Connect with us

Hi, what are you looking for?

सियासत

ऐसा तो किसी ने सोचा तक नहीं था

आखिर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 21 मार्च 2015 को मेरठ के हाशिमपुरा में 1987 में हुए नरसंहार के 16 अभियुक्त पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया. इस नरसंहार में एक ही संप्रदाय के 40 से अधिक लोग मारे गए थे. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की रिज़र्व पुलिस पीएसी के जवानों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष संदिग्ध पुलिसकर्मियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा. तो फिर उन 40 से ज़्यादा मनुष्यों को किसने मारा ? क्या इस प्रश्न का उत्तर इस व्यवस्था के पास है ? लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि आरोपियों को सख्त सजा होगी, लेकिन उन्हें साक्ष्य के आभाव में बरी कर दिया जाएगा, ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था. कुछ लोग मान रहे थे कि कम से कम आजीवन कारावास तो होगा ही.

<p>आखिर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 21 मार्च 2015 को मेरठ के हाशिमपुरा में 1987 में हुए नरसंहार के 16 अभियुक्त पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया. इस नरसंहार में एक ही संप्रदाय के 40 से अधिक लोग मारे गए थे. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की रिज़र्व पुलिस पीएसी के जवानों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष संदिग्ध पुलिसकर्मियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा. तो फिर उन 40 से ज़्यादा मनुष्यों को किसने मारा ? क्या इस प्रश्न का उत्तर इस व्यवस्था के पास है ? लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि आरोपियों को सख्त सजा होगी, लेकिन उन्हें साक्ष्य के आभाव में बरी कर दिया जाएगा, ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था. कुछ लोग मान रहे थे कि कम से कम आजीवन कारावास तो होगा ही.</p>

आखिर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 21 मार्च 2015 को मेरठ के हाशिमपुरा में 1987 में हुए नरसंहार के 16 अभियुक्त पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया. इस नरसंहार में एक ही संप्रदाय के 40 से अधिक लोग मारे गए थे. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की रिज़र्व पुलिस पीएसी के जवानों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष संदिग्ध पुलिसकर्मियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा. तो फिर उन 40 से ज़्यादा मनुष्यों को किसने मारा ? क्या इस प्रश्न का उत्तर इस व्यवस्था के पास है ? लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि आरोपियों को सख्त सजा होगी, लेकिन उन्हें साक्ष्य के आभाव में बरी कर दिया जाएगा, ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था. कुछ लोग मान रहे थे कि कम से कम आजीवन कारावास तो होगा ही.

जब सांप्रदायिक हिंसा की आग भड़कती है और जब लोगों को सांप्रदायिक आधार पर मारा जाता है तो सभी राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी एक सी होती हैं. उनके बीच एक तरह की समझदारी है कि सांप्रदायिक आधार पर किसी को निशाना बनाने वाले वर्दीधारियों को किसी भी कीमत पर बचाया जाना चाहिए. इस मामले में कांग्रेस, बीजेपी से कतई अलग नहीं है. हाशिमपुरा नरसंहार की घटना 22 मई 1987 को हुई. तब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सरकार का शासन था और केंद्र में भी इसी पार्टी का राज था. आखिर हम कैसे एक समुदाय के लोगों के खिलाफ़ हुई पुलिस की बर्बरता की गंभीरता को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. 

Advertisement. Scroll to continue reading.

हाशिमपुरा नरसंहार के पीड़ितों में गोलीबारी में पांच लोग बच गए थे. हालांकि वे गंभीर रूप से घायल थे. मारे गए अन्य पीड़ितों की तरह ही उन्हें भी हाशिमपुरा से अगवा किया गया था. आधी रात को उन्हें पीएसी की ट्रक में लादकर लाया गया था, फिर गोली मार कर हिंडन नदी में फेंक दिया गया. वे अदालत में पेश हुए और बहादुरी के साथ गवाही दी और उनकी गवाही सुनकर किसी की भी रूह कांप सकती है. उनकी गवाही से ये समझ आता है कि आखिर किस तरह से इन अपराधों को अंजाम दिया गया. ये भी समझ में आता है कि पुलिस वाले किस तरह से निर्दयतापूर्वक और निर्लज्ज तरीके से अपराध कर रहे थे. यह कोई रहस्य की बात नहीं है कि जब पुलिस के अफसर दूसरे पुलिस अधिकारियों की जांच करते हैं तो ‘भाईचारे का बंधन’ यह तय करता है कि पूरी प्रक्रिया बिगड़कर ख़राब हो जाए. यह सुप्रीम कोर्ट का मानना है. सबसे मज़बूत सबूतों को जान बूझकर दबा दिया जाता है. इस मामले में भी सबसे मज़बूत सबूत को दबाया गया, नष्ट कर दिया गया और नतीज़तन अदालत के सामने कभी नहीं लाया गया. इसे रिकॉर्ड पर लाया जाना चाहिए कि इस हत्याकांड के अभियुक्त पुलिसवालों को कभी भी निलंबित नहीं किया गया. वे पुलिस बल में बने रहे और उनमें से कुछ को तो तरक्की भी दी गई. उनके पास जांच को नियंत्रित और इसके नतीजों को प्रभावित करने के साधन और काबिलियत थी. जो लोग पुलिस सुधारों की बात करते हैं वे कभी भी जिम्मेदारी तय करने के बारे में बात नहीं करते. आपराधिक लापरवाही के कौन ज़िम्मेदार है ?

इस फैसले से प्रश्न यह उठता है कि 21 मार्च के फैसले में हार किसकी हुई? भारत ने खुद को कानून पर चलने वाले संविधानिक गणतंत्र कहने का अधिकार खो दिया. ये पीड़ितों की हार नहीं है जो 28 सालों तक इंसाफ के लिए बहादुरी के साथ लड़े. इस दौरान उन्होंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी. वे अपने संघर्ष में हमेशा गरिमापूर्ण बने रहे और उन्होंने हमेशा इस बात पर यकीन किया कि इंसाफ किया जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. इतने लोगों की दिल दहला देने वाली हत्या के मुकदमे की सुनवाई के पूरे होने में किसी भी सूरत में 28 साल नहीं लगने चाहिए थे. हर वो मामला जिसमें ज़िंदगी, आज़ादी और नागरिकों के अधिकार का मसला शामिल हो, उसका स्पीडी ट्रायल या जल्द सुनवाई होनी चाहिए. यह साफ है कि यहां फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट भी महज तिकड़म भर हैं जो आम लोगों की क़ीमत पर कुछ गिने चुने लोगों को खुश करने के लिए बनाए गए हैं. यह बिना किसी भ्रम के साफ पता चलता है कि जब पीड़ित गरीब लोग हों, दलित हों, हाशिये पर खड़े लोग हों या फिर अल्प संख्यक हों तो हमारी व्यवस्था निश्चित रूप से उन्हें इंसाफ नहीं दिला सकती और कभी भी नहीं दिलाएगी क्योंकि उनकी मंशा यही है. स्पष्टतः उनकी नियत में खोट है. हम यह मानने को विवश हैं.

Advertisement. Scroll to continue reading.

संपर्क : 07838897877

Advertisement. Scroll to continue reading.
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Advertisement

भड़ास को मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप ग्रुप से जुड़ें- Bhadasi_Group_one

Advertisement

Latest 100 भड़ास

व्हाट्सअप पर भड़ास चैनल से जुड़ें : Bhadas_Channel

वाट्सअप के भड़ासी ग्रुप के सदस्य बनें- Bhadasi_Group

भड़ास की ताकत बनें, ऐसे करें भला- Donate

Advertisement