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सलाम टेलीग्राफ, एक बार फिर!

सौमित्र रॉय-

क्या बात है!

लगता है कि सरकार से सवाल पूछने का माद्दा सिर्फ टेलीग्राफ़ में ही बचा रह गया है।

फ़ोटो सिंडिकेट तकरीबन हर बड़े अखबार के पास होता है। नरेंद्र मोदी को यूं भी फोटू खिंचवाने का बड़ा शौक है। बात चुनने की है।

लेकिन हाथ में किसानों के लिए 2000 रुपये की खैरात का रिमोट लिए, चेहरे पर कुटिल मुस्कुराहट के साथ लफ़्ज़ों में दिल का दर्द बयां करते इस फोटो को चुनना एक डेस्क एडिटर की सोच को दिखाता है।

साथ में अपने की जलती लाश के बीच मातम, आंसू, दर्द को बयां करने के लिए कोई भी लफ़्ज़ बनावटी है, क्योंकि यही असल दर्द है।

सेंट्रल डेस्क यानी फ्रंट पेज पर वर्षों काम करते हुए मुझे बखूबी अहसास है कि एक खबर (मोदी का बयान) पढ़ने के बाद मन किस कदर विचलित होता है। खासकर जबकि शब्दों और तस्वीर का तालमेल न बैठे।

लेकिन वह दौर कुछ और था। कभी हम फ़ोटो पर तो कभी हैडिंग पर खेल जाते थे। अपने दिल की कर जाते थे।

अब दलाली का दौर है। नौकरी एक मजबूरी है, वैचारिक ग़ुलामी है और दिमाग साम्प्रदायिक है, निष्पक्ष नहीं।

टेलीग्राफ ने हैडिंग और फ़ोटो दोनों से खेला और एक बार फिर बखूबी सिखा दिया कि पत्रकार चाहे तो क्या नहीं कर सकता।

बाकी लेआउट और स्पेसिंग तो इन सब पर निर्णय के बाद ही तय होता है।

सलाम टेलीग्राफ। एक बार फिर।

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