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आज का एंकर और सत्ता वाले सर!

अनूप मणि त्रिपाठी-

होनहार 18-18 घंटे काम करके न थकने वाले सर का टी वी जगत पर साक्षात्कार…

एंकर : बहुत बहुत स्वागत है आप का हमारे इस विशेष प्रोग्राम ‘आप के दरबार में’ !

(सर हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हैं।)

एंकर: सीधे मुद्दे पर आते हैं!
सर : बिल्कुल!

एंकर : अभी आप अपनी सबसे बड़ी सफलता क्या मानते हैं?
सर: आप तो ख़ुद ही देख रहे हैं… मानसून को हम सही समय पर लाने में कामयाब हुए…

(यह कहने के बाद सर मुस्कुराते हैं और एंकर खुशी से फूला नहीं समाता है। उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। अफ़कोर्स खुशी के।)

एंकर : क्या वजह रही जो इतने वर्षों में (सत्तर साल आप ख़ुद जोड़ लेंगे! रटा दिया गया है) नहीं किया जा सका वो अब हो गया?
सर: हार्ड वर्क…हार्ड वर्क… हार्ड वर्क…और कुछ नहीं…

(एंकर ने सर को ऐसे देखा जैसे कि सर के मुख से अमृत की बूँदें टपकीं हों!)

एंकर: आप थकते नहीं हैं…!!!
सर: थकते तो आप भी नहीं!

(सर, एंकर को देखकर मुस्कुराते हैं। एंकर निहाल हो जाता है। )

(सर फिर बोलते हैं)
सर: देश सेवा में थकना मना है!

(एंकर किसी होनहार स्कूली बच्चे की तरह अपना सिर हिलाता है।)

एंकर: इतनी ऊर्जा कहाँ से लाते हैं?
सर: काम करने से ऊर्जा मिलती है। (कुछ देर के लिए रुकते हैं फिर) जैसे आपको बोलने से आती है। उसी तरह मुझे काम करने से आती है।

(एंकर इस बात पर ऐसी भंगिमा बनाता है कि उसके हाथ जैसे अलादीन का चराग़ लग गया हो।)

एंकर: आगे की क्या योजना है?
सर: अभी तो चुनाव दूर हैं…

(सर एंकर को ऐसे देखते हैं, जैसे वह कोई कार्टून हो और एंकर उनको देखते हुए हँसता है।)

एंकर : मान गए सर आपके सेन्स ऑफ़ ह्यूमर को! (यह कहते हुए वह ऐसे अभिनय करता है कि हँसते हुए उसके प्राण पखेरू ऑलमोस्ट उड़ रहे हैं!’)
सर: नहीं …मैं गम्भीर हूँ…(वाक़ई वह गम्भीर थे)

एंकर : सर आप सीरियस हो कर जोक कर लेते हैं… कमाल है!

(लेकिन एंकर इस बार हँसता नहीं है, बस मुस्कुरा कर रह जाता है। वह समझता है कि हँसने का उस का कोटा अब पूरा हो चुका है।)

एंकर : मानसून आप समय पर ले आये हैं, तो…(एंकर सवाल सोचता है) यह तो सच है इतिहास में यह पहली बार हुआ है …(एंकर मन में सवाल बनाता है।) सारी दुनिया इस बात की तारीफ़ कर रही कि भारत समय पर मानसून ले आया..( एंकर अभी भी सवाल नहीं बना पाया) महामानसून जो है…
सर : मानसून तो हम ले आये, पर अब और सतर्कता की आवश्यकता है। (उन्होंने स्थिति भाँप ली।)

(सतर्कता का नाम सुनते ही एंकर अपना बदन कड़ा कर लेता है।)

एंकर : कैसी सतर्कता ?
सर: हमें देखना पड़ेगा कि मानसून पड़ोसी देश में चला न जाए!

(पड़ोसी देश सुनते ही एंकर कुर्सी से उछल पड़ता है। उसका मन करता है कि सर से कहे कि अब आप जाईये। अब हमें किसी की ज़रूरत नहीं! यहाँ तक कि आप की भी नहीं…! पर मन मसोस के रह जाता है।)

एंकर : यह एक बड़ी समस्या है!(अपने भाव छुपाते हुए)
सर : हाँ है तो… पर जैसे मानसून वाली समस्या हल कर ली, वैसे ही यह वाली भी कर लेंगे!

एंकर : हमारे दर्शकों को कोई सन्देश देना चाहेंगे!
सर (मुस्कुराते हुए) (लोग इसको कैसे झेलते हैं! सर मन में सोचते हैं): यही कि मानसून तो हम समय पर ले आये, मगर आप मानसून के भरोसे न बैठे रहें… आत्मनिर्भर बनें!

एंकर : वाह सर क्या बात कह दी…आत्मनिर्भर बनें! जहाँ तक मुझे याद आता है, इस से पहले यह शब्द राजनीति में किसी ने इस्तेमाल ही नहीं किया है।

सर मुस्कुरा कर उठ जाते हैं।

(सर के जाने के बाद)

एंकर : इस बार पड़ोसी मुल्क (सोच समझ कर देश नहीं बोलता) ख़ून के आँसू रोयेगा। वहाँ बारिश तो होगी, पर इस बार न होगा मानसून… कटोरा ले कर माँगेगा मानसून… हाथ फैला के माँगेगा मानसून… खटिया ले के माँगेगा मानसून… चद्दर बिछा के माँगेगा मानसून… पर नहीं मिलेगा उसे मानसून! (एंकर का मन करता है कि वह ज़ोरदार एक नारा लगा दे!)

तो आप देख रहे थे महंगाई को लेकर सर जी का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू सिर्फ़ आपके अपने चैनल पर। बाक़ी की ख़बरों के लिए बने रहिये हमारे साथ!

नमस्कार…!

कैसे कैसे अनूठे व्यंग्य रचे जा रहे हैं इस काल में!

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