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‘अभय सिन्हा जैसे घटिया और भ्रष्‍ट लोगों से आनंद कुमार को बचना चाहिए’

Abhishek Srivastava : कल रात मोबाइल पर एक संदेश आया, ”कृपया स्‍वराज संवाद में योगदान के लिए निमंत्रण स्‍वीकारें, 14 अप्रैल, 10-6 बजे, इफको चौक मेट्रो स्‍टेशन के अतिनिकट। आप को आगे बढ़ाएं। न छोड़ेंगे, न तोड़ेंगे। सुधरेंगे, सुधारेंगे। धन्‍यवाद। आनंद कुमार, अभय सिन्‍हा।” Prof Anand Kumar के साथ अभय सिन्‍हा का नाम देखकर थोड़ा अचरज हुआ। अभय सिन्‍हा से मेरा और Rajesh Chandra का 2003 में पाला पड़ चुका है। ये तीन सिन्‍हा बंधु हैं।

Abhishek Srivastava : कल रात मोबाइल पर एक संदेश आया, ”कृपया स्‍वराज संवाद में योगदान के लिए निमंत्रण स्‍वीकारें, 14 अप्रैल, 10-6 बजे, इफको चौक मेट्रो स्‍टेशन के अतिनिकट। आप को आगे बढ़ाएं। न छोड़ेंगे, न तोड़ेंगे। सुधरेंगे, सुधारेंगे। धन्‍यवाद। आनंद कुमार, अभय सिन्‍हा।” Prof Anand Kumar के साथ अभय सिन्‍हा का नाम देखकर थोड़ा अचरज हुआ। अभय सिन्‍हा से मेरा और Rajesh Chandra का 2003 में पाला पड़ चुका है। ये तीन सिन्‍हा बंधु हैं।

सबसे छोटा वाला गैर-कानूनी तरीके से एडमिशन करवाने का धंधा करता था और जेल जा चुका है। बाकी दो- अजय और अभय सिन्‍हा, जयप्रकाश नारायण के नाम पर एक रैकेट चलाते थे और पत्रिका निकालते थे। इसी नाम पर इन्‍होंने समाजवादियों को बरसों से भरमाए रखा है। हम लोग 2003 में भीषण बेरोज़गारी के दौर में इनकी पत्रिका ”संपूर्ण खोज” के चक्‍कर में पड़ गए थे। इन्‍होंने हमारे पैसे मार लिए। अंत में पता चला कि पत्रिका नियमित नहीं थी बल्कि जेपी की जयंती के आसपास अक्‍टूबर में ये लोग हर साल विज्ञापन निकाल कर कुछ पत्रकारों को काम पर रखते थे और पत्रिका का अंक व जेपी के नाम पर स्‍मारिका निकालते थे।

अभय सिन्‍हा पिछले साल भर तक आम आदमी का प्रवक्‍ता बनकर इंडिया न्‍यूज़ के पैनल में बैठने का सुख ले चुके हैं। वे फरवरी में पुस्‍तक मेले में बरसों बाद अचानक मुझसे टकराए थे। उस वक्‍त वे Punya Prasun Bajpai से उनका मोबाइल नंबर मांग रहे थे कि मैंने मौज लेने के लिए आवाज़ लगायी। वे मुझे देखकर सकपका गए और भागे-भागे आकर मेरा नंबर मांगने लगे। Arvind Shesh इस घटना के गवाह हैं। ऐसे घटिया और भ्रष्‍ट लोगों से आनंद कुमार को बचना चाहिए। Swaraj Samwad में अभय सिन्‍हा जैसे लोगों की संलग्‍नता समाजवादियों की विश्‍वसनीयता को और घटाने का काम करेगी, जिन्‍हें स्‍वराज का आधा स तक नहीं पता है।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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