ये दो खबरें अख़बारों में पहले पन्ने पर नहीं हैं

संजय कुमार सिंह-

आज की दो खबरें जो पहले पन्ने पर एक साथ नहीं मिलीं – मनदीप पूनिया की रिहाई और विपक्षी नेताओं को किसानों से नहीं मिलने देना…

आज का दिन किसी एक ऐसी खबर का नहीं है जो निर्विवाद रूप से लीड हो। अंग्रेजी के जो पांच अखबार मैं देखता हूं, उन सबकी लीड अलग है। यहां तक कि टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस की भी जिनके शीर्षक तक हाल में एक दिन एक जैसे थे। अमेरिका ने सुधारों का समर्थन किया शीर्षक खबर, इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड है पर टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर ही नहीं है। मुझे लगता है कि ऐसे दिन संपादकीय विवेक (नीति कहना चाहिए) को परखने वाले होते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने से पहले का अधपन्ना भी है और उसकी पहली खबर हैकोविड से संबंधित एक सर्वेक्षण की। इसमें बताया गया है कि भारत में 18 साल से ऊपर के हर पांच में से एक व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित हुआ आया है। आम लोगों में यह 21 प्रतिशत है तो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में यह 25.7 प्रतिशत है। द हिन्दू में भी यही खबर लीड है।

टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में एक खबर है, विपक्ष के 15 सांसदों को किसानों से मिलने नहीं दिया गया। यह खबर बाकी के अखबारों में पहले पन्ने पर (प्रमुखता से) नहीं दिखी। इंडियन एक्सप्रेस में भी नहीं। इंडियन एक्सप्रेस में एक सरकारी शीर्षक है, “बजट में वोटबैंक की राजनीति पहले भी होती थी, हमलोगों ने आम आदमी पर बोझ नहीं डाला : प्रधानमंत्री”। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लगभग इतनी ही जगह पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर यह बताने के लिए दी है कि ऐसी कोई खबर अंदर के पन्ने पर है। इसके साथ हिन्दुस्तान टाइम्स ने यह बताया है कि इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड फाइजर के मिश्रित प्रोटोकोल का परीक्षण शुरू हो गया है। इन और ऐसी तमाम खबरों के बीच किसी भी अखबार ने पहले पन्ने पर यह नहीं बताया है कि दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया को जमानत मिल गई और जेल से छूटने के बाद उसने क्या कहा।

हमेशा की तरह, द टेलीग्राफ आज भी सबसे अलग है। अखबार ने न सिर्फ मनदीप पुनिया की तस्वीर के साथ खबर छापी है बल्कि यह भी बताया है कि तीन फरवरी को अचानक ट्वीटर पर सक्रिय हो जाने वाली कुछ जानी मानी हस्तियों ने 28 से लेकर 30 जनवरी तक कोई ट्वीट नहीं किया था और अचानक तीन फरवरी को क्या ट्वीट किया। अखबार ने इसका शीर्षक लगाया है, कई लोगों द्वारा पूजे जाने वाले भगवान और आदर्श। तीन हस्तियों – सचिन तेनडुलकर, विराट कोहली और करण जौहर की फोटो और ट्वीट के साथ अखबार ने (किसी देश के) “आंतरिक मामलों” पर एक किस्सा भी छापा है। आप जानते हैं कि दिल्ली की सीमा पर इंटरनेट बंद किए जाने पर कुछ विदेशी हस्तियों द्वारा ट्वीट किए जाने के बाद से अचानक देश किसान आंदोलन देश का आंतरिक मामला बना दिया गया है और सीक दी जा रही है कि इसपर विदेशियों को नहीं बोलना चाहिए। द टेलीग्राफ ने यह सूचना इसी संदर्भ में दी गई है कि देश के आंतरिक मामले में कुछ हस्तियां अचानक सरकार के पक्ष में सक्रिय हो गई हैं।

इन तीन हस्तियों की इस खबर के साथ लगभग बराबर में स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया की खबर है जिसका शीर्षक है, आम आदमी जिसे हम जेल में रखना पसंद करते हैं। इसमें मनदीप ने जेल में बंद दूसरे लोगों और पत्रकारों की बी चर्चा की है और उम्मीद जताई है कि लोग उनके लिए भी वैसे ही बोलेंगे जैसे उसके मामले में बोले। मुझे लगता है कि अन्य अखबारों के मामले में अगर संपादकीय विवेक एक निश्चित दायरे में काम कर रहा है तो द टेलीग्राफ का संपादकीय विवेक ज्यादा उदार है। और बेशक उदार इस्तेमाल सही या गलत हो सकता है। यह भी संभव है कि किसी को सही लगे या किसी को गलत लेकिन आदमी काम (निर्णय) करे तो लगना चाहिए कि किसी आदमी का निर्णय़ है, मशीन का नहीं। पर आजकल ऐसा लगता है जैसे खबरों का चयन मशीन से किया जाता हो।

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