‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म कैसी लगी वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल को, पढ़ें

आज सुबह एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर देखी। राजनीति की बात न करूँ तो भी कुछ मुद्दे इस फ़िल्म के बेहद गंभीर हैं।

पूरी फ़िल्म में संजय बारू (इनकी किताब पर यह फ़िल्म रची गई है ) भारत की संवैधानिक व्यवस्था और प्रधानमंत्री कार्यालय से भी ऊपर अपने आप को प्रदर्शित करते नज़र आते हैं। उन्हें नहीं पता कि भारत का प्रधानमंत्री कैसे चुना जाता है और सत्ताधारी पार्टी की सरकार की नीतियों में क्या भूमिका होती है। वे पूरी फ़िल्म में बार बार कहते हैं – मेरी रिपोर्टिंग सिर्फ़ डॉक्टर मनमोहन सिंह को है। वे पीएमओ के वरिष्ठ अधिकारियों की खिल्ली उड़ाते नज़र आते हैं। मीडिया सलाहकार होते हुए खुद को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पीएमओ के अफसरों से ऊपर समझते हैं।भारतीय लोकतंत्र में एक मीडिया सलाहकार की सीमा उन्हें नहीं पता। वे कारपोरेट संसार के प्रोफेशनल की तरह व्यवहार करते हैं, जहां रिपोर्टिंग का ढांचा ऐसा होता है।

पूरी फिल्म में वे मंथरा की भूमिका निभाते दिखते हैं। पहले दिन से वे मनमोहन सिंह को भड़काते हैं। वे अपने कथनों से बार बार साबित करना चाहते हैं कि पीएमओ के अफ़सर, यूपीए चेयरपर्सन (जिन्होंने दो बार उन्हें प्रधानमंत्री बनाया) मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ हैं।

3 संजय बारू केवल चार साल मनमोहन सिंह के सलाहकार रहे, लेकिन उन्होंने किताब की रचना पूरे दस साल के कार्यकाल पर की है। इस बीच अनेक प्रसंग ऐसे हैं, जो उनकी अनुपस्थिति में घटे हैं। मसलन एक दृश्य में मनमोहन सिंह और सिर्फ़ नवीन पटनायक बैठे हैं, जिनमें पटनायक को मनमोहन सिंह एक तरह से अपमानित करते हैं। इसके अलावा एक दृश्य में एक प्रतिनिधिमंडल के सामने मनमोहन सिंह उनसे फ़ाइल लेकर फेंकते या पटकते नज़र आते हैं। अब जहाँ बारू थे ही नहीं, उन दृश्यों की बात उन्हें कैसे पता चली? कुछ दृश्यों में तो सिर्फ़ दो लोग हैं। इनमें एक प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह हैं। प्रधानमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ से बंधे होते हैं। फिर भी संजयबारू उन दृश्यों को सरकास्टिक अंदाज़ में परोसते नज़र आए हैं।

प्रधानमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ से बंधे होते हैं ,लेकिन बारू उनसे प्राप्त सूचनाओं को शेयर करने से नहीं चूके।क्योंकि संजय बारू किसी शपथ से नहीं बंधे थे।वे खुद एक स्थान पर कहते हैं कि मनमोहन एक कमज़ोर प्रधानमंत्री हैं। क्या यह पेशेवर रवैया है? भारत के बाहर इसका क्या असर पड़ेगा?

कितना बड़ा धोखा है कि सेंसर बोर्ड ने जो फिल्म पास की, उसमें कुछ डायलॉग को आपत्तिजनक मानकर हटा दिया गया। लेकिन धड़ल्ले से वे ट्रेलर याने प्रोमो में चलते हैं। यह साफ़ साफ़ सेंसर बोर्ड के साथ और सूचना प्रसारण मंत्रालय के नियमों का उल्लंघन है।

फिल्म में एक डिस्क्लेमर चलता है। यह किसी भी घटनाक्रम, पात्र और प्रतीकों से अपने आप को अलग करता है। हर फिल्म की तरह। मगर फिल्म में नाम, पार्टी, चुनाव चिह्न, नेता, अनेक चैनलों के लोगो, वास्तविक फुटेज का धड़ल्ले से इस्तेमाल हुआ है। ऐसे में डिस्क्लेमर निष्प्रभावी है। अर्थात कोई भी क़ानूनी कार्रवाई करने के लिए आमंत्रित करता है।

फिल्म में दस साल के कालखंड को दर्शाया गया है। पूरे दस साल मनमोहन एक कमज़ोर, असहाय और लाचार नज़र आए हैं और उनके परिवार की सहमति से। यह विडंबना है कि जिस मनमोहन सिंह ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील पर इतना साहस दिखाया उसका ज़िक्र भी आधा अधूरा है। खाद्य सुरक्षा क़ानून,मनरेगा और अंतर्राष्ट्रीय मंदी के समय सूझबूझ भरी नीतियों का कोई ज़िक्र ही नहीं है। आर्थिक रफ़्तार और देश की मज़बूत अर्थव्यवस्था का कहीं कोई ज़िक्र न कर मनमोहन सिंह जैसे विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री का जैसे अपमान किया गया है।

बारू फिल्म के अंत में अपनी किताब के न बिकने की चिंता कर बैठते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का मीडिया सलाहकार लोकतांत्रिक सूचनाओं को विकृत करके पेश करता है और यह चिंता करता है कि उसकी किताब बिक नहीं रही। जब पीएमओ की और से कहा जाता है कि मनमोहन सिंह खुद इससे खफा हैं तो यह लेखक अपनी किताब की ज़बरदस्त बिक्री होने की डींग हांकता है। बेहद शर्मनाक है।

संजय बारू गर्व से कहते हैं कि मनमोहन की हर स्पीच वे लिखते थे ,पाकिस्तान पर मनमोहनजी को क्या बात करनी चाहिए – यह ज्ञान वे बारू जी से लेते थे। यही नहीं ,वे आख़िरी बयान लिखने के लिए सिंगापुर में बैठे बारू जी को तलब करते हैं। अब इन तथ्यों को गलत होने का प्रमाण कौन देगा ? खुद मनमोहन जी तो कहने से रहे। ज़ाहिर है डाक्टर मनमोहन सिंह की छबि खराब करने की यह साज़िश सी लगती है। इससे किसका भला होगा? अनुसंधान होना चाहिए।

लेखक राजेश बादल देश के जाने-माने प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार हैं.

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