The Telegraph ने सिखाया- समर्पण नहीं, संघर्ष है पत्रकारिता का मूल स्वरुप!

इन दिनों कोलकाता में हूं। कल लोकल ट्रेन में यात्रा के दौरान सहयात्री के हाथ में The Telegraph अखबार देखा। अखबार में छपी इस हेडिंग पर निगाह गई तो ये खबर अंदर तक छू गई। सोचने लगा मैं।

जब जनमाध्यम आंख-कान बंद कर सत्ता की भाषा में बोलने लगे तो विरोध के सारे स्वरों का गला घोटना आसान हो जाता है। पर कुछ एक ऐसे माध्यम हैं जो बेखौफ तरीके से अपनी बात रखते हैं। 30 जनवरी 2020 को कोलकाता से प्रकाशित The Telegraph अखबार के फ्रंट पेज को जरूर देखिए।

इसमें एक हेडिंग है- A nation of sheep will a government of wolves”. यानि इस हेडिंग का मतलब ये हुआ कि एक राष्ट्र जब भेड़ हो जाता है तो सरकार भेड़िया!

The Telegraph ने Us broadcaster Edward r.Murrow के उस शीर्षक को अपने फ्रंट पेज की हेडिंग बनाया है जो उन्होंने कभी दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजी कैम्पों में अमानवीय क्रूरता और दिल को दहला देने वाले दृश्यों को देखने के बाद बनाया था।

खबर कामेडियन कुणाल कामरा और TV एंकर अर्नब गोस्वामी के बीच Indigo विमान में हुए घटना को लेकर है। घटना के बाद Indigo ने कुणाल पर 6 महीने के लिए विमान यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। हद तो तब हो गई जब प्रतिबंध लगाने के ठीक 22 मिनट बाद ही नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप पुरी ने अन्य विमान कंपनियों को भी ऐसा करने की सलाह दी। उधर मंत्री जी का कहना था कि इधर yes boss की मुद्रा में आए तीन अन्य विमान कंपनियों एअर इंडिया, स्पाईसजेट और गो एयर ने भी मंत्री जी के हुकूम की तालीम करते हुए कुणाल पर यात्रा प्रतिबंध का ताला जड़ दिया।

इस खबर को The Telegraph ने फ्रंट पेज की हेडिंग बनाकर न सिर्फ साहसिक पत्रकारिता का परिचय दिया है बल्कि उस मुर्दा शांति वाली हालत की ओर इशारा किया है जिसमें सब कुछ सिर झुका कर मानने की आदत बनती जा रही है।

बनारस निवासी भास्कर गुहा नियोगी की कोलकाता से रिपोर्ट.

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