अनामिका के यहाँ भी आपको अपनी ही दुनिया मिलेगी

रवीश कुमार-

2020 का साहित्य अकादमी पुरस्कार अनामिका को मिला है। कविता की श्रेणी में अनामिका हिन्दी की पहली स्त्री कवि हैं जिन्हें यह पुरस्कार मिला है। इसलिए भी गौरव की बात है। पुरस्कार किसी कवि की रचना संसार के लिए पूर्ण विराम नहीं होता है। एक घंटी होती है जो चारों तरफ़ बज जाती है कि देखो कि कोई है जो चुपचाप रची जा रही थी। जो उन्हें पढ़ते रहे हैं उनके लिए सिर्फ़ ख़ुशी की बात हो सकती है लेकिन जो उन्हें जानने पढ़ने से रह गए उनके लिए यह घंटी बजी है।

कवि दूसरी दुनिया में नहीं रहते हैं । न अपनी दुनिया में रहते हैं। वे हमारी दुनिया में रहा करते हैं। मुनीम बन कर हमारे अहसासों का हिसाब दर्ज करते हुए। यह भी सीमित सोच है कि कविता अहसासों का दस्तावेज़ है। कवि ने महसूस किया तो लिख दिया। कवि ने पहले देखा होगा, जाना होगा, उसे अपने भीतर की गहराई तक उतारा होगा, आपके भोगे हुए को अपने भीतर के यथार्थ में परिवर्तित किया होगा तब जाकर निकलती है कविता। इस पूरी प्रक्रिया में कवि कई बार तकलीफ़ों से गुज़रता है। गुज़रती है।अनामिका के यहाँ भी आपको अपनी ही दुनिया मिलेगी। हैरत भी कि उन्होंने कैसे जान लिया और नोट कर लिया। अनामिका को ख़ूब बधाई।

अनामिका की कुछ कविताएँ कविता कोश नाम की वेबसाइट पर मौजूद हैं। आप उनकी रचनाओं को पढ़ सकते हैं। आज सुबह यही काम सबसे पहले किया। अनामिका की कविताओं का पाठ किया। केवल बधाई देने से काम नहीं चलेगा। हम अक्सर किसी की सफलता के वक़्त कहते हैं। लेकिन अगर वाक़ई आपको अनामिका को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने से ख़ुशी हो रही है तो क्या सबसे पहले उनकी रचनाओं का पाठ नहीं करना चाहिए।

अंग्रेज़ी के लिए साहित्य अकादमी का पुरस्कार अरुंधति सुब्रमण्यम को मिला है। उनके बारे में कल ही जाना। लेकिन अरुंधति हमारे मित्रों की काफ़ी पसंदीदा कवि हैं। उनसे मिली कुछ कविताओं को पढ़ा। वाक़ई अच्छी कवि हैं। उन्हें भी बधाई।

किसी सोचते हुए आदमी की
आँखों-सा नम और सुंदर था दिन।

पंडुक बहुत ख़ुश थे
उनके पंखों के रोएँ
उतरते हुए जाड़े की
हल्की-सी सिहरन में
उत्फुल्ल थे।
सड़क पर निकल आए थे खटोले।
पिटे हुए दो बच्चे
गले-गले मिल सोए थे एक पर–
दोनों के गाल पर ढलक आए थे
एक-दूसरे के आँसू।

“औरतें इतना काटती क्यों हैं ?”
कूड़े के कैलाश के पार
गुड्डी चिपकाती हुई लड़की से
मंझा लगाते हुए लड़के ने पूछा–
“जब देखो, काट-कूट, छील-छाल, झाड़-झूड़
गोभी पर, कपड़ों पर, दीवार पर
किसका उतारती हैं गुस्सा?”

हम घर के आगे हैं कूड़ा–
फेंकी हुई चीज़ें भी
ख़ूब फोड़ देती हैं भांडा
घर की असल हैसियत का !

लड़की ने कुछ जवाब देने की ज़रूरत नहीं समझी
और झट से दौड़ कर, बैठ गई उधर
जहाँ जुएँ चुन रही थीं सखियाँ
एक-दूसरे के छितराए हुए केशों से
नारियल-तेल चपचपाकर।

दरअसल–
जो चुनी जा रही थीं–
सिर्फ़ जुएँ नहीं थीं
घर के वे सारे खटराग थे
जिनसे भन्नाया पड़ा था उनका माथा।

क्या जाने कितनी शताब्दियों से
चल रहा है यह सिलसिला
और एक आदि स्त्री
दूसरी उतनी ही पुरानी सखी के
छितराए हुए केशों से
चुन रही है जुएँ
सितारे और चमकुल!
~अनामिका

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