मीडिया इम्पलॉयर का राज दमन वाला राज है : एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस

जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले पर जानिये क्या कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस का नाम हमेशा सुर्खियों में रहा है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले पर मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह ने उनसे बातचीत की। बातचीत का सिलसिला चला तो कॉलिन गोंसाल्विस ने दिल की हर बात जुबां पर ला दी। पेश है बातचीत के मुख्य अंश…

-8 नवंबर को माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले की जो सुनवाई हुई, उसे आप किस रूप में लेते हैं?
-ये सुनवाई प्रीलिमिनरी स्टेज पर है और जज साहब अगली डेट पर लीगल इश्यू पर कुछ ऑर्डर पास करने वाले हैं जिसमे क्लॉज 20 जे का भी मामला है। 20 जे में कर्मचारी कह सकता है मुझे बेनिफिट नहीं चाहिए और हमारा कहना है ये क्लॉज उनके लिए लागू है जिनकी सैलरी काफी ज्यादा है और हकीकत ये है कि सारे इम्प्लाई कम वेतन पर काम करते हैं और मैनेजमेंट ने जबर्दस्ती किया, फोर्स करके इनसे साइन कराया। इसी सुनवाई में जज साहब अन्य इश्यू को भी सुनेंगे और ऑर्डर पास करेंगे।

-इस सुनवाई में एसआईटी जैसी टीम बनाने पर भी चर्चा हुई थी लेकिन ऑर्डर में नहीं आया?
-नहीं नहीं.. जज साहब ने ऐसे सुझाव के बारे में कुछ सोचा था लेकिन इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ। अगली बार इस पर कुछ होगा। ये एसआईटी नहीं बल्कि जाँच कमेटी होगी। जैसे अभी लेबर कमिश्नर जांच करता है वैसे लेबर कमिश्नर की जगह पर दो या तीन सदस्यों की शायद एक कमिटी बनाई जाए लेकिन इस पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। अगली बार इस पर कुछ होगा।

-इस मामले की लेबर कोर्ट में चल रही सुनवाई को टाइमबांड कराने की भी बातचीत चल रही थी?
-हाँ कोई भी इन्वेस्टिगेशन या इंक्वायरी अगर लेबर कोर्ट में चलती है तो उस पर टाइमबॉन्ड होना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को है और हम सबकी इस पर एक राय भी है कि टाइमबॉन्ड होना चाहिए।

-अखबार मालिकों के खिलाफ अदालत की अवमानना के मामले का क्या हुआ?
-अदालत की अवमानना का मामला जारी है। वास्तविकता ये है कि 8 या 9 स्टेट के लेबर कमिश्नरों की रिपोर्ट काफी स्ट्रांग आयी है जबकि 9 स्टेट की रिपोर्ट काफी वीक आई है। इन 9 स्टेट की रिपोर्ट को देखने से ही पता चल जाता है कि ये रिपोर्ट लेबर विभाग ने मैनेजमेंट के साथ मिलकर बनाया है। मैनेजमेंट ने जो कहा उसी को आधार मानकर लेबर कमिश्नर ने रिपोर्ट तैयार कर दिया। कर्मचारियों से बात तक नहीं किया गया। उनसे बहस भी नहीं की गयी और ऐसे ही रिपोर्ट बना दी गयी।

-लेकिन जिस स्टेट के लेबर कमिश्नर की क्लियर रिपोर्ट थी उस स्टेट के अखबार मालिकों के खिलाफ तो अदालत की अवमानना का मामला बन सकता था?
-हां, ये जज साहब को सोचना है। हमारा तो सुझाव होगा कि वे ऐसा करें।

-जितने भी मीडियाकर्मी हैं, वे अगर क्लेम लगाते हैं तो उस पर मैनेजमेंट उनका ट्रांसफर टर्मिनेशन कर देता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट में आवाज क्यों नहीं उठाई जाती?
-ये मामला अभी पेंडिंग है।

-आपने पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में एक मामला उठाया था कि सारे मामले हाईकोर्ट में ले जाने चाहिए? क्या आप इसे सही मानते हैं?
-नहीं नहीं, सारे नहीं। मेन प्वाइंट ये है कि कई राज्यों में हमारे पास एक भी कर्मचारी नहीं हैं। एक भी अवमानना के मामले दाखिल नहीं हैं। सुप्रीमकोर्ट में इनका केस चलाना मुश्किल है। तमिलनाडु और केरला सहित कई राज्यों में ना तो एक भी कंप्लेन है और ना ही एक भी कर्मचारी सामने आ रहे हैं। वहां के केस अगर वहां के हाईकोर्ट में भेज दिए जाए तो नजदीक होने के कारण यूनियन के लोग वहां आएंगे।

-जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के पूरे केस के बारे में आपकी निजी राय क्या है?
-इस केस की हकीकत ये है कि पत्रकार औए गैर पत्रकार इतना डरा हुआ है कि कोई सामने आने को तैयार नहीं है। लेबर कमिश्नर के सामने शिकायत करने को तैयार नहीं है। बहुत खतरनाक स्थिति है। मीडिया एम्प्लॉयर का राज दमन वाला राज है।

-राजस्थान सहित कई स्टेट की सुनवाई अभी भी बाकी है?
-हां, कई राज्यों की सुनवाई अभी बाकी है जिन पर जज साहब को फैसला करना है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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