हमारे वक्त के एक बेहतरीन साहित्यकार-पत्रकार अनिल कुमार यादव को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई!

Yashwant Singh-

आज (9 जनवरी) अनिल कुमार यादव का जन्मदिन है।

मीडिया में मेरा आना, लिखना-पढ़ना सीखना, एक क्रीएटिव/डेस्ट्रक्टिव ईगो रखना, डाउन टू अर्थ बने रहना, प्रलोभन और धमकियों की परवाह न करना, करियर को दिल और भावना पर हावी न होने देना, थोड़ा शराबी थोड़ा दीवाना बने रहना… ये सब कुछ अच्छा बुरा जो भी है जिस भी मात्रा में है, अपन में, इन भाई साहब की देन है।

लखनऊ में तब आप अमर उजाला के स्टेट ब्यूरो में हुआ करते थे। हम बीएचयू से छात्र संगठन ‘आइसा’ के लिए पूर्ण कालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए पत्रकारिता की सालाना परीक्षा देकर लखनऊ भाग आए थे।

बीएचयू में आइसा के कामरेड सुनील यादव के चुनाव प्रचार में इनके सगे बड़े भाई अनिल यादव से पहली बार मुलाक़ात हुई थी। अनिल बीएचयू में एसएफआई के छात्रनेता रहे हैं। उसी थोड़े से सम्पर्क सूत्र के सहारे बनारस से लखनऊ भाग आया था।

लखनऊ में अनिल जी के यहाँ लम्बे समय तक रहा। Anehas Shashwat जी भी यहीं थे। परिवार सा रिश्ता बन गया। एक कमाए तो दो खाएँ। लड़ाई पढ़ाई लिखाई चिंतन मनन रोना गाना… सब था अपन सब के जीवन में। नुक्कड़ नाटक किए। ‘बुड्ढा मर गया’! लखनऊ में एक टीम बन गई हम रंगकर्मियों की।

अनिल के चलते उदय सिन्हा, गिरीश मिश्रा जी समेत कई वरिष्ठ पत्रकारों से परिचय हुआ। स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण में छपना शुरू हुआ। फिर अख़बार में काम करने का मौक़ा मिला। ट्रेनी बना। दैनिक जागरण लखनऊ में रखा गया और कुछ दिनों बाद निकाल दिया गया। दुबारा रखा गया और फिर निकाल दिया गया। ये कर कर के एक कामरेड छात्रनेता को संस्कारित किया जा रहा था। हम दीक्षित होने को तैयार न थे। विद्रोही अनिल एंड टीम की संध्याक़ालीन वाली ट्रेनिंग का नतीजा था कि आफिस अनुकूल संस्कार कम, विद्रोही सरोकार-सवाल ज़्यादा डेवलप हो रहे थे।

विस्तार से फिर कभी।

फ़िलहाल तो हैप्पी बड्डे बड़े भाई / दोस्त / शिक्षक / गॉडफादर अनिल यादव जी। आज भी आपसे लिखना सीखता हूँ। आज तक आप जैसा हिंदी में लिखने वाला कोई दूसरा दिखा नहीं। आप जैसी सहजता, समझ, साहस और ईमानदारी वाला व्यक्तित्व विरल है। आप खुद में एक उपन्यास हो।

जो लोग अनिल के लिखे से वाक़िफ़ न हों उन्हें इनका लिखा एक ट्रेवलॉग पढ़ने के लिए कहूँगा- ‘वह भी कोई देश है महराज!’ ऑनलाइन मिल जाएगा। इनकी अन्य कई किताबें भी हैं। जैसे- ‘नगर वधुएँ अख़बार नहीं पढ़तीं’!

हमारे वक्त के एक बेहतरीन साहित्यकार-पत्रकार को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई!

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी पोस्ट.

अपने जन्मदिन पर शुभकामनाओं के जवाब में अनिल यादव की टिप्पणी-

Anil Kumar Yadav-

आज जन्मदिन पर जितनी शुभकामनाओं, प्रेम, स्नेह और सौजन्य की बारिश मुझ पर हो रही है दरअसल मैं उसके लायक हूं नहीं. मेरे भीतर एक द्रोह है. बुनियादी और पक्के किस्म का. मैं अपने सबसे प्रिय लोगों को भी अचानक तटस्थ होकर देखने लगता हूं. उनके विरोधाभासों और कमियों पर उंगली उठा देता हूं. नहीं उठा पाता तो संतप्त रहता हूं जिसे वे भांप लेते हैं और चौकन्ने रहने लगते हैं. सटकर जीते हुए भी एक दूरी बनी रहती है. यही वे करें तो अब पहले से कुछ कम बिलबिलाता हूं. इंसानियत और क्षमा के तराने गाता हूं. तमाम लाइलाज कमजोरियों और उनसे जनित धमाकों के बावजूद मुझे लगता है कि मेरी वह निर्लिप्त और ढीठ आंख खुली रहनी चाहिए वरना पारस्परिकता से ठंडा और पश्चाताप से कामचलाऊ भला होकर खत्म हो जाऊंगा. इस जिद का कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन इससे होता यह है कि मुझे मनुष्य के भीतर पैठने की रहस्यमय राहें मिलती हैं. मुझे सर्वेषां मधुरं प्रियम होने के बजाय अपने और दूसरों के और हर तरह के अज्ञात में भटकना ज्यादा गरिमामय लगता है. ऐसा नहीं कि मुझमें प्रेम की कमीं है. भरपूर है लेकिन वह क्षुब्ध है. उसे एक संतुलन की तलाश है. मुझे इस अज्ञात में जो कबाड़ मिलता है, वादा करता हूं कि उसका लेखन में इस्तेमाल करता रहूंगा.

अप्रत्याशित मुनाफे से प्रसन्न, विनम्र और विभोर हृदय से मैं आप सभी का आभार व्यक्त करता हूं.



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One comment on “हमारे वक्त के एक बेहतरीन साहित्यकार-पत्रकार अनिल कुमार यादव को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई!”

  • आलोचक says:

    यशवंत जी सही लिखा है, अनिल यादव हिंदी के नए लोगों में बेहतर लिख रहे हैं. इनका लिखा हुआ कुछ पढ़ा है, अच्छा लगा. उम्मीद करते हैं कि अनिल जी हिंदी को कुछ कालजयी रचनाएं देंगे.

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