अरुणा राय प्रकरण पर उत्तर प्रदेश की मीडिया ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया : सुभाषिनी अली

27 अप्रैल 2014 को एक युवा और होनहार सब इंस्पेक्टर अरुणा राय ने अपने पोस्टिंग स्थल, पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, मेरठ, में अपने साथ 23 अप्रैल को दफ्तर में होने वाले दुर्व्यवहार के लिए, वहाँ के IPS डीआईजी देवी प्रसाद के खिलाफ एक औपचारिक शिकायत दर्ज की। उन्होंने आगे बताया कि डीआईजी ने कई बार उनसे फोन पर भी बात करने की कोशिश की थी। अरुणा ने इसके लिए सख्ती से उन्हें फटकारा। और इसके बाद वो उन्हे “माफ” किए जाने के लिए कभी फुसलाने तो कभी मजबूर करने की कोशिश करने लगे। हालांकि, अरुणा आगे आई और उन्होंने अपनी शिकायत दर्ज कराई।

अरुणा राय

उसके बाद का वक़्त अरुणा के लिए इतना आसान नहीं रहा। उसे कथित तौर पर श्रीवास्तव की तरफ से कई खतरों का सामना करना पड़ा। उसका पानी का कनैक्शन बंद किया गया और उसकी छुट्टियां रद्द कर दी गयीं। इतना ही नहीं, इन सब के साथ उसे जानी पहचानी मुस्कानों, फुसफुसाते कमेंट्स, टिप्पणियों, और अफवाहों के वातावरण से भी दो चार होना पड़ा। लेकिन उन्होंने मई मे डीआईजी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जिसमें डीआईजी को कोर्ट के सामने 13 जून को समर्पण करना पड़ा, हालांकि तुरंत ही आरोपी आईपीएस ने जमानत भी प्राप्त कर ली, क्यूंकि पुलिस ने चार्जशीट से जान बूझ कर गैर-जमानती धाराएं हटा दी थी। अरुणा इससे लड़ी, और सारी जरूरी धाराएं फिर से जुड़वाई, और श्रीवास्तव जुलाई में फिर से गिरफ्तार होकर फिर से जमानत पर छूट गए। इसी बीच वो अपनी पहली गिरफ्तारी के बाद से निलंबित भी रहे।

एडीजी सुतापा सन्याल की अध्यक्षता में एक विभागीय जांच कमेटी का गठन हुआ और बिना देरी किए इस कमेटी ने 2 अगस्त को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी। कमेटी ने श्रीवास्तव को उनके खिलाफ लगाए गए आरोपो का दोषी पाया, और कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को अधिनियम के प्रबंधों के तहत कार्यवाही करनी चाहिए। अधिनियम के अनुसार, सरकार को इस रिपोर्ट की अनुशंसाओ पर 60 दिनों के भीतर कार्यवाही करनी है, किन्तु डीआईजी श्रीवास्तव की 5 अगस्त को होने वाली बहाली सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है, और ये सरकार के इरादों के बारे मे शंका पैदा करने वाला है।

गेंद पूरी तरह से अब उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है, और अगर अब इसे अपनी बची खुची विश्वसनीयता को बचाना है तो इसे जल्द से जल्द कार्यवाही करके डीआईजी श्रीवास्तव को सेवा से बर्खास्त करके उसे दंड देना चाहिए। कानून भी इसी बात की अनुशंसा करता है कि दोषियो को सजा दी जाये और पीड़ित को यथासंभव हरजाना दिया जाए।

अरुणा राय का मामला, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013, के अंतरगत दर्ज होने वाले मामलों में मील का पत्थर है, इसने एक काफी महत्वपूर्ण जांच प्रक्रिया और निष्कर्ष का प्रतिपादन किया है, लेकिन, दुर्भाग्यवश, यह मामला उत्तर प्रदेश की मीडिया का उतना ध्यान नहीं बटोर पाया, जिसके यह योग्य है, जिसे “लव जिहाद” के उन्माद बड़े आसानी से खींच लेते हैं।

प्रारूपण, सार्वजनिक जांच, असंख्य संगठनों और व्यक्तियों के द्वारा आपत्तियाँ और संशोधन दाखिल करने, और 2013 में संसद में फिर उग्र चर्चा के चरणों से गुजरती हुई अधिनियम बनने की प्रक्रिया स्वयं में लंबी अवधि का एक कठिन दौर थी। लिंग उत्पीड़न के खिलाफ और लिंग अधिकारों के लिए हर तर्क, लाया गया और अधिनियम को रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया था। बार बार यही तथ्य दोहराया और प्रचारित किया गया कि अधिनियम का दुरुपयोग किया जाएगा।

इस सब के बावजूद, एक अपूर्ण लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण अधिनियम, महिला संगठनों और लोकतांत्रिक व्यक्तियों और संगठनों के प्रयासों से, लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों में ऐसे कानूनों की उपस्थिति के कारण, और इस बात, कि कारखाने, फील्ड, कार्यालय और घर पर ही निरंतर अपमान, बलात्कार, यौन धमकी, हमले और हिंसा के वास्तविक घटनास्थल है, और इन जगहों पर बैठे अधिक शक्तिशाली लोग, चाहे पदनाम, स्वामित्व, पदानुक्रम, शारीरिक शक्ति या बस “मर्द” होने की हैसियत का फायदा पाते हैं, के पर्याप्त सबूत होने के कारण, पास हो सका। ऐसे स्थान पहले से ही औरतों और लड़कियों की अवस्था, लिंग और शक्तिहीनता की वजह से होने वाले मनोवैज्ञानिक और शारीरिक हमलों से रक्तरंजित थे।

उत्तर प्रदेश पुलिस का यौन उत्पीड़न का एक लंबा और शर्मनाक रिकॉर्ड न केवल राज्य के विभिन्न हिस्सों के पुलिस स्टेशनों में महिलाओं से बल्कि सांप्रदायिक और जातीय संघर्ष के दौरान भी रहा है। इसके अलावा, राज्य में यह सभी एक स्थापित सीक्रेट है कि महिला पुलिस कर्मियों को, सभी श्रेणियों की अधिकारियों सहित, यौन भेदभाव, अपमान, धमकी, ब्लैकमेल, और अक्सर वही पर, एब्यूस और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, और इस साल के अप्रैल तक, उनमें से किसी ने भी विरोध करने की हिम्मत नही जुटाई थी।

अरुणा ने इसका चहेरा बदल दिया। वह लैंगिक न्याय के संघर्ष में शामिल सभी लोगों के समर्थन और प्रसंशा की पात्र है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि उसने कईयों को प्रेरणा दी है। इस बात पर भी संदेह नहीं किया जा सकता कि उसके जैसे अन्य कई पुलिस विभाग में उनके साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद कर सकेंगे। अरुणा के इस साहस भरे काम को अवश्य ध्यान और समर्थन दिया जाना चाहिए।

जानी-मानी महिला नेत्री सुभाषिनी अली ने उपरोक्त आलेख मूल रूप से अंग्रेजी में ndtv की वेबसाइट पर लिखा था. इसका हिंदी रुपांतर अरुणा राय के फेसबुक वॉल पर प्रकाशित किया गया है.

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