यूपी सरकार का जो विरोध है, वह योगी और उनकी जातिवादी सोच को लेकर है!

हरि मृदुल-

मोदी-भाजपा-योगी से खार खाये बैठे चातकों का बस चले तो अखिलेश यादव को कल ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दें।

कांग्रेस का आलम तो 5 से 10 के भीतर सिमटने का इशारा दे रहा है। कांग्रेस का वोट शेयर बढ़ जाये तो इसे सुखद कहा जायेगा। ओवैसी भी भाजपा के हित का काम कर रहे हैं। वहीं बसपा साइलेंट प्लेयर बनती दिखाई दे रही है, जिसका प्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिलेगा और सीधी हानि सपा को होगी।

मित्र अपनी अंधविरोध की भक्ति में 50 फीसदी महिलाओं और बुजुर्गों के द्वारा उनके वोट के चयन को अनदेखा करने की भूल अलग कर रहे हैं।

एक बात तय मानिए कि घोषणाएं चाहे जितनी हो जाएं लेकिन जब किसी व्यक्ति के बैंक खाते में एक मुश्त राशि, सुनिश्चित अवधि पर आती है तो उसका असर अलग ही होता है। यही बात राशन समेत अन्य मामलों में भी दिखाई दी है। गावों के लोग आज भी भले शौच के लिए खेतों में जाएं लेकिन जिनके दरवाज़ों पर सरकारी खर्चे से शौचालय बन चुका है, उनके लिए ये स्टेटस सिम्बल और बड़ी बात है। यही हाल उज्ज्वला योजना का भी है। गैस सिलेंडर को रीफिल भले न करवा सकें लेकिन यही गैस का चूल्हा लकड़ी फूँकने वाले परिवारों के लिए शो-पीस बन स्टेटस सिम्बल बना हुआ है। उन्हें उम्मीद है कि सरकार उनकी इस दिक्कत को भी दूर करेगी।

यूपी, बिहार का अर्द्ध शहरी और ग्रामीण समाज ऐसा समाज है जो अत्यल्प में संतोष करता आया है। यहाँ जन प्रतिनिधियों और सरकारों द्वारा किये गए कार्यों को उनका कर्तव्य न समझते हुए कृपा समझा जाता है। पूर्वांचल के लोगों को आजादी के बाद पहली बार ये अनुभव हो रहा है कि उनका विकास अगर अब न हुआ तो न जाने और कितने दशक पिछड़े रहेंगे।

स्थिति यह है कि यहां का समाज अपने घर के सामने की सड़क पर बलपूर्वक ठोकरें बनवाने और सरकारी स्ट्रीट लाइट लगवाने में ही शान समझता आया है। वैसी मानसिकता क्योंकर खुद को इन सुविधाओं से मुक्त करना चाहेगी!

हाँ, ये बात जरूर है कि इस सरकार ने भी विरोधी दलों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में विकास की प्राथमिकता बाद की रखी है और भाजपा के अधिकांश विधायक प्रभावहीन रहे हैं क्योंकि मुख्यमंत्री की कड़क, तानाशाही प्रवृत्ति के आगे इन विधायकों की फरियाद न मुख्यमंत्री कार्यालय और ना ही अधिकारियों द्वारा सुनी गई। नतीजतन, जनता का आक्रोश इन्हें झेलना पड़ रहा है।

अधिकांश इलाकों में महिलाओं और बुजुर्गों ने (सभी वर्गों से) सरकार से महंगाई वगैरह पर शिकायत के बावजूद वोट देने की बात स्पष्ट कही है जबकि युवा वर्ग अलग और मिश्रित सोच रखता दिखा है। इसके अलावा अवध, पूर्वांचल के इलाकों में किसान आंदोलन कोई मुद्दा रहा ही नहीं। हाँ, आवारा पशु 2019 के चुनावों में भी मुद्दा थे, अब भी हैं लेकिन इसका कोई खास प्रतिकूल प्रभाव न तब पड़ा था और इस बार भी पिछली बार से अधिक किन्तु सीमित प्रभाव ही पड़ने की संभावना है। इसके अलावा कोरोना की दूसरी लहर की मौतों की दारुण स्थितियां तो किसी की जुबान पर भी नहीं हैं। फिर भी शहरी क्षेत्रों में भाजपा की बढ़त हमेशा की तरह ज्यादा हो सकती है और जातिगत कारणों से ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के लिए कड़ी लड़ाई रहेगी।

यह भी सही है कि जहां कई मामलों में लोग योगी से क्षुब्ध हैं, वहां उनको मोदी में आस नज़र आती है। सरकार का जो विरोध है, वह योगी और उनकी जातिवादी सोच को लेकर है लेकिन दूसरी तरफ योगी का समर्थन करने वाले भी कम नहीं हैं।

अखिलेश वन मैन पार्टी बन चुके हैं। भाजपा की सीधी लड़ाई सपा से जरूर है लेकिन ऐसी तमाम सीटें हैं, जिनमें सपाइयों की मनबढ़ रंगत के कारण भाजपा के विरोध में गए वोटर वापस गुंडागर्दी के भय से सपा से मुँह फेरकर भाजपा की तरफ़ जा रहे हैं।

इसके अलावा इस बार 1000-5000 वोटों के अंतर से हार-जीत तय करने वाली सीटें हर बार से अधिक होने की पूरी संभावना है।

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