो इससे जनप्रतिनिधियों में दहशत जोर पकड़ रही है। इसी वजह से जनप्रतिनिधियों ने योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

योगी सरकार से नाराज विधायकों की लिस्ट लगातार लम्बी होती जा रही है। योगी के गढ़ गोरखपुर के सदर विधायक डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल, सुल्तानपुर के बीजेपी विधायक देवमणि द्विवेदी, सीतापुर शहर सीट से विधायक राकेश राठौर, हरदोई सिे बीजेपी सांसद जय प्रकाश रावत और यहीं के गोपामऊ विधानसभा से भारतीय जनता पार्टी के विधायक श्याम प्रकाश के अपनी ही सरकार से नाराज रहने की चर्चा आम है। पिछले वर्ष अगस्त के महीने में बीजेपी विधायक ने अलीगढ़ के एक प्रकरण को आधार बनाकर अपने समकक्ष बीजेपी विधायकों को यहां तक नसीहत दे दी थी कि वह अपना सम्मान और स्वाभिमान को सुरक्षित रखने के थाने और अधिकारियों के पास न जाएं।

अलीगढ़ में बीजेपी विधायक के साथ मारपीट प्रकरण पर उन्होंने अपनी सरकार को घेरते हुए यूपी पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़ा करते हुए अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लिखा था कि प्रोटोकॉल के अनुसार विधायक का दर्जा मुख्य सचिव के बराबर है। अपने सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा करनी है तो इस समय विधायकों को थाना तथा अधिकारियों के पास नहीं जाना चाहिए। इसके अगले दिन उन्होंने अलीगढ़ प्रकरण से संबंधित मामले पर वीडियो डालते हुए फिर अपनी सरकार की चुटकी लेते हुए लिखा, ‘रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा भी दिन आएगा. एक दारोगा एमएलए से तू, तेरे, तुझको कहकर के, हाथ पैर भी तोड़ेगा। माननीय मुख्यमंत्री जी विधायकों पर कुछ तो कृपा कीजिए। आप ही विधायकों के संरक्षण और नेता हैं. हम लोग जाएं तो जाएं कहां? इस दारोगा पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है।’

यहां तक की एक बार तो विधान सभा तक में बीजेपी के कुछ विधायकों ने ही सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। यह तय है कि चुनावी साल में यदि योगी ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली तो इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ सकता है। भाजपा आलाकमान यह कभी नहीं चाहेगी कि यूपी उसके हाथ से निकले। इस लिए केन्द्र को जल्द से जल्द बद से बदत्तर होते यूपी के बारे में कोई फैसला लेना पड़ेगा, क्योंकि जमीनी हकीकत यही है कि योगी की ईमानदार छवि होने के बाद भी जनता उनके काम करने के तौर तरीकों से खूश नहीं है। योगी के एकला चलो के रवैये के चलते आरएसएस ने भी यूपी से दूरी बना ली है क्योंकि संघ जमीन पर काम करता है और उसका क्रेडिट नौकरशाही ले जाती है।

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